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लो क सं घ र्ष !: भू लोक से लोगो को बिना टिकट स्वर्ग लोक भेजने का कार्य

प्रधानमंत्री जी , रेल मंत्री पद पर सुश्री ममता बनर्जी आसीन हैं । रेल विभाग की हालत यह हो गई है कि प्रतिदिन अखबार के मुख्य पृष्ट से ज्ञात होता है कि कोई न कोई दुर्घटना हो गई है । आज के अखबार में छपा है कि गोरखधाम एक्सप्रेस ट्रक से टकराया या आए दिन ट्रेन टे्क्टर भिडंत में 4 मरे ", " ओवर स्पीडिंग से मंडोर एक्सप्रेस पलटी , 7 मरे ", " मालगाड़ी पलटी रेल मार्ग ठप " के शीर्षक से समाचार प्रकाशित होते रहते हैं । मुझे भी अम्बाला से लखनऊ तक की यात्रा का अच्छा अनुभव इस बीच में हुआ । स्लीपर क्लास के डिब्बे में चार शौचालय होते हैं चारो टूटे - फूटे थे । उनके दरवाजे टूटे थे , पानी नदारद था यात्री सुविधाएं शून्य थी । हाँ हर बड़े स्टेशन पर चेकिंग स्टाफ आकर यात्रियों से वसूली जरूर कर रहा था , जुर्माने कर रहे थे । रेलवे के अधिकारीयों से बात करने पर यह भी पता चला कि टै्फिक स्टाफ बहुत कम है जो स्टाफ है उससे 18 - 18 घंटे कार्य लिया जा ...

लो क सं घ र्ष !: इन्साफ की खातिर

उत्तर प्रदेश के अल्पसंख्यक आयोग के चेयरमैन व ( मंत्री पद प्राप्त ) वरिष्ट अधिवक्ता पूर्व एडवोकेट ज़नरल श्री एस . एम काजमी ने एस . टी . एफ द्वारा खालिद मुजाहिद को 16 दिसम्बर 2007 को मडियाहूँ , जिला जौनपुर से पकड़ कर २२ दिसम्बर 2007 को बाराबंकी रेलवे स्टेशन पर आर . डी . एक्स व ड़िकोनेटर की बरामदगी दिखाकर जेल भेज दिया था , के मामले में अपने पद की परवाह न करते हुए दिनांक 20 नवम्बर 2009 लो माननीय उच्च न्यायलय इलहाबाद खंडपीठ लखनऊ में खालिद मुजाहिद की तरफ़ से जमानत प्रार्थना पत्र पर बहस की । आज की दौर में पद पाने के लिए लोग सब कुछ करने के लिए तैयार रहते हैं । वहीं श्री काजमी उत्तर प्रदेश के न्यायिक इतिहास में ( जहाँ तक मुझे ज्ञात है ) पहली बार सरकार के ग़लत कार्यो के विरोध करने के लिए किसी मंत्री पद प्राप्त व्यक्ति ने किसी अभियुक्त की तरफ़ से वकालत की हो । ज्ञातव्य है कि एस . टी . एफ पुलिस के अधिकारियो ने कचहरी सीरियल बम ब्लास्ट ( लखनऊ , फैजाबाद , वा...

खटमल की विरादरी..

