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लो क सं घ र्ष !: समय की सबसे बड़ी गाली-2

समय की सबसे बड़ी गाली का पहला भाग पढने के लिए यहाँ क्लिक करें ट्रेन में सफर करते हुए अगर कुछ सैनिक मिल जाएँ तो सम्मान से अपनी रिजर्व सीट छोड़ दें, अन्यथा आपको जबरदस्ती उठा दिया जाएगा, गुस्सा आने पर चलती ट्रेन से धक्का भी दिया जा सकता है। आज-कल सेना के जवानों द्वारा सिवीलियन्स की पिटाई, हत्या और बलात्कार जैसी घटनाएँ अक्सर सुनने में मिलती हैं। पता नहीं उन्होंने यह सब करना अपना अधिकार समझ लिया है या यह कुण्ठा है जो कहती है ‘‘इन्हीं लोगों की सुरक्षा के नाम पर हमें अमानवीय परिस्थितियों में रहना पड़ता है।‘‘ सच है-वे बहुत काम करते हैं, वे इतने व्यस्त हैं कि सी.आर.पी.एफ. भी अब रिजर्व नहीं रहा। इसके 87 फीसदी जवान किसी न किसी मुहिम से जुड़े हैं। जम्मू-कश्मीर में 39 प्रतिशत पूर्वोत्तर राज्य में 29 प्रतिशत और 19 फीसदी जवान देश के अन्दरूनी इलाकों में नक्सलियों से लड़ रहे हैं। जम्मू-कश्मीर में कठिन और लम्बे संघर्ष तथा पाकिस्तान की नकारात्मक भूमिका के बावजूद क्या भारत कश्मीर की समस्याओं में अपना हाथ होने से खुद को पूरी तरह निर्दोष करार दे सकता है। पूर्वोत्तर राज्यों की हम बात भी कैसे कर सकते हैं ज...

मरो न व्यंग तीर.. जवानी का दोस्तों..

मारो न ब्यंग तीर जवानी का दोस्तों॥ पूछो न घटित घटना कहानी का दोस्तों॥ हम जा रहे अकेले रास्ते में मिली थी॥ उदास चेहरा लेके अकेले ही खड़ी थी॥ आता जो मुशाफिर आँखे टिकाता था॥ मन में खुशी के कुछ गीत गाता था॥ खोलती जुबान न थी रोकती थी होश को॥ मारो न ब्यंग तीर जवानी का दोस्तों॥ पूछो न घटित घटना कहानी का दोस्तों॥ मै जा रहा उधर को मुलाक़ात होगयी॥ चेहरा देखते ही आँखे चार हो गयी॥ सायकिल पर सवार थी हंस करके मैंने बोला॥ क्या बात है हूजुर गमगीन क्यो है ? चोला॥ हमें कही है जाना कुछ छोड़ दो॥ मारो न ब्यंग तीर जवानी का दोस्तों॥ पूछो न घटित घटना कहानी का दोस्तों॥ पीछे नही था साधन आगे उसे बिठाया॥ उत्तर से सायकिल को पूरब की तरफ़ घुमाया॥ जब सिमट करके बैठी चुल-बुली सी मच गयी॥ मानो बदन में मेरे बिजली चमक गयी॥ मजबूर मै बना खोया था जोश को ॥ मारो न ब्यंग तीर जवानी का दोस्तों॥ पूछो न घटित घटना कहानी का दोस्तों॥ गिरा दिया बगल में देखा जब नज़ारा॥ मै बेहोश गिर पडा न चाँद न सितारा॥ पहली बार प्यार का यही एक धक्का लगा॥ ओ कोई नार नही हमें छक्का लगा॥ जेब मेरी साफ़ थी खोया था नोट को॥ मारो न ब्यंग तीर जवानी का दोस्तों॥ पूछो न घ...

बुढापे मा..

हमके सूझे न डगारिया॥ बुढ़ाई बेरिया॥ दुई लैका दुइनव अल्गारेन॥ नइखे poochhe पानी का॥ गुजरा ज़माना याद करी हम॥ रोई अपने जवानी का॥ चार बात उपरा से देवे॥ समझे लागे आपन चेरिया॥ हमके सूझे न डगारिया॥ बुढ़ाई बेरिया॥ नाती पोता मुह लडावे॥ सुने न कौनव काम॥ देहिया कय पौरुष जाय चुका॥ अबतो लागल पुण्य विराम॥ उन्ही के मुहवा पे बोले॥ नन्कौना कय हमारे धेरिया॥ हमके सूझे न डगारिया॥ बुढ़ाई बेरिया॥

"जो कुछ करते नहीं वो मर जाते हैं" - विश्वविख्यात कत्थक नृत्यांगना एवं विश्व की सबसे छोटी आयु की योगाचार्या - प्रतिष्ठा शर्मा

