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चेतन आनंद

12 सितम्बर महादेवी वर्मा की पुण्यतिथि पर विशेष लेख-

महादेवी वर्मा और छायावाद की समकालीन कवयित्रियां
                                                               -डॉ. चेतन आनंद

छायावाद हिंदी साहित्य का अत्यंत महत्त्वपूर्ण काव्य आंदोलन (1918-1936) माना जाता है। इसे “हिंदी काव्य का स्वर्णयुग“ भी कहा गया है। इस युग में कवियों ने भावुकता, रहस्यवाद, प्रकृति-सौंदर्य, प्रेम, करुणा और मानवीय संवेदनाओं को आत्मानुभूति के साथ प्रस्तुत किया। पुरुष कवियों में जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ प्रमुख हैं, वहीं महिला कवयित्रियों में महादेवी वर्मा इस युग की सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधि मानी जाती हैं। उन्होंने न केवल छायावाद को ऊँचाई दी, बल्कि आगे की प्रगतिवादी और नारीवादी काव्यधारा के लिए भी पथ प्रशस्त किया। उनके साथ सुभद्राकुमारी चौहान जैसी कवयित्रियाँ युग की राष्ट्रवादी चेतना की प्रतिनिधि बनकर सामने आईं।
महादेवी वर्मा (1907-1987)-इन्हें “आधुनिक मीरा” कहा जाता है। इनकी कविता में वेदना, करुणा और आत्मीय प्रेम की गहन अनुभूति है। नीरजा, सांध्यगीति, दीपशिखा, यामा इनकी प्रमुख काव्य-कृतियाँ हैं। छायावादी भावुकता और रहस्यवाद के साथ-साथ इन्होंने सामाजिक सरोकार और नारी चेतना को भी स्वर दिया। इनकी रचनाओं में आत्मसंवाद, विरह और आध्यात्मिक प्रेम की अद्भुत अभिव्यक्ति मिलती है।
समकालीन कवयित्रियाँ-
महादेवी वर्मा की तरह छायावादी काल में और भी कई कवयित्रियाँ सक्रिय थीं, यद्यपि वे उतनी व्यापक ख्याति प्राप्त नहीं कर सकीं। प्रमुख नाम इस प्रकार हैं-
1.सुभद्राकुमारी चौहान (1904-1948)-राष्ट्रभक्ति और वीर रस की कवयित्री। “झाँसी की रानी“ कविता आज भी लोगों की जुबान पर है। इन्होंने छायावाद की कोमल भावुकता से अलग स्वतंत्रता संग्राम के संघर्ष और बलिदान का स्वर मुखरित किया।
2.विद्यावती कोकिल-इन्होंने भी छायावादी भावुकता के साथ सामाजिक सरोकारों और नारी-जीवन की पीड़ा को स्वर दिया।
3.शिवानी (गौरा पंत)-हालांकि ये बाद में कथाकार के रूप में प्रसिद्ध हुईं, किन्तु प्रारम्भिक काव्य-रचनाओं में छायावादी प्रवृत्ति देखी जा सकती है।
इनके अलावा इलाचंद्र जोशी, मन्नन द्विवेदी आदि कवियों की पत्नी-सहयोगिनी कवयित्रियाँ भी छायावादी भावभूमि पर लिख रही थीं, लेकिन वे हाशिए पर रहीं।
देखा जाये तो छायावाद में महादेवी वर्मा के बाद सुभद्रा कुमारी चौहान सबसे प्रसिद्ध कवयित्रियां मानी जाती हैं। दोनों ने ही अपना अलग मुकाम हासिल किया और हिन्दी साहित्य के आकाश की बुलंदियों को छुआ। छायावाद की महान कवयित्री महादेवी वर्मा और समकालीन सुभद्राकुमारी चौहान का तुलनात्मक अध्ययन करें तो काव्य की विषय-वस्तु की दृष्टि से
महादेवी वर्मा का काव्य मुख्यतः करुणा, विरह, प्रेम और आत्मानुभूति पर आधारित है। उनकी रचनाओं में नारी-हृदय की वेदना, जीवन की उदासी और आध्यात्मिक प्रेम का अद्भुत संगम मिलता है। नीरजा, सांध्यगीति, दीपशिखा और यामा जैसी कृतियाँ उनकी भावनात्मक गहराई और प्रतीकात्मक भाषा की साक्षी हैं। जबकि सुभद्राकुमारी चौहान की काव्य-दृष्टि पूरी तरह भिन्न है। वे राष्ट्रवादी चेतना और वीरता की कवयित्री हैं। उनकी कविताएँ स्वतंत्रता आंदोलन की पुकार बनकर जनमानस को उद्वेलित करती थीं। झाँसी की रानी कविता ने तो स्वतंत्रता-संग्राम के इतिहास में अमर स्थान प्राप्त कर लिया। उनकी रचनाएँ बलिदान, त्याग और देशप्रेम का संदेश देती हैं।
