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राजनीतिक पार्टी बनाने का पहला सुझाव अन्‍ना का ही था




इमेज पर चटका लगा कर तहलका का मूल इंटरव्यू पढ़ें।
म धारणा यह है कि अरविंद केजरीवाल राजनीतिक पार्टी बनाना चाहते हैं जबकि अन्ना हजारे इसका विरोध कर रहे हैं। लेकिन अन्ना से अलग होने के बाद पहली बार दिये एक विस्तृत साक्षात्कार में अरविंद केजरीवाल ने तहलका को बिल्कुल अलग कहानी बतायी। 19 सितंबर 2012 को इंडिया अगंस्ट करप्शन के कोर ग्रुप की बैठक के बाद प्रेस कांफ्रेंस में अन्ना हजारे ने घोषणा की थी कि वे राजनीतिक दल बनाने के समर्थन में नहीं हैं और अगर अरविंद केजरीवाल कोई राजनीतिक पार्टी बनाते हैं, तो न तो अन्ना हजारे का नाम इस्तेमाल करें, न ही उनका फोटो। मगर अरविंद केजरीवाल ने तहलका को कहा है कि राजनीतिक पार्टी बनाने का विचार सबसे पहले अन्ना हजारे ने दिया था, उन्होंने नहीं और बाद में अन्ना अपनी ही बात से पीछे हट गये हैं।
अन्ना ने राजनीतिक पार्टी बनाने पर राय लेने के लिए जनता के बीच किये गये सर्वेक्षण और उसे करने के तरीके पर भी सवाल उठाये थे। लेकिन तहलका के साथ बातचीत में अरविंद का कहना है कि जनता के बीच सर्वेक्षण करवाने का विचार अन्ना हजारे ने स्वयं ही दिया था। वे आगे कहते हैं, ‘अन्ना ने ही इस सर्वेक्षण का तौर-तरीका भी सुझाया था। हमने उन्हीं के सुझाव के आधार पर सर्वेक्षण करवाया।’ राजनीतिक पार्टी बनाने के फैसले से पीछे हटने के बारे में जब कोर कमेटी की बैठक में अन्ना से पूछा गया तो बकौल अरविंद उनका जवाब था, ‘पहले मैं वह कह रहा था अब यह कह रहा हूं। जब पहले मेरी बात मान ली थी तो अब भी मान लो।’
अरविंद यह भी दावा करते हैं कि अन्ना की तरफ से राजनीतिक दल के गठन का सुझाव जब उन्हें मिला, तो वे चौंक गये थे। वे कहते हैं, ‘अन्ना ने राजनीतिक दल बनाने का मन बनाने के बाद मुझसे पूछा था कि मैं क्या सोचता हूं इस बारे में। यह मेरे लिए चौंकाने वाली बात थी इसलिए मैंने अन्ना से सोचने के लिए थोड़ा समय मांगा था। बाद में मैं भी उनके विचार से सहमत हो गया।’ अरविंद बताते हैं, ‘अन्ना ने पुण्य प्रसून वाजपेयी के साथ जनवरी महीने में हुई एक बैठक के बाद राजनीतिक दल का नाम भी तय कर लिया था। इस दल का नाम उन्होंने रखा था ‘भ्रष्टाचार मुक्त भारत’।’
तहलका से साक्षात्कार में पहली बार केजरीवाल ने जो बातें कही हैं, वे बिंदुवार हैं…
 तहलका को दिये साक्षात्कार में अरविंद केजरीवाल बताते हैं कि राजनीतिक पार्टी बनाने का विचार सबसे पहले अन्ना हजारे ने दिया था। हजारे ने राजनीतिक पार्टी बनाने का फैसला टेलीविजन के वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी के साथ जनवरी महीने में हुई एक बैठक के बाद लिया था। लेकिन अब अन्ना हजारे पीछे हट गये हैं।
 अरविंद का यह भी कहना है कि अन्ना ने राजनीतिक दल बनाने का मन बनाने के बाद मुझसे पूछा था कि मैं क्या सोचता हूं इस बारे में। यह मेरे लिए चौंकाने वाली बात थी, इसलिए मैंने अन्ना से सोचने के लिए थोड़ा समय मांगा था। बाद में मैं भी उनके विचार से सहमत हो गया।
 अरविंद केजरीवाल ने तहलका को बताया कि अन्ना ने पुण्य प्रसून वाजपेयी के साथ बैठक के बाद राजनीतिक दल का नाम भी तय कर लिया था। इस दल का नाम उन्होंने रखा था ‘भ्रष्टाचार मुक्त भारत’।
 19 तारीख को कंस्टीट्यूशन क्लब में टीम अन्ना के कोर ग्रुप के सदस्यों की हुई बैठक पर रोशनी डालते हुए अरविंद केजरीवाल बताते हैं कि बैठक में हम सबने उनसे यही कहा कि अन्ना आप ही तो सबसे पहले कहते थे कि हम राजनीतिक पार्टी बनाएंगे तो अब यह बदलाव क्यों। उनका जवाब था कि पहले मैं वह कह रहा था, अब यह कह रहा हूं। जब पहले मेरी बात मान ली थी तो अब भी मान लो।
 जुलाई 2012 में हुए अनशन के बाद टीम अन्ना ने एक सर्वेक्षण की बात कही थी। इस सर्वेक्षण में अस्सी फीसदी लोगों ने राजनीतिक पार्टी का समर्थन किया था। गौरतलब है कि अन्ना हजारे ने इस सर्वे की वैधता और वैज्ञानिकता पर सवाल खड़े करके इसे खारिज कर दिया था। लेकिन अरविंद केजरीवाल तहलका को बताते हैं कि जनता के बीच सर्वेक्षण करवाने का विचार अन्ना हजारे ने स्वयं ही दिया था। इतना ही नहीं, वे आगे कहते हैं कि अन्ना ने ही इस सर्वेक्षण का तौर-तरीका भी सुझाया था। हमने उन्हीं के सुझाव के आधार पर सर्वेक्षण करवाया। पर अब अन्ना ने अपना मन बदल लिया है। मुझे इसकी कोई वजह समझ में नहीं आती।
 अरविंद ने यह भी बताया कि आगामी दो अक्टूबर 2012 को उनकी टीम जनता के सामने अपनी भावी राजनीतिक पार्टी का प्रारंभिक मसौदा रखेगी। इसके बाद देश भर से लोगों से सुझाव मांगे जाएंगे। उन सुझावों के आधार पर नयी पार्टी का स्वरूप तय किया जाएगा।
 अन्ना हजारे से दोबारा जुड़ने के सवाल पर अरविंद केजरीवाल कहते हैं कि अन्ना एक देशभक्त व्यक्ति हैं। देश के लिए जो भी अच्छा काम होता है अन्नाजी उसका समर्थन जरूर करेंगे ऐसा मुझे विश्वास है।
 राजनीतिक पार्टी के स्वरूप के सवाल पर अरविंद केजरीवाल बताते हैं कि यह आंदोलन ही रहेगा। पहले आंदोलन के पास तीन-चार हथियार थे – अनशन एक हथियार था, धरना एक हथियार था, याचिका दायर करना एक हथियार था। अब उसके अंदर राजनीति एक और हथियार जुड़ गया है। इसका मुख्य मकसद आंदोलन ही है, राजनीति बस एक अतिरिक्त हथियार के तौर पर जुड़ जाएगी।
प्रेस विज्ञप्ति

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