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दोहा सलिला : रूपमती तुम... -संजीव 'सलिल'

दोहा सलिला : रूपमती तुम... संजीव 'सलिल' * रूपमती तुम, रूप के, हम पारखी अनूप. तृप्ति न पाये तृषित गर, व्यर्थ रूप का कूप.. * जुही चमेली चाँदनी, चम्पा कार्सित देह. चंद्रमुखी, चंचल, चपल, चतुरा मुखर विदेह.. * नख-शिख, शिख-नख मक्खनी, महुआ सा पीताभ. तन पाताल रत्नाभ- मुख, पौ फटता अरुणाभ.. * वाक् सारिका सी मधुर, भौंह नयन धनु बाण. वार अचूक कटाक्ष का, रुकें न निकलें प्राण.. * सलिल-बिंदु से सुशोभित, कृष्ण-कुंतली भाल. सरसिज पंखुड़ी से अधर, गुलकन्दी टकसाल.. * देह-गंध मादक-मदिर, कस्तूरी अनमोल. ज्यों गुलाब-जल में 'सलिल', अंगूरी दी घोल.. * दस्तक कर्ण-कपाट पर, देते रसमय बोल. पहुँच माधुरी हृदय तक, कहे नयन-पट खोल.. * दाड़िम रद-पट मौक्तिकी, संगमरमरी श्वेत. रसना मुखर सारिका, पिंजरे में अभिप्रेत.. * वक्ष-अधर रस-गगरिया, सुख पा, कर रसपान. बीत न जाए उमरिया, रीते ना रस-खान.. * रस-निधि पा रस-लीन हो, रस पी हो लव-लीन. सरस सृष्टि, नीरस बरस, तरस न हो रस-हीन.. * दरस-परस बिन कब हुआ, कहो सृष्टि-विस्तार? दृष्टि वृष्टि कर स्नेह की, करे सुधा-संचार.. * कंठ सुराहीदार है, ...

संस्‍कतम्-भारतस्‍य जीवनम् पर अमित जी का स्‍वागत करें ।।

प्रिय बन्‍धु  आपके अपने संस्‍कृत ब्‍लाग , संस्‍कृतम्-भारतस्‍य जीवनम् पर अमित जी ने अपना पहला लेख भारत माता की वंदना के रूप में प्रस्‍तुत किया है । पुण्यमयी मम भारतमाता टिप्‍पणियों से स्‍वागत करें । शारदा जी ने मेघदूत के श्‍लोकों की प्रस्‍तुति आरम्‍भ की है ा कालिदासस्य मेघदूतं--खंड१ -- भवदीय: - आनन्‍द:

कॉमनवेल्थ

कॉमनवेल्थ कॉमनवेल्थ                    आ गया लो कॉमनवेल्थ कितने मुद्दे अपने साथ                    और लाया कॉमनवेल्थ किसने खाया किसको खिलाया                   बता न पाया कॉमनवेल्थ कितनी अभी और नई कहानी                  हमको सुनाएगा कॉमनवेल्थ बारिश आई चली गई                 फिर भी न डोला कॉमनवेल्थ गरीबो ने अपनी मेहनत से                 खूब सजाया कॉमनवेल्थ बाड़ से बेहाल जनता को                नज़र अंदाज़ कर गया कॉमनवेल्थ नेतागड़ सब व्यस्त थे               क्युकी बहुत करीब था कॉमनवेल्थ भूखी जनता रो - रो हारी                उनको क्या देगा ये कॉमनवेल्थ ये सब  तो चलत...

राशि ज्ञान

प्रिय बन्‍धु आपके संस्‍कृत जालपृष्‍ठसंग्राहक संस्‍कृतम्-भारतस्‍य जीवनम् पर आदरणीय ज्‍योतिषाचार्य जी ने प्रारम्भिक राशिज्ञान सम्‍बन्धित लेख प्रकाशित किया है । जाल ज्योतिषं राशि ज्ञानं अपनी टिप्‍पणियों द्वारा मार्गदर्शन करें ।। श्री प्रतुल जी ने हितकरी विद्या के बारे में एक श्‍लोक प्रस्‍तुत किया है इसे आप यहॉं  एषा विद्या हितकरी । पर आघात करके पढ सकते हैं ।। अपनी अमूल्‍य टिप्‍पणियों द्वारा स्‍वागत करें । धन्‍यवाद -- भवदीय: - आनन्‍द:

फूल

कितनी  प्यारी  कितनी  मोहक                       छूने भर से खो दे रोनक  खुशबु से जग को महकाए                        भवरों का भी मन ललचाये  इंसा के  मन को ये भाये                       दुल्हन को भी खूब सजाये  भगवान के चरणों मै शीश नवाए                       हर मोसम मै फिर खिल जाये  अपने रंगों से जग को महकाए                       सारे जग मै  प्यार फैलाये हर घर - घर की है ये शान                      सब करते हैं इसका मान  कितनी प्यारी कितनी मोहक                      छूने भर से खो दे रोनक !  

माँ

                                             ये मेरे मालिक तेरा हमपे ये करम हो गया ! तुने अपनी जगह माँ का जो हमको साथ दिया !  तू भी जनता था की अकेले तो हम न रह पाएँगे  इसलिए चुपके से माँ बनके हाथ हमारा  थाम लिया ! जिंदगी के हर पल में उसने हमारा साथ दिया ! इसलिए जब दर्द  उठा तो माँ का ही जुबाँ ने नाम लिया ! माँ ने तेरा ये  काम बहुत खूबसूरती से कर  दिया ! तेरी ही तरह हम सबको अपना गुलाम कर दिया ! दोनों के एहसानों को तो अलग ना हम कर पाएंगे ! इसलिए उससे लिपट कर तेरे और करीब हम आ जायेंगे !

धरम

बहस से बड़ी कोई बहस नहीं है ,                                                   धरम से बड़ी कुच्छ की जागीर नहीं है  ! ये दुनिया वालो की बनाई हुई  हस्ती है ,                   इस पर कोई  बहस मुमकिन ही नहीं है  ! क्युकी,धरम से बड़ी कोई ज़ंजीर नहीं  है !