" जो कुछ करते नहीं वो मर जाते हैं"  विश्व की सबसे छोटी आयु की योगाचार्या एवं विश्वविख्यात कत्थक नृत्यांगना प्रतिष्ठा शर्मा के मनोरंजक संस्मरण जो वह खाड़ी देशों की यात्रा से लौट कर आपके साथ बांट रही हैं।   www.thesaharanpur.com/gulf.html   " सहारनपुर की धरती पर पांच सौ कलाकार अपने कैनवस और तूलिका के साथ अपनी कल्पनाओं को रंग भरने में जुटे।"  - सृजन २००९ फोटो गैलरी में मिलिये इन बाल एवं युवा कलाकारों से।   www.thesaharanpur.com/drawingcomp.html    

लो क सं घ र्ष !: समय की सबसे बड़ी गाली-1

मैं एक भारतीय हूँ और हर भारतीय की तरह मुझे कुछ मूल्य घुट्टी में मिले हैं। मसलन परम्परा, देश और देश की सेना पर गर्व करना। हालाँकि ये समझना मुश्किल है कि हमारी परम्परा क्या है और देश का मतलब टाटा, अम्बानी और मित्तल है या फिर जनता; जिसमें किसान भी हैं और दूर दराज के आदिवासी भी; इसमें क्या वाकई बेरोजगार भी शामिल होते हैं? पर छोड़िए ना मैं देश पर गर्व करता हूँ और मानता हूँ कि सीमाओं की रक्षा करने वाले हमारे जवान कठिन परिस्थितियों में मौत का सामना करते हैं। अब जबकि उन पर गर्व करना कर्तव्य ही नहीं धर्म भी है तो हर भारतीय की तरह मैं भी उन पर गर्व करना चाहता हूँ। पर क्यों मनोरमा की लाश आँखांे के सामने आ जाती है। क्यों वस्त्रहीन दौड़ती हुई महिलाओं की दर्द भरे गुस्से की चीख दिल को चीर देती है ‘‘आओ! गाड़ दो अपना तिरंगा हमारी छाती पर।‘’ मनोरमा, याद है ना आपको, जुलाई 2004 में उनकी लाश झाड़ियों में पड़ी मिली। सात दिनों पहले सेना के जवानों ने उन्हें आतंकियों का सहयोगी होने के संदेह में, बिना किसी लिखा-पढ़ी या वारन्ट के घर से अगवा कर लिया था। पोस्टमार्टम की रिपोर्ट के अनुसार उनके शरीर पर भयंकर शारीरिक यातना...

अगले जन्म मोहे बिटिया न कीजो

एनआरआई दुल्हों का संताप झेल रही लड़कियों का दर्द हम लड़कियां है, क्या यही हमारा गुनाह है? माता-पिता ने विदेश में सैटल करवाने के मकसद से हमारी शादी एनआरआई लड़कों से कर तो दी, लेकिन हम आज भी मायके में हैं। पति हमें छोड़कर विदेश जा चुके हैं। हमें न्याय की दरकार हैजाने-अनजाने एनआरआई लड़कों से विवाह हो गया। एनआरआई पति विवाह रचाने के बाद छोड़कर विदेश चले गए। अब हमारे पास मायके में रहकर न्याय के लिए चक्कर काटने के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचा। यह दर्द भरी दास्तां सुनाई एनआरआई युवकों की सताई 24 लड़कियों ने। सर्किट हाउस में मंगलवार को फफक-फफक कर रोते हुए लड़कियों ने कहा कि आखिर वे लड़कियां क्यों हैं? उन्हें अब किसी भी जन्म में लड़की नहीं बनना है। केस-1 कमलजीत कौर की मार्च-2002 में मक्खनलाल से विवाह हुआ और दो साल बाद वह फ्रांस चला गया। पांच साल बाद मक्खनलाल वापस लौटा तो 11 अगस्त को दूसरा विवाह रचा लिया। विवाह करवा कर वह फिर फ्रांस चला गया। अब कमलजीत कौर परिजनों के साथ थाना, पुलिस और अदालत के चक्कर काट रही है केस-2 लतारानी का विवाह अप्रैल-2009 में कपूरथला के अमरजीत के साथ हुआ। डेढ़ माह बाद अमरजीत...

नव गीत : चलो भूत से मिलकर आएँ... -संजीव 'सलिल'

नव गीत : संजीव 'सलिल' चलो भूत से मिलकर आएँ... * कल से कल के बीच आज है. शीश चढा, पग गिरा ताज है. कल का गढ़ है आज खंडहर. जड़ जीवन ज्यों भूतों का घर. हो चेतन घुँघरू खनकाएँ. चलो भूत से मिलकर आएँ... * जनगण-हित से बड़ा अहम् था. पल में माटी हुआ वहम था. रहे न राजा, नौकर-चाकर. शेष न जादू या जादूगर. पत्थर छप रह कथा सुनाएँ. चलो भूत से मिलकर आएँ... * जन-रंजन जब साध्य नहीं था. तन-रंजन आराध्य यहीं था. शासक-शासित में यदि अंतर. काल नाश का पढता मंतर. सबक भूत का हम पढ़ पाएँ. चलो भूत से मिलकर आएँ... *