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लो क सं घ र्ष !: सिगरेट की फिल्टर में सूअर के खून का इस्तेमाल

उद्योगिक उत्पादन में सिगरेट सहित एक सौ पचासी उद्योगिक कार्यो में सूअर का इस्तेमाल होता है कुछ वर्षों पूर्व यह भी समाचार आया था कि चाय की पत्ती को और स्वादिष्ट बनाने के लिए रक्त का इस्तेमाल होता है । कृषि उत्पादन में भी इस तरह की मिलावट जारी है । कद्दू , लौकी , खीरा आदि सब्जियों में भैंस को दूध उतारने वाले इन्जेक्सन का प्रयोग किया जाता है जिससे उनकी लम्बाई , चौड़ाई रातों - रात बढ़ जाती है । इस तरह की सब्जियां मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल स्वभाव डालती हैं । भारतीय समाज का एक बहुत बड़ा हिस्सा अल्कोहोल ( शराब ) से परहेज करता है अब सब्जियों की पैदावार बढ़ाने के लिए कच्ची शराब का इस्तेमाल किया जाने लगा है । जिससे अल्कोहोल युक्त सब्जियां हम लोग प्रयोग करने लगे हैं । यह पूँजीवाद का संकट है । मुनाफा इनका धर्म है । मानव जाति बचे या न बचे इससे इनका कोई लेना देना नहीं है । मुनाफा होना चाहिए । आज ...

कहाँ हैं वो औरतें?

गरिमा सर्राफ़ बनारस से हाइवे हिंदुस्तान की यात्रा शुरु किए अब दस दिन गुज़र गए हैं. इस सफ़र में भारत के कई पहलुओं और रंगों को देखा और समझने की कोशिश की है. लेकिन एक सवाल बार-बार मन में उठता रहा कि सड़कें तो विकास का प्रतीक हैं लेकिन क्या उस पर चलने वाले लोग भी विकास की अलग-अलग कहानी बयान नहीं करते? पूरे रास्ते जहाँ मैं सड़क के दोनों ओर की ख़ूबसूरती निहार रही थी, वहीं मन में यह सवाल रह रहकर उठ रहा था कि इन सड़कों पर लड़कियाँ और महिलाएँ क्यों नहीं दिखाई दे रही हैं? एनएच-2 पर वाराणसी से कोलकाता तक के लंबे सफ़र में मुझे ज़्यादातर पुरुष ही नज़र आए - अपनी रोज़ी रोटी जुटाने में लगे हुए, चौराहों पर अड्डेबाज़ी करते हुए या फिर ताश खेलते हुए. जो गिनी चुनी महिलाएँ नज़र आईं वो सर पर घूंघट लिए हुए, पानी के मटके सर पर उठाए या फिर घर की छतों पर काम करती हुई. झरिया पहुँची तो महिलाएँ कोयले की खान से कोयला सर पर ढोती नज़र आईं. उनका पल्लू सर से हट नहीं रहा था. लेकिन वे नंगे पाँव चली जा रही थीं. तपती गर्मी में. लोग बताते हैं कि जब फ़सल के दिन होते है तो खेतों में महिलाएँ दिखाई देती हैं. धान बुआई से लेकर कट...

अंतिम तिथि 14 अप्रैल 2010 समीप आ रही है

हिन्दुस्तान का दर्द द्वारा आयोजित निबंध प्रतियोगिता 2010   में भाग लेने की अंतिम तिथि 14 अप्रैल 2010  समीप आ रही है आप सभी लेखकों एवं  पाठकों से आग्रह है की अपने निबंध अतिशीघ हम तक पहुंचा दें, प्रतियोगिता की शर्तों ,विषय एवं इनामी राशि के बारे में जानने के लिए यहाँ क्लीक करें   संजय सेन सागर  आगे पढ़ें के आगे यहाँ

लो क सं घ र्ष !: इंसाफ की देवी को शर्मिन्दा करते इंसाफ के देवता

देश के कानून मंत्री वीरप्पा मोयली ने न्यायालयों की जवाबदेही बनाए जाने का कानून बनाने का जिक्र करके एक लाईलाज और अति घातक बीमारी का दर्द उठाया है। सभ्य समाज को पाप व दुराचार से पाक रखने के लिए ही न्यायिक व्यवस्था का गठन किया गया था पहले जब देश आजाद नहीं था तो अंग्रेजों के दो सौ वर्षों से ऊपर के शासनकाल और उससे पूर्व मुस्लिम शासकों के साढे़ पांच सौ साल व उससे पूर्व के हिन्दू राजा- महाराजाओं के शासनकाल में दरबार, शरई अदालते व कोर्ट में लार्डशिप जनता को न्याय देने का कार्य किया करते थे। इंसाफे जहांगीरी की चर्चा की खूब प्रशंसा इतिहासकारों ने की। परन्तु प्रशंसा का आधार सदैव निष्पक्ष न्याय पर आधारित होता था जो बादशाह सलामत या राजाराम ने अपने दौरे हुकूमत या रामराज्य में किया। उस समय फरियादी व अपराधी के बीच वकील की भूमिका नहीं हुआ करती थी। फरियादी की फरियाद तथ्यों साझों के आधार पर न्याय की कुर्सी पर बैठकर हाकिमे वक्त सुनते थे और खून के रिश्तों, ऊँच नीच से ऊपर उठकर न्याय किया करते थे। जहांगीर ने तो अपने महल के बाहर एक घण्टा लटका कर चैबीसों घण्टे फरियादी को अपनी फरियाद दर्...

