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प्रोपर चैनल का फण्डा-भ्रष्टाचार का झण्डा

प्रोपर चैनल का फण्डा-भ्रष्टाचार का झण्डा


भाजपा में हाल ही में शामिल नौकरशाह श्री आर.के.सिंह ने गृहमंत्री पर सनसनीखेज आरोप लगाए हैं। इसको लेकर विभिन्न टिप्पणियाँ आ रही हैं। इस पर एक प्रश्न यह उठाया जा रहा है कि श्री सिंह ने सेवा के दौरान उचित मंच पर ये मुद्दे क्यों नहीं उठाए? ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि किसी नौकरशाह ने सेवानिवृत्ति के बाद खुलासे किए है। ऐसा पहले भी होता रहा है और आगे भी होता रहेगा।
मेरा इस मुद्दे की सच्चाई से या इसके पक्ष/विपक्ष से कोई सरोकार नहीं है। मैं किसी राजनीतिक पार्टी से भी जुड़ा नहीं हूँ, जो किसी का समर्थन या विरोध करने का पूर्वाग्रह हो। मैं इस विषय को प्रशासन/प्रबंधन व्यवस्था के दृष्टिकोण से प्रस्तुत कर रहा हूँ। मैं इसके माध्यम से एक ऐसी व्यवस्था को उठा रहा हूँ, जो भ्रष्टाचार को संरक्षण देती है, जिसके कारण प्रशासन में भ्रष्टाचार फल-फूल रहा है। 
पद-सोपान श्रृंखला एक ऐसी ही व्यवस्था है। प्रशासन के क्षेत्र में यह एक महत्वपूर्ण व्यवस्था है और प्रत्येक कार्यालय में इसके पालन पर जोर दिया जाता है। यह प्रबंधन में भी है और प्रशासन में भी। सरकारी कार्यालयों में तो यह भ्रष्टाचारियों का कवच बन जाती है। इसके अन्तर्गत यदि किसी कर्मचारी को उच्चस्तर पर कोई विषय उठाना है तो वह ऐसा अपने निकटतम अधिकारी को छोड़कर नहीं कर सकता। कोई भी सूचना/अभ्यावेदन/ज्ञापन/शिकायत उसके निकटतम् अधिकारी (Immediate Boss) को या उसके माध्यम से ही देनी होगी। सामान्यतः यह व्यवस्था प्रबंधन को सुविधाजनक बनाती है। वैध क्रियाकलापों तक किसी भी प्रकार की समस्या भी नहीं आती, किन्तु यदि निकटतम् अधिकारी भ्रष्टाचार में या अवैध गतिविधियों में लिप्त होता है तो उसके अधीनस्थ उसकी शिकायत उसी को करने के लिए बाध्य हैं। यहीं यह व्यवस्था भ्रष्टाचार की संरक्षक बन जाती है।
किसी भी कर्मचारी के लिए अपने ही अधिकारी के कुकृत्यों के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत होना ही मुश्किल होता है। उसके बाद वह उस अधिकारी के खिलाफ उच्चस्तर पर लिख नहीं सकता, क्योंकि वहाँ पद-सोपान श्रृंखला के अनुसार उचित माध्यम से शिकायत करने का फण्डा आड़ आता है। भ्रष्टाचार करने वाले अधिकारी के खिलाफ उसी अधिकारी को लिखकर देना पड़े तो बड़ी विचित्र स्थिति हो जाती है। यही व्यवस्था ईमानदार कर्मचारियों की प्रताड़ना का तथा भ्रष्टाचारी का संरक्षण करने का कारण बनती है। सर्वप्रथम तो वह अधिकारी अपने खिलाफ हुई  शिकायत को आगे जाने ही नहीं देगा। यदि उसे वह शिकायत आगे भेजनी भी पड़ी तो यहीं से वह साक्ष्यों के साथ छेड़-छाड़ व साक्षियों को प्रभावित करने की कोशश करना प्रारंभ कर देगा।
उक्त अधिकारी सबूतों के साथ छेड़-छाड़ तक ही सीमित नहीं रहेगा। वह अपने अधीनस्थ कर्मचारी को प्रताडि़त करना प्रारंभ कर देगा। उस पर झूठे आरोप लगाएगा। उसे निलम्बित या बर्खास्त भी कर सकता है। यही नहीं शिकायतकर्ता कर्मचारी को अपनी जान देकर भी ईमानदारी का मूल्य चुकाना पड़ता है। इस प्रकार उचित माध्यम(Proper Chennel) की प्रशासनिक व्ववस्था भ्रष्टाचार व अवैध गतिविधियों की संरंक्षक बन जाती है।
अतः यदि हमें देश से भ्रष्टाचार को कम करके व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त करना है तो भ्रष्टाचार व अवैध गतिविधियों से संबंधित शिकायतों हेतु उचित माध्यम के बंधन को हटा देना चाहिए। यही नहीं देश की किसी भी ऐजेन्सी को सीधे लिखने की छूट प्रदान करनी चाहिए। यही नहीं जाँच ऐजेन्सी को किसी सरकारी कर्मचारी या अधिकारी या मंत्री के खिलाफ अभियोग दायर करने से पूर्व स्वीकृति लेने की अनिवार्यता को भी समाप्त किया जाना चाहिए। कोई भी कर्मचारी या अधिकारी या मंत्री; जो अवैध गतिविधियों में लिप्त है, उसे पद-सोपान श्रृंखला का संरक्षंण क्यों मिलना चाहिए? आज आवश्यकता है कि अंग्रेजों के समय की अकुशल प्रशासनिक व्ववस्था को समाप्त कर नवीन कुशल प्रबंधन तंत्र का विकास करें, जिसमें गोपनीयता को नहीं, पारदर्शिता को प्राथमिकता प्रदान की जाय। ऐसा करके ही भ्रष्टाचार को फलने-फूलने से रोका जा सकेगा।  


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