Skip to main content

सपनीले जादू की एक सदी ।

सिनेमा का प्रथम प्रदर्शन पेरिस के ग्रैंड कैफे के इंडियन सेलून नामक कक्ष में 28 दिसंबर 1895 को हुआ था। वक्त था रात के ९ बजे। समय, तिथि, स्थान और साल के आधार पर विज्ञानजनित अभिव्यक्ति के इस माध्यम की कुंडली कंप्यूटर की मदद से बनाई जा सकती है, परंतु यह तय है कि सिनेमा की कुंडली में भारत नामक ग्रह सबसे प्रबल रहा, वरना क्या कारण है कि इतने बड़े होटल के अनेक कक्षों में ल्युमियर बंधुओं ने इंडियन सेलून को ही चुना। 



भारत में सिनेमा की कुंडली में शुक्र की महादशा हमेशा ही कायम रही है और विगत कुछ वर्षो से दुनिया में सबसे अधिक संख्या में फिल्म हम ही बना रहे हैं। सिनेमा के आविष्कार के समय किसी को कल्पना नहीं थी कि विज्ञानजनित यह माध्यम विज्ञानविहीनता वाले देश में इस कदर लोकप्रिय होगा। 


यह अजूबा इसलिए संभव हुआ क्योंकि यह कथा कहने का माध्यम है और भारत कथावाचकों तथा श्रोताओं का अनंत देश है। दूसरी बात यह कि इस देश में कोई परंपरा कभी मरती नहीं। आज टेक्नोलॉजी के युग में भी लावणी, नौटंकी और जात्रा कायम हैं। रंगमंच आज भी आलोकित है। 


कथावाचक आज भी पोथी बगल में दबाए घर-घर संतोषी मां और सत्यनारायण की कथा कराते हैं। तीसरी बात यह है कि वर्तमान के हर क्षण में अनेक गुजश्ता सदियां मौजूद होती हैं। आप अनेक शहरों में रेलवे पुल के नीचे से बैलगाड़ी गुजरते और ऊपर जेट उड़ते हुए देख सकते हैं। इसी तरह बड़े शहरों में आधुनिकतम सुविधाओं से संपन्न मल्टीप्लैक्स के साथ ही एकल सिनेमाघर भी हैं और कस्बों में आज टूरिंग टॉकीज मेले-तमाशों के अवसर पर पहुंच जाते हैं और अवैध वीडियो पार्लर भी पनपते रहे हैं। 


भारत में 3 मई 1913 को धुंडिराज गोविंद फाल्के ने पहली कथा फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ प्रस्तुत की और पहले दस वर्षो में कुल जमा 91 फिल्में बनीं, जो सारी ही धार्मिक आख्यानों को प्रस्तुत करती थीं। बाद में सामाजिक फिल्में बनीं, इतिहास आधारित फिल्में बनीं, भूत-प्रेत की फिल्में बनीं। 


गोयाकि हर प्रकार की फिल्में बनीं, परंतु सभी में प्रस्तुत पात्रों का सोच हमेशा पौराणिक ही रहा। इस तरह हम हमेशा मायथोलॉजी ही बनाते रहे हैं। मान लीजिए धर्म एक बहुमंजिला भवन है, जिसमें हवादार कमरे हैं, धूप भी आती है तो इसी भवन के नीचे बहुमंजिले तलघर भी हैं, जिनमें अंधविश्वास के जाले हैं, कुरीतियों की चमगादड़ें हैं, भय के भूत-प्रेत हैं। 