शैली और भाषा की दृष्टि से महादेवी वर्मा की शैली अत्यंत कोमल, संगीतमय और प्रतीकात्मक है। उनकी भाषा में संस्कृतनिष्ठ शब्दों का प्रयोग अधिक है। उपमा, रूपक और बिंबों का जादुई संसार उनकी कविता को रहस्यात्मक सौंदर्य प्रदान करता है। वेदना की गहराई उनकी शैली को और प्रभावशाली बनाती है। इसके विपरीत, सुभद्राकुमारी चौहान की भाषा सरल, सहज और उद्बोधनात्मक है। उन्होंने साहित्यिक अलंकरणों से अधिक संदेश की स्पष्टता को महत्व दिया। उनकी कविताएँ पढ़ते ही उत्साह और जोश का संचार होता है। वे ओजस्वी स्वर की धनी थीं।
महादेवी वर्मा की भावभूमि मुख्यतः व्यक्तिगत है। वे आत्मा की पीड़ा और विरह की वेदना का चित्रण करती हैं। उनकी कविता में आत्मसंवाद और अंतर्मन की सूक्ष्मतम अनुभूतियाँ देखने को मिलती हैं। उन्हें आधुनिक मीरा भी कहा गया है, क्योंकि उनकी काव्य-दृष्टि में प्रेम का आध्यात्मिक रूप प्रकट होता है। सुभद्राकुमारी चौहान की भावभूमि सामूहिक है। वे राष्ट्र और समाज की पीड़ा, स्वतंत्रता की आकांक्षा और संघर्ष की ज्वाला को स्वर देती हैं। उनकी कविता में व्यक्तिगत वेदना की अपेक्षा सामूहिक चेतना की अभिव्यक्ति अधिक है।
योगदान और महत्व-महादेवी वर्मा ने हिंदी साहित्य को नारी-संवेदना का सशक्त आयाम दिया। छायावाद के चार स्तंभों में एकमात्र महिला होकर उन्होंने यह सिद्ध किया कि स्त्री भी साहित्य की दिशा तय कर सकती है। उनके काव्य ने आगे चलकर प्रगतिवाद और नारीवाद की पृष्ठभूमि तैयार की।
सुभद्राकुमारी चौहान ने साहित्य के माध्यम से स्वतंत्रता आंदोलन को स्वर दिया। उनकी कविताएँ उस समय के युवाओं को संघर्ष और बलिदान के लिए प्रेरित करती थीं। वे हिंदी साहित्य की पहली कवयित्रियों में से हैं, जिन्होंने राष्ट्रप्रेम और वीरता को केंद्र में रखकर स्त्री-कविता की पहचान गढ़ी।
तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य-
ऽ महादेवी वर्मा का काव्य आत्मा की करुण पुकार है, जबकि सुभद्राकुमारी चौहान का काव्य राष्ट्र की गरजती आवाज़ है।
ऽ महादेवी वर्मा की कविता व्यक्तिगत और आत्मनिष्ठ है, जबकि सुभद्राकुमारी चौहान की कविता सामूहिक और प्रेरणादायी है।
ऽ महादेवी की भाषा भावुक और प्रतीकात्मक है, जबकि सुभद्रा की भाषा सरल और ओजस्वी।
ऽ दोनों ने अपने-अपने क्षेत्र में हिंदी साहित्य को गौरव प्रदान कियाकृमहादेवी ने छायावाद को और सुभद्रा ने राष्ट्रवादी साहित्य को।
महादेवी वर्मा और सुभद्राकुमारी चौहान दोनों ही हिंदी साहित्य की गौरवशाली कवयित्रियाँ हैं। महादेवी ने जहाँ आत्मा की वेदना और नारी-हृदय की संवेदनाओं को स्वर दिया, वहीं सुभद्राकुमारी चौहान ने राष्ट्रप्रेम और वीरता की परंपरा को प्रतिष्ठित किया। एक ओर महादेवी वर्मा का काव्य हमें आंतरिक आत्मानुभूति की गहराइयों तक ले जाता है, तो दूसरी ओर सुभद्राकुमारी चौहान का काव्य हमें संघर्ष और बलिदान की राह पर प्रेरित करता है। इस प्रकार, दोनों कवयित्रियाँ अलग-अलग धरातलों पर खड़ी होकर भी हिंदी साहित्य की समृद्ध परंपरा में अमिट स्थान रखती हैं। महादेवी आत्मा की आवाज़ हैं तो सुभद्रा राष्ट्र की आवाज़ हैं।

(लेखक सुप्रसिद्ध कवि एवं पत्रकार हैं।)

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