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शिवराज या फिर मोदी?

आशुतोष
मैनेजिंग एडिटर आईबीएन7


आशुतोष जी एक तेज तर्रार सोच के धनी व्यक्ति है,उनकी भाषाशैली और अपनी बात कहने का अंदाज़ पत्रकारिता और मीडिया की नयी पहचान को बंया करती है! आशुतोष जी का यह लेख काफी प्रभावशाली है!इसे मैंने ibn7 वेबसाइट से साभार यहाँ प्रकाशित किया है
गाली-गलौच के बीच आम धारणा यही बनती है कि ये राजनीति अपने लायक नहीं है। यहां सभ्य पढ़े लिखे लोगों के लिए जगह नहीं है। राजनीति करने के लिए किसी जाति विशेष या फिर किसी धर्म विशेष का होना जरूरी है। या फिर अपराध की दुनिया में पीएचडी तो हो ही। और अगर कुछ भी न किया हो तो इतना पैसा बैंक में हो कि वो आसानी से किसी भी पार्टी का टिकट खरीद सके। अगर दंगा कराना आता है तो किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री बनने का ख्वाब भी देख सकते है और शायद कुछ धन कुबेर आपको प्रधानमंत्री पद के दावेदार के तौर पर भी पेश कर सकते हैं।
लेकिन यकीन जानिए देश के लोकतंत्र की ये तस्वीर बदल रही है। हाल के दिनों में कुछ बुनियादी बदलाव की आहट आने लगी है। बहुत दूर नहीं बिहार ही चले जाइए। नीतीश बमबम हैं जबकि लालू खिसियाए हुए । बिहार के बारे में मशहूर था कि जाति बल, धर्म बल और बाहुबल की चाशनी तैयार और चुनाव आप की जेब में। कर्पूरी ठाकुर और जेपी के चेले लालू ने 15 सालों तक यही किया। यादव, मुस्लिम और साधू यादव - पप्पू यादव के गठबंधन ने उनकी कुर्सी सलामत रखी। लालू के करीबी कहते थे कि लालू को ये लगता है जैसे ही विकास करेंगे वो हार जाएंगे। सड़कें गायब, बिजली गायब, उद्योग गायब, बच्चे गायब। न जाने कितना चारा डकार गए लेकिन सत्ता नहीं गई।
ये सही है कि नीतीश ने मुख्यमंत्री बनते ही पिछड़ों में अति पिछड़ा, दलितों में महादलित और मुसलमानों में पसमांदा मुसलमानों को लुभाने के लिये चुनावी रणनीति बनाई। लेकिन इस बीच उन्होंने विकास की बात भी की। बिहार में सड़कें दिखने लगीं, बिजली आने लगी, बच्चे सुरक्षित घर पंहुचने लगे, कारों को शोरूम में ऱखने पर डीलर अब नहीं घबराते और डॉक्टरों और इंजीनियरों को रंगदारों का खौफ नहीं सताता। एक अध्ययन के मुताबिक बिहार में विकास की गति कई राज्यों से बेहतर है। पिछले दिनों जब मैं पटना गया तो कई ऐसे लोग मिले जिनका कहना था कि बिहार में लंबे समय के बाद उम्मीद की किरण नजर आई है और पंजाब और मुंबई जाने वाली लेबर को बिहार में ही रोजी-रोटी मिल रही है। कुछ ऐसी भी खबरें आईं कि उत्तर भारत जाने वाली लेबर अब वापस बिहार आने लगी है। लोग पूछ रहे हैं कि पिछड़ी जातियों की बात तो ठीक है लेकिन अगर लालू के आने से जंगल राज की याद फिर ताजा हो जाए तो नीतीश बेहतर हैं। और नीतीश के कॉन्फिडेंस का राज भी यही है।
यही खबर देश के दूसरे हिस्से से भी है। हाल का ताजा उदाहरण मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और दिल्ली हैं। शिवराज सिंह और रमन सिंह को बीजेपी में सबसे लाइटवेट माना जाता था। शिवराज मध्य प्रदेश में उमा भारती और बाबूलाल गौर के बाद तीसरी पसंद थे, और रमण सिंह जब मुख्यमंत्री बने तो 5 साल तक उन्हें ही यकीन नहीं था कि वाकई मुख्यमंत्री हैं। लेकिन आज ये दोनों ही बीजेपी के सबसे बड़े खेवनहार हैं। बीजेपी के नये चेहरे। शिवराज सिंह ने विधान सभा के चुनावों में भी नरेंद्र मोदी को अपने यहां आने पर ज्यादा जोर नहीं दिया। और कमोवेश यही हाल छत्तीसगढ़ का था। इस बार भी जब बीजेपी वरुण गांधी को पोस्टर ब्वाय बनाने में जुटी तो शिवराज ने फिर कहा उन्हें वरुण की जरूरत नहीं। शिवराज ने प्रज्ञा मसले पर कहा था कि ये हमारे यहां कोई मुद्दा नहीं है। जबकि प्रज्ञा की कर्मभूमि मध्य प्रदेश ही थी।