फिल्मों में इस भवन और उसके नीचे बने तलघर की प्रवृत्तियां हमेशा विद्यमान रही हैं। 


1913 से 1947 तक ब्रिटिश सेंसर की आंखों में धूल झोंककर राष्ट्र प्रेम की फिल्में बनाई गईं और गांधीजी के प्रभाव में सिनेमा भी स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा बना। इस कालखंड में हिमांशु राय, देविका रानी और निरंजन पॉल ने मिलकर बॉम्बे टॉकीज नामक कॉपरेरेट की स्थापना की। कलकत्ता में बीएन सरकार ने न्यू थिएटर्स नामक कॉपरेरेट की स्थापना की। बॉम्बे टॉकीज ने मनोरंजन के साथ संदेश देने वाली फिल्में बनाईं और न्यू थिएटर्स ने साहित्यिक कृतियों पर फिल्में बनाईं। 


इसी कालखंड की तीसरी महत्वपूर्ण संस्था प्रभात फिल्म्स पूना थी, जिसके लिए वी शांताराम ने फिल्में बनाईं। इन सभी संस्थाओं में कलाकार और तकनीशियन म
ासिक वेतन पर प्रात: 9 से शाम 6 बजे तक अनुशासित ढंग से काम करते थे। सोहराब मोदी इतिहास आधारित फिल्में रचने के विशेषज्ञ थे। मेहबूब खान ‘औरत’ बनाकर स्थापित हुए थे और उनकी ‘रोटी’ क्रांतिकारी फिल्म थी। १९४१ में सफल रही ‘सिकंदर’ के बाद पृथ्वीराज कपूर ने स्वतंत्र सितारा प्रणाली शुरू की।


सुना है कि स्वतंत्रता प्राप्त करते समय भी पंडितों से मुहूर्त निकाला गया था। निश्चय ही स्वतंत्र भारत की कुंडली भी बनाई गई होगी। भारत की कुंडली में सिनेमा भी किसी ग्रह की तरह स्थापित हो गया और भारत भी सिनेमा की तरह आधी हकीकत आधा फसाना हो गया। देश की कुंडली में अजीबोगरीब युतियां बनीं कि देश होते हुए भी यह देश का भरम ही देगा। 


राजनीति में सितारे चलेंगे और नीतियों पर नहीं लहरों पर चुनाव होंगे। हमने न तो स्वतंत्रता को ठीक से परिभाषित किया, न ही मनोरंजन को। बहरहाल, 1947 से 1964 तक हिंदुस्तानी सिनेमा का स्वर्णकाल रहा, जब सामाजिक प्रतिबद्धता वाला मनोरंजक सिनेमा रचा गया। 


सत्यजित राय का ‘पाथेर पांचाली’ द्वारा प्रवेश आणविक विस्फोट की तरह था। हिंदुस्तानी सिनेमा को अपना पहला कवि मिला, मनुष्य की करुणा का गायक मिला। भारतीय सिनेमा में गीत-संगीत का स्वर्णकाल भी १९४७ से 1964 तक रहा। यह भारतीय सिनेमा की स्वतंत्र पहचान है। पहले दुनिया में इसका मखौल उड़ाया जाता था, लेकिन बाद में इसे भारतीय सिनेमा की ऊर्जा मान लिया गया।


रंगीन फिल्मों का युग शुरू होते ही फिल्म निर्माण महंगा हो गया। संस्थागत पूंजी उपलब्ध नहीं थी, इसलिए तथाकथित आर्थिक सुरक्षा के भय से फिल्मकार मसाला फिल्में गढ़ने लगे और सामाजिक प्रतिबद्धता हाशिये पर धकेल दी गई। हिंदुस्तानी सिनेमा की मुख्यधारा के साथ कुछ परस्पर समानांतर धाराएं हर कालखंड में प्रवाहित रहीं। 


हिंदुस्तानी सिनेमा में हॉलीवुड की तरह श्रेणीकरण नहीं हो सकता। 1973 में अमिताभ बच्चन अभिनीत और सलीम-जावेद की लिखी ‘जंजीर’ तथा राज कपूर की ‘बॉबी’ ने फिल्म उद्योग में बड़े पैमाने पर एक्शन फिल्म तथा युवा प्रेम कहानियों की दो धाराओं को पल्लवित किया। 