कभी खिलाड़ी कभी अनाड़ी

हम पैसे का एक बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचार में बरबाद होने देते हैं। हम अरबों डॉलर काला धन स्विस बैंकों में पड़ा रहने देते हैं और वह भी तब जब स्विस इस धन के स्वामित्व के ब्योरे उजागर करने को तैयार हों। हम लाखों लोगों को भूखों मरने देते हैं, जबकि लाखों टन अनाज खुले में सड़ रहा होता है। हम एक ही समय में इतने कुशल रूप से भ्रष्ट और अनाड़ी कैसे हो सकते हैं? भारत में हर चुनाव तीन वादों के आधार पर लड़ा जाता है। पहला - भ्रष्टाचार से लड़ाई और भ्रष्ट को सजा। दूसरा - अर्थव्यवस्था में काले धन की आवाजाही सीमित करना और विदेशों में इसे जहां भी गुपचुप तरीके से जमा किया गया है, वहां से उसे वापस लाना। तीसरा - मुद्रास्फीति से जूझना और महंगाई को नियंत्रित करना ताकि आप और हम हर साल मुद्रास्फीति से हारी हुई लड़ाई लड़ने की बजाय अपने जीवन स्तर के मानकों की रक्षा कर सकें। मजे की बात तो यह है कि ठीक यही वे बिंदु हैं, जिन पर सभी सरकारें विफल रहती हैं। वह इसलिए नहीं विफल रहतीं कि उन्होंने कोई गंभीर प्रयास किया था और अपना लक्ष्य नहीं पा सकीं। वे इसलिए विफल रहती हैं क्योंकि ये वादे कभी पूरे करने के लिए किए ही नहीं...

काव्य रचना: मुस्कान --संजीव 'सलिल'

काव्य रचना: मुस्कान संजीव 'सलिल' जिस चेहरे पर हो मुस्कान, वह लगता हमको रस-खान.. अधर हँसें तो लगता है- हैं रस-लीन किशन भगवान.. आँखें हँसती तो दिखते - उनमें छिपे राम गुणवान.. उमा, रमा, शारदा लगें रस-निधि कोई नहीं अनजान.. 'सलिल' रस कलश है जीवन सुख देकर बन जा इंसान.. ***********************

लो क सं घ र्ष !: सत्ता की डोली का कहार, बुखारी साहब आप जैसे लोग हैं

दिल्ली की जामा मस्जिद के इमाम अहमद उल्ला बुखारी ने कहा कि धर्मनिरपेक्षता का ढोंग रचने वाली सियासी पार्टियों ने आजादी के बाद से मुसलमानों को अपनी सत्ता की डोली का कहार बना दिया है। बुखारी जी आपका बयान बिल्कुल ठीक है परन्तु क्या आप इस बात से इत्तेफाक़ करेंगे कि सियासी पार्टियों को यह मौका फराहम कौन करता है? आप और आपके बुज़रगवार वालिद मोहतरम जो हर चुनाव के पूर्व अपने फतवे जारी करके इन्हीं राजनीतिक पार्टियों, जिनका आप जिक्र कर रहे हैं, को लाभ पहुँचाते थे। लगभग हर चुनाव से पूर्व जामा मस्जिद में आपकी डयोढ़ी पर राजनेता माथा टेक कर आप लोगों से फतवा जारी करने की भीख मांगा करते थें। वह तो कहिए मुस्लिम जनता ने आपके फतवों को नजरअंदाज करके इस सिलसिले का अन्त कर दिया। सही मायनों में राजनीतिक पार्टियों की डोली के कहार की भूमिका तो मुस्लिम लीडरों व धर्मगुरूओं ने ही सदैव निभाई जो कभी भाजपा के नेतृत्व वाली जनता पार्टी या एन0डी0ए0 के लिए जुटते दिखायी दिये तो कभी गुजरात में नरेन्द्र मोदी का प्रचार करने वाली मायावती की डोली के कहार। मुसलमानो की बदहाल जिन्दगी पर अफसोस करने के बजाए उसकी...