दिल्ली में भी कांग्रेसी खेमे में कम घाघ नहीं बैठे थे जब सोनिया की दया से शीला दीक्षित को कुर्सी मिली थी लेकिन तीन चुनाव लगातार जीत कर रिकार्ड बनाने वाली शीला दीक्षित ने पिछले दस सालों में दिल्ली की काया पलट दी और उनके विरोधी चित पड़े हैं। शीला को वोट विकास पर मिला और बीजेपी कुछ नहीं कर पाई, न नेता दे पायी और न ही उनके खिलाफ कोई मुद्दा खड़ा कर पाई। शिवराज ने जब मध्य प्रदेश की कमान संभाली थी तो बीजेपी बेहोश पड़ी थी लेकिन महज दो सालों में बीजेपी की हालत वो हो गई कि 2004 में 29 में से 25 सीट जीतने वाली बीजेपी से उम्मीद ये है कि वो सभी 25 सीटें बचा ले जाएगी। जो एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। छत्तीसगढ़ में भी अजीत जोगी की तमाम तिकड़म के बाद भी कांग्रेस जमीन पर ही पड़ी है।
ऐसे में ये कहा जा सकता है कि देश की राजनीति की दिशा बदल रही है,वोटर समझदार हो रहा है, एक नई सिविल सोसायटी खड़ी हो रही है जो नेताओं की जवाबदारी को तय करने के लिये तैयार है और उसे लगता है कि जाति, धर्म और पैसे के बल पर वोट झटकने वाले नेताओं की वजह से कब तक मूर्ख बनेंगे। बुनियादी सवाल धीरे-धीरे चुनाव में अहम हो रहे है इसलिये अब चुनाव आते ही 'एंटी-इनकमबेंसी' की बात चुनाव विश्लेषक कम कर रहे हैं। इस बदलाव के लिये औद्योगिकरण की बयार, टीवी मीडिया के प्रसार, साक्षरता के आंकड़ों में गुणात्मक परिवर्तन, जातियों के सेकुलराइजेशन और धर्म आधारित संघर्ष का भूत खड़ा करने वालों नेताओं की खुलती पोल, ने अहम भूमिका निभाई है।
ऐसे में सवाल ये उठता है कि इस नई राजनीति के 'आईकान' कौन होंगे? लालू यादव, नरेंद्र मोदी जैसे लोग या फिर शिवराज सिंह चौहान, नीतीश कुमार, शीला दीक्षित? ये बात बीजेपी के लिये ज्यादा सोचने की है क्योंकि उसकी छवि धर्म आधारित राजनीति कर समाज को तोड़ने की है। पार्टी को अगर लंबी राजनीति करनी है, देश में अपने बल पर सरकार बनानी है, समाज के सभी वर्गों के बीच सर्वस्वीकार्य बनना है तो मोदी बीजेपी के नेता होंगे या फिर शिवराज? अगर चुनाव जीतना ही पैमाना है तो फिर विकास, समरसता, सांप्रदायिक सौहार्द के रूप में शिवराज बेहतर हैं या फिर विकास, विभाजन और सांप्रदायिकता के पैकेज के साथ मोदी? चुनाव तो शिवराज भी जिता रहे हैं और मोदी भी। फैसला बीजेपी को करना है और दूसरी पार्टिंयों को भी। और जल्दी नहीं तो बस निकल जाएगी।

आगे पढ़ें के आगे यहाँ

Comments

  1. बहुत बढ़िया! इसी तरह लिखते रहिये!

    ReplyDelete
  2. अच्छा लिखा है
    इसी तरह लिखते जाइए

    ReplyDelete
  3. Perhaps your knowledge about Narendra Modi and Gujarat is very poor which is not good for a mediaperson. Pl some time visit Gujarat and compare the inclusive growth here in comperision to other places u have mentioned.Of course there is good work being done in MP& Bihar but they are way behind dynamic leadership of Sh Narendra Modi.

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आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर

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