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दोहा सलिला

ओशो चिंतन: घाट भुलाना 4
*
शिष्य बने कोई अगर, है उसका अधिकार।
गुरु न बनूँ मैं, है मुझे,  केवल यह स्वीकार।।
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पंगु करें गुरु; शिष्य का, लेकर खुद पर भार।
अपना बोझा कम नहीं, क्यों लूँ और उधार।।
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ठीक लगे जो बात वह, कहता; सुनते आप।
लेन-देन संबंध अति, सूक्ष्म न सकते माप।।
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मेरी बातें सुन करें, आप अनुग्रह सत्य।
नहीं अनुग्रह मानिए, उचित नहीं यह कृत्य।।
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लेन-देन के नियम हैं, सूक्ष्म न सकते जान।
कुछ धन, श्रद्धा, अनुगृह, लेते नहीं सुजान।।
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धन्यवाद है आपको, सुन ली मेरी बात।
यही न कम; है समय ही, कहाँ रहा अब भ्रात।।
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बात हुई; फिर कुछ नहीं, मुझे प्रयोजन शेष।
गुरु-अनुशासित ही रहा, भले हमारा देश।।
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गुरु से ले आदेश सब, चलते हैं विपरीत।
संबंधों  की त्रासदी, बना-तोड़ते रीत।।
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मैं क्यों दूँ आदेश; तुम, क्यों मानो आदेश?
दे आदेश न; निवेदन, करता; यह संदेश।।
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ढाँचे में बँधता नहीं, रोक न सके जमीन।
निज विचार क्यों दूँ नहीं, क्यों हो रहूँ अधीन।।
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छ: सौ एकड़ भूमि दे, रही हमें सरकार।
नारकोल में शीघ्र ही, करते मित्र विचार।।
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मित्र कहें मत बोलिए, ले लें प्रथम जमीन।
तब गाँधी-वक्तव्य दें, कह न सका 'आमीन'।।
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भूमि हेतु वक्तव्य सँग, रुक जाऊँगा आप।
दुखी मित्र तज; शत्रु बन, तुरत दे रहे शाप।।
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मित्र बनें जो शत्रु भी, बन जाते बिन देर।
मित्र बनाता मैं नहीं, बनें न शत्रु अबेर।।
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निपट अकेला घूमता, करता बात अभीत।
भली लगे; सुन कुछ करें, नहीं रोका मीत।।
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27.5.2018, 07999559618
salil.sanjiv@gmail.com

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