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लो क सं घ र्ष !: या सुंदर केवल आशा...

आशा का सम्बल सुंदर , या सुंदर केवल आशा । विभ्रमित विश्व में पल - पल , लघु जीवन की प्रत्याशा ॥ रंग मंच का मर्म कर्म है , कहीं यवनिका पतन नही । अभिनय है सीमा रेखा , कहीं विमोहित नयन नही ॥ सत् भी विश्व असत भी है , पाप पुण्य ही हेतु बना । कर्म मुक्ति पाथेय यहाँ , स्वर्ग नर्क का सेतु बना ॥ डॉक्टर यश वीर सिंह चंदेल ' राही '

एक दिन ऐसा आयेगा॥

एक दिन ऐसा आयेगा॥ नदिया नहलाएगी..मुझको॥ पवन हिलोरे देकर्के॥ आँचल में सुलायेगी ..मुझको॥ ख़ुद आकरके पुष्प पवन लता से॥ हार पिन्हाई गे मुझको॥ नभ से बादल हस करके॥ अमृत पिलायेगे मुझको॥ नई नवेली दुल्हन अर्थी॥ फ़िर अपनायेगी मुझको॥ एक दिन ऐसा आयेगा॥ नदिया नहलाएगी..मुझको॥

गीतिका: शब्द-शब्द से छंद बना तू। --आचार्य संजीव 'सलिल'

शब्द-शब्द से छंद बना तू। श्वास-श्वास आनंद बना तू॥ सूर्य प्रखर बन जल जाएगा, पगले! शीतल चंद बना तू॥ कृष्ण बाद में पैदा होंगे, पहले जसुदा-नन्द बना तू॥ खुलना अपनों में, गैरों में ख़ुद को दुर्गम बंद बना तू॥ 'सलिल' ठग रहे हैं अपने ही, मन को मूरख मंद बना तू॥ ********************

विभाजन से मुसलमानों का ही नुकसान हुआ है

सलीम अख्तर सिद्दीक़ी जसवंत सिंह की किताब के बहाने पाकिस्तान के तथाकथित कायद-ए-आजम मौहम्मद अली जिनाह (सही शब्द जिनाह ही है, जिन्ना नहीं) एक बार फिर चर्चा के विषय बने हुए हैं। जिनाह की चर्चा हो और भारत विभाजन का का जिक्र न हो यह सम्भव नहीं है। क्या विभाजन जिनाह की जिद ने कराया ? क्या नेहरु और पटेल विभाजन के जिम्मेदार थे ? क्या अंग्रेजों ने भारत को कमजोर करने के लिए भारत को विभाजित करने की साजिश की थी ? इन सब सवालों पर बहस होती रही है और होती रहेगी। इन सवालों का कभी ठीक-ठीक जवाब मिल पाएगा, यह कहना मुश्किल है। असली सवाल यह है कि विभाजन की त्रासदी किसने सबसे ज्यादा झेली और आज भी झेल रहे हैं। सच यह है कि विभाजन की सबसे ज्यादा मार भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमानों के ही हिस्से में आयी है। वे तीन हिस्सों में बंट गए। बंटने के बाद भी जिल्लत से निजात नहीं मिली। जिन उर्दू भाषी मुसलमानों ने पाकिस्तान को अपना देश मानकर हिन्दुस्तान से हिजरत की थी, वे आज भी पाकिस्तानी होने का सर्टिफिकेट नहीं पा सके हैं। उन्हें आज भी महाजिर (शरणार्थी) कहा जाता है। पाकिस्तान के सिन्धी, पंजाबी और पठान महाजिरों को निशाना बनात...

लो क सं घ र्ष !: मेजबान होटल लखनऊ में लोकसंघर्ष पत्रिका के कार्यक्रम के कुछ द्रश्य

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लो क सं घ र्ष !: लोकसंघर्ष पत्रिका का कवर (सितम्बर 09 )

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ग़ज़ल --आशिकी की डोर---

बाद मुद्दतके मिले ,मिले तो ज़नाब । गुंचाए -दिल खिले ,खिले तो ज़नाब। तमन्नाएं , आरजू, चाहतें पूरी हुईं , हसरतें -दिले निकलीं,निकलीं तो ज़नाब। खुदा की मेहर्वानियों की ऐसीबरसात हुई, सिलसिले मिलने के हुए,हुए तो ज़नाब। इक नए बहाने से ,तुमने बुलाया हमें , बाद मुद्दत के खुले,खुले तो ज़नाब। कहते थे भूल जाना ,भूल जायेंगे हम भी, भूले भी खूब, खूब याद आए भी ज़नाब। अब न वो जोशो-जुनूँ,न वो ख्वाहिशें रहीं, आना न था फ़िर भी, आए तो ज़नाब । आशिकी की ये डोर भी ,कैसी है 'श्याम, न याद कर पायें उन्हें,न भूल पायें ज़नाब॥