हुआ यूं की हम अपने बड़े पिता जी के साथ अपने चचेरे भाई की ससुराल गए थे। भैस लाने गए थे ,जी की दहेज़ में मिली थी। वहा पहुचने पर स्वागत सत्कार हुआ। बैठे बैठे हम और बडके पापा बातें कर रहे थे। लगा की जैसे कुछ काट रहा हो। तो हमने पापा से बोला लगता है, हमें कुछ काट रहा है, तो बडके पापा ने टार्च जला के देखा तो बोले बेटे यहाँ तो सोना मुशिकल है क्यो की खटिया में बहुत ही खटमल है । और सावन का महीना था बादल छाए थे। हमने बोला मैतो यही सोऊ गा क्यो की बार बार उठने से नींद ख़राब होगी। बेटा देखना नींद ही नही आएगी खटमल जाति बड़े सवादी होते है। अभी देखना कैसे इनकी मंडली जुटती है। ये अपने आस पास के सभी खटमलो को नेवता भेज दिए होगे। आज रात में आ जाना नए नए लोग आए है फलाने के यहाँ । मै उंकी बातो को सुन कर हँसाने लगा तब तक खाना खाने के लिए बुलावा आया हम लोग खाना खाने चले गए। खाना खाने के बाद हम और बडके पापा पेशाब करने के लिए बाहर गए की बदके पापा ने टार्च जलाया तो बोल पड़े इधर देख बेटा जब मै बता रहा था तो तू हंस रहा था । अब अपनी आँख से देख ले मै देखा तो अचम्भे में पड़ गया की वास्तव में खटमल की विरादरी क्या होती ...

लो क सं घ र्ष !: नारी सशक्तीकरण का मूलमंत्र

आप कहते हैं तो कहा करें! मैं अपने दोस्तों और अपनी बात जरूर करूंगा, अभी हाल ही में मेरे दोस्त सत्येन्द्र राय सपत्नीक मेरे घर आये और हम दोनों दम्पत्तियों के बीच बात शुरू हुई। मेरी पत्नी की तरह सत्येन्द्र राय की पत्नी कामकाजी महिला हैं। दोनों प्राप्त होने वाला अपना वेतन अपने घर पर खर्च करती हैं। यह बात मेरे साथ मेरे मित्र भी स्वीकार करते हैं। घर का खर्च उठाना ही नहीं बल्कि घर के कामकाज की भी जिम्मेदारी दोनों बखूबी संभालती हैं। यह तारीफ मैं अपनी और अपने मित्र की पत्नी को खुश करने के लिए नहीं कर रहा हूं बल्कि उनके सशक्तीकरण पर कुछ सवाल उठा रहा हूं। हम दोनों मित्र अपनी पत्नियों को शायद ही कभी कुछ कहते हों सिवाय उनकी तारीफ के, क्योंकि वह तारीफ के लायक हैं। जब बात शुरू हुई तो हम दोनों ने खुले मन स्वीकार किया कि हम खुले मन से निःसंकोच महिला सशक्तीकरण की बात करते हैं लेकिन अपने घर की महिलाओं की समर्पण की भावना को सहज रूप मेे स्वीकार कर लेते हैं और उनको जी-तोड़ मेहनत से बचाने का प्रयास नहीं करते। इसके पीछे हमारी सोच यह भी हो सकती है कि परिवार रूपी गाड़ी के दोनों पहिये सुगमता से चलते रहें तो गाड़ी ...

नवगीत: कौन किताबों से/सर मारे?... आचार्य संजीव 'सलिल'

नवगीत: आचार्य संजीव 'सलिल' कौन किताबों से सर मारे?... * बीत गया जो उसको भूलो. जीत गया जो वह पग छूलो. निज तहजीब पुरानी छोडो. नभ की ओर धरा को मोड़ो. जड़ को तज जडमति पछता रे. कौन किताबों से सर मारे?... * दूरदर्शनी एक फलसफा. वही दिखा जो खूब दे नफा. भले-बुरे में फर्क न बाकी. देख रहे माँ में भी साकी. रूह बेचकर टका कमा रे... कौन किताबों से सर मारे?... * बटन दबा दुनिया हो हाज़िर. अंतरजाल बन गया नाज़िर. हर इंसां बन गया यंत्र है. पैसा-पद से तना तंत्र है. निज ज़मीर बिन बेच-भुना रे... *

लो क सं घ र्ष !: लोकसंघर्ष पत्रिका का फोटो फीचर -2

लोकसंघर्ष पत्रिका का फोटो फीचर