देश में स्वप्नभंग की स्थिति थी और व्यवस्था में लगी दीमक से लोग क्रोध की मुद्रा में थे। अमिताभ की ‘जंजीर’, ‘दीवार’ और ‘त्रिशूल’ के आक्रोश से भरे नायक में उन्होंने अपने गुस्से का प्रतिबिंब देख लिया। यह दर्शकों का ही कमाल था, क्योंकि इन तीनों फिल्मों में नायक स्वयं के लिए लड़ रहा है। 


दरअसल गोविंद निहलानी की ‘अर्धसत्य’ पहली सच्ची आक्रोश फिल्म है, जिसका होम्योपैथिक संस्करण हम ‘सत्यकाम’ में देख चुके थे। अमिताभ के आविर्भाव के समय ही श्याम बेनेगल की ‘अंकुर’ और ‘निशान्त’ सड़ती हुई व्यवस्था पर प्रकाश डाल चुकी थीं। इस कालखंड में ‘शोले’ का प्रदर्शन एक घटना थी। सिनेमा के स्थायी आहार में सब मसालों के द्वारा विविधता का मनोरंजन रचा गया।


टेक्नोलॉजी ने फिल्मों की तकनीकी गुणवत्ता बढ़ाने के साथ अवैध वीडियो के द्वारा सिनेमा को अकल्पनीय आर्थिक क्षति पहुंचाई। इससे उत्पन्न आर्थिक भय ने फिल्मकारों को और अधिक समझौतों के लिए मजबूर किया। १९९१ में आर्थिक उदारवाद के साथ ही भारतीय समाज और सिनेमा में परिवर्तन की गति तीव्र हो गई। 


मल्टीप्लैक्स के उदय के साथ ही फिल्म उद्योग में कॉपरेरेट का पदार्पण हुआ। सूरज बड़जात्या की शादी-ब्याह वाली ‘हम आपके हैं कौन’ की भारी सफलता ने औद्योगिक घरानों का ध्यान फिल्म व्यवसाय की ओर आकृष्ट किया। 




पहले दो कॉपरेरेट ‘बॉम्बे टॉकीज’ और ‘न्यू थिएटर्स’ सिनेमा में सामाजिक प्रतिबद्धता और गुणवत्ता की खातिर आए थे, परंतु अपने दूसरे अवतार में कॉपरेरेट केवल मुनाफा कमाने और ग्लैमर में आलोकित होने के लिए आया। इसी दौर में आप्रवासी दर्शकों के कारण डॉलर सिनेमा का भी उदय हुआ। 



वास्तव में उदारवाद और व्यवस्था में निहित भ्रष्टाचार के कारण रातोंरात धनाढ्य होने वाला वर्ग अपनी दौलत के प्रदर्शन के लिए माध्यम खोज रहा था और सिनेमा ने उन्हें आडंबर वाली शादियों का रास्ता दिखाकर सदियों की सादगी के लिए की गई तपस्या नष्ट कर दी।


यह ऐसा दौर था, जब भारतीय सिनेमा में भारत खोजना कठिन हो गया। पूरी सदी तक सिनेमा में मान्यता रही थी कि नैतिक रूप से ठीक होने पर ही फिल्म चलती है। यह मान्यता ध्वस्त हो गई। संसद, सिनेमा और समाज में नैतिकता हाशिये में ढकेल दी गई। देश में सतह के नीचे विघटन की प्रक्रिया चल रही है। 



अराजकता कोने में दुबकी अवसर की तलाश में है। ऐसे में अपनी दूसरी सदी में प्रवेश करते सिनेमा की जवाबदारी बढ़ गई है, परंतु मायाजाल, मिथ और मायथोलॉजी में फंसा सिनेमा अब अपने द्वारा रचे नायकों की तरह साहसी नहीं रहा और भारत अब एक एक्शन मसाला फिल्म की तरह अविश्वसनीय घटनाओं से भरी फिल्म की तरह हो गया है। सिनेमा ने देश को मिथ दिया और देश ने सिनेमा को मायथोलॉजी मान लिया। -










