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लो क सं घ र्ष !: आधुनिक राजा - महाराजा

महंगाई जिससे 90 करोड़ से अधिक लोगो का जीवन त्रस्त हो गया है लोग भूखो मर रहे हैं । उसकी चर्चा हमारे देश की संसद में हुई तब जब जमाखोरों , मिलावटखोरों ने अथाह मुनाफा कम लिया । संसद नहीं बोली क्योंकि वह चाहती थी कि जिनके चंदे से उनकी पार्टियां चल राही हैं वह मुनाफा कम लें और जनता में भी उनकी छवि थोड़ी - बहुत ठीक रहे तो महंगाई पर चर्चा कर ली । दोनों हाथों में लड्डू होने चाहिए । माननीय सांसदों ने यही किया । संसद में लगभग 300 सदस्य उद्योगपति हैं या आर्थिक आधार पर अरबपति से ज्यादा मजबूत स्तिथि वाले लोग हैं । उनको महंगाई की पीड़ा से कोई लेना देना नहीं है । संसद में मेहनतकश तबको का प्रतिनिधित्व कम है । उनकी आवाज का कोई भी अर्थ वहां नहीं रह जाता है । शशि थरूर से लेकर तृणमूल कांग्रेस के संसद को 5 स्टार बिलों को देखकर यह लगता है कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद के ज़माने से राजा महाराजाओं कि शानो शौकत इनके आगे फीकी है । जनता को अपना प्रतिनिधि चुनते समाये ...

लो क सं घ र्ष !: मुंबई आतंकी घटना का सच

मुंबई आतंकी घटना को अमेरिकन साम्राज्यवाद व उसकी पिट्ठू देश इजराइल की खुफिया एजेंसी मोसाद ने कराई थी । अब यह बात पूरी तरह से सच साबित हो राही है । सी . आई . ए व एफ . बी . आई एजेंट डेविड कोलमैन हेडली की गिरफ्तारी के बाद यह बात स्पष्ट रूप से साबित हो गयी है । अमेरिका दुनिया में किसी का मित्र नहीं है । सन् 1947 के बाद पकिस्तान उसकी दोस्ती के पाले में रहा । सी . आई . ए व मोसाद ने उसके देश में आम नागरिकों को प्रशिक्षण देकर तालिबान बना दिया और आज अमेरिकन राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा पकिस्तान के अन्दर अपनी सेना भेज कर तालिबान को नष्ट करने की बात कर रहे हैं । पकिस्तान की संप्रभुता को अमेरिकन साम्राज्यवाद ने जब - जब चाहा है खंडित किया है । भारत अमेरिकन साम्राज्यवाद का नया दोस्त बना है । दोस्ती का ईनाम मुंबई आतंकी घटना भेंट स्वरूप मिल चुकी है । उसके मुख्य आरोपी डेविड कोलमैन हेडली अमेरिकन सरकार की गिरफ्त में है । भारत की जांच एजेंसियां उससे पूछ ताछ ...

लो क सं घ र्ष !: गंगा ही नहीं हमारा जीवन ही प्रदूषित कर दिया गया है

मानव सभ्यता नदियों के किनारे जन्मी है , पली है और बढ़ी है पानी के बगैर हम रह नहीं सकते हैं । विश्व में बड़े - बड़े शहर और आबादी समुद्र के किनारे है या नदियों के किनारे पर स्तिथ है । कभी भी जल के श्रोत्रों को कोई गन्दा नहीं करता था लेकिन जब पूँजीवाद ने अपने विचारों के तहत मुनाफा को जीवन दर्शन बना दिया है , तब से हर चीज बिकाऊ हो गयी है जल श्रोत्रों को भी गन्दा करने का काम उद्योगपतियों, इजारेदार पूंजीपतियों ने मुनाफे में अत्यधिक वृद्धि के लिए गन्दा कर दिया है । हमारा जनपद बाराबंकी जमुरिया नदी के किनारे पर था और अब जमुरिया नाले के किनारे है । जनपद मुख्यालय के पास एक शुगर मिल स्थापित होती है जिसका सारा गन्दा पानी जमुरिया में गिरना शुरू होता है और फिर तीन और कारखाने लगते हैं जिनका सारा कूड़ा - कचरा जमुरिया में गिरकर नाले में तब्दील कर दिया है । नगर नियोजकों ने जो पूंजीवादी मानसिकता से ग्रसित हैं । उन लोगो ने शहर के सम्पूर्ण गंदे पानी...

किराये का मकान

आशियाना बनाने की सोचते-सोचते उम्र बीत गई किराये के मकान में आजकल आजकल आजकल आजकल गुजर बसर हो गई इसी खींचतान में पिता फिर मां विदा हुईं यहीं से श्मशान में फिर भी अपना कुछ नहीं किराये के मकान में बच्चों को मार, डांट, प्यार और पुचकार रिश्तेदारों की फौज, आवभगत मानसम्मान न्योते, बधाई, दावत और खूब मचा धमाल अब भी तनहा रह गए इस मुकाम में फिर भी अपना कुछ नहीं किराये के मकान में भाई का लड़ना और बहन का थप्पड़ जड़ना मां के आंचल में जा रोना और उसका गुस्सा होना कितनी यादें समेटे ये आंगन इस मकान में फिर भी अपना कुछ नहीं किराये के मकान में बच्चे बढ़े, पढ़े और नौकरी पे दूर प्रदेश चले मैं अकेला ही रह गया किराये के मकान में और वो भी कहीं आशियाना बना नहीं पा रहे अपनी जमीन से दूर हैं किसी किराये के मकान में किराये का मकान अब सताने लगा अपनी छत का मतलब समझ आने लगा अपने अपनी ही छत के नीचे मिलते हैं आदमी अकेला रह जाता है किराये के मकान में।। -ज्ञानेन्द्र

लो क सं घ र्ष !: ‘‘आस्तीन के सांप और दूध पिलाने वाले’’

अब हैं हमारे जनप्रतिनिधि महान जो करते हैं राजनीति जाति, धर्म और क्षेत्रवाद की। पर लागू नहीं होता कोई कानून, न लगता है NSA, न लगता है मकोका। आखिर जनता और रियाया है इन्ही के खिलवाड़ की चीज। क्यूं नही लगवाते रोक, जाति, धर्म और क्षेत्रवाद की राजनीति पर? न्हीं लगवायेंगे! क्योंकि हमाम में सब हैं नंगे। क्या राष्ट्रीय! क्या क्षेत्रीय! इन्होंने ही तो पाला था भस्मासुर पंजाब का, जिसने मरवाये, बच्चे, बूढ़े, महिलाएं अनेक, जिनकी तादात हजारों में नहीं लाखों में थी। यही हाल कश्मीर, आसाम, मणिपुर का अभी भी है। मरे जा रहे हैं रोज अनेक, कभी गोलियों से, कभी बारूद के धमाकों से, उड़ते हैं चीथड़े, खून के लोथड़े, इंसानी अंगों के और इंसानियत के भी। मरते हैं रोज वर्दी वाले या बिना वर्दी के, हैं तो सब ही भारत मां के सपूत। फिर ऐसा क्यूं होता है? वर्दी वाला मरा तो इंसान मरा, बिना वर्दी के मरा तो कुत्ता मरा। आखिर क्यूं चलवाते हैं, प्रदर्शनकारी भीड़ पर गोली? आखिर क्यों करवाते हैं, फर्जी एन्काउन्टरों में सतत् हत्यायें? आखिर क्यूं छीनते हैं, जीवित रहने का नैसर्गिक संवैधानिक अधिकार? कानून व्यवस्था के बहाने, फर्जी क्राइम रिका...

गीत: एक कोना कहीं घर में, और होना चाहिए... संजीव 'सलिल'

गीत एक कोना कहीं घर में, और होना चाहिए... * याद जब आये तुम्हारी, सुरभि-गंधित सुमन-क्यारी. बने मुझको हौसला दे, क्षुब्ध मन को घोंसला दे. निराशा में नवाशा की, फसल बोना चाहिए. एक कोना कहीं घर में, और होना चाहिए... * हार का अवसाद हरकर, दे उठा उल्लास भरकर. बाँह थामे दे सहारा, लगे मंजिल ने पुकारा. कहे- अवसर सुनहरा, मुझको न खोना चाहिए. एक कोना कहीं घर में, और होना चाहिए... * उषा की लाली में तुमको, चाय की प्याली में तुमको. देख पाऊँ, लेख पाऊँ, दुपहरी में रेख पाऊँ. स्वेद की हर बूँद में, टोना सा होना चाहिए. एक कोना कहीं घर में और होना चाहिए... * साँझ के चुप झुटपुटे में, निशा के तम अटपटे में. पाऊँ यदि एकांत के पल, सुनूँ तेरा हास कलकल. याद प्रति पल करूँ पर, किंचित न रोना चाहिए. एक कोना कहीं घर में और होना चाहिए... * जहाँ तुमको सुमिर पाऊँ, मौन रह तव गीत गाऊँ. आरती सुधि की उतारूँ, ह्रदय से तुमको गुहारूँ. स्वप्न में देखूं तुम्हें वह नींद सोना चाहिए. एक कोना कहीं घर में और होना चाहिए... *

हार्दिक क्षमा याचना

सहारनपुर वासियों से हार्दिक क्षमा याचना   सहारनपुर :  १३ दिसंबर :   होटल स्काइलार्क , अंबाला रोड सहारनपुर को सभागार बुकिंग हेतु अग्रिम भुगतान करने के बावजूद अंतिम समय में पूर्व निश्चित सभागार देने से मना कर देने के कारण द सहारनपुर डॉट कॉम का लोकार्पण कार्यक्रम आपात्कालीन ढंग से रामतीर्थ केन्द्र , अंबाला रोड में अंतरित किया गया। कार्यक्रम के आयोजकों द्वारा आपात्कालीन ढंग से फोन और एस.एम.एस. द्वारा सैंकड़ों अभ्यागतों को स्थान परिवर्तन की सूचना दी गई ,  होटल के बाहर सहायक खड़े किये गये जो आमंत्रितों को स्थान परिवर्तन की जानकारी दे सकें।  जनरेटर व जलपान की व्यवस्था के जैसे - तैसे करके वैकल्पिक प्रबंध किये गये।  नगर के सैंकड़ों बुद्धिजीवी , पत्रकार , साहित्यकार , कलाकार , उद्यमी एवं व्यापारी जिनको ससम्मान आमंत्रित किया गया था , होटल स्काइलार्क , अंबाला रोड सहारनपुर पहुंचे और वहां कार्यक्रम होता न देख कर किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति में वापिस लौट गये।  होटल स्काइलार्क के प्रबंधकों ने वहां पहुंचने वाले अतिथियों को स्थान परिवर्तन की सूचना देने में अप...