  जयप्रकाश चौकसे। लेखक वरिष्ठ फिल्म समीक्षक हैं
   दैनिक भास्कर में इनका एक नियमित कलम प्रकाशित होता है,जो बेहद चर्चित है                      जयप्रकाश चौकसे जी सिनेमा के अनछूए पहलुओं पर सटीकता से बात करते है 

Comments

  1. कहते है कि ... जब जब समाज मे जिस नई चीज का विरोध होता है ... आने वाले समय मे समाज उसी का गुलाम हो जाता है ........ सौ साल के सिनेमा ने आज (आर्थिक युग)कुछ किर्तीमान ले लिये हों पर .... कुछ दिनो पहले तक समाजिक उपेक्षा से भी सारोकार होना पड़ा है । लोगों ने इसका विरोध भी किया है औरदेखने वाले खुब कोसे भी जाते थे ..... कुछ यही हाल विदेशी चैनलओ को लेकर हुआ तब mtv आदि को लेकर हाय तौबा हुयी ........ और बही चैनल एक नयी जनरेशन को पागल किये हुये है ..... कुछ भी हो .....जिन फिल्मो ने विपरीत हवाओ मे अपने को ढाल लिया ..... जिन अभिनेता अभिनेत्रीयों ने विपरीत परस्थीतियों मे काम किया ........ उनका लोहा आज भी उतना ही खरा है जितना पहले था ...... लेकिन एक खतरा भी है आज के सिनेमा मे वंशवाद भाई भतिजावाद....... आगया है ... और ये हर उस ...कलाकार को रोकता है जिसका जन्म अभिनय के लिये हुआ है और कही न कही उसे एक दलदल मे भी धकेलता है जिसका कोई मन्जिल नहीं होती ......
    सौ साल ....... बाद सिनेमा किस रंग मे रंग रहा है ...... और इसकी कहानियाँ क्या कह रही है एक तरफ़ सिविक्ल का दौर है ..... मतलब कहानियों का टोटा ..... और दुसरी तरफ़ .... बरबरा ... लिओन .. जैसे लोगों को .... बालिबुड मे जडें जमाने के लिये जमीन दी जा रही है ... क्या सतीश कौशिक ... रजनीकांत .. जैसे कलाकार ने जो मुकाम हासिल किया ...उसके लिये शारिरिक सुन्दरता चाहिये... ? जाने भी दो यारों ... की लोकप्रियता क्या कोई तोड नही है और तो और ... महंगी से महगी फ़िल्म वो मिठास नही दे सकती जो जाने भी दो यारो ने दिया.....
    अतत: -.. रीयल्टी शो को रीयल होना पडे़गा ... और सिनेमा को व्यबसाय से हटकर .. व्यव्हारिक होना पडेगा...... फ़िल्मी भविष्यव्क्ता कुछ भी कहे ...... पर आने वाला समय ... बहुत कुछ कहने वाला है ........

    ReplyDelete

Post a Comment

आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर

Popular posts from this blog

Warts, Moles and Skin Tags - Can They Develop Into Cancer?

Skin tags pose no real danger. They will not develop into a cancerous growth. However sometimes they may be irritating especially if they are found around the collar. You may even decide to remove a skin tag for cosmetic reasons. When one considers warts, particular attention needs to be taken in the case of genital warts, since these may be transmitted to others. Moreover sometimes genital warts may develop into a cancerous growth. Therefore if you have genital warts you should consult your physician right away. Moles may develop into a cancerous growth. It is therefore important to take appropriate care of any changes that can occur to any mole. If you have many moles on you body it is not a bad idea to have regular checks. Take particular attention after summer because the sun rays may make a mole develop into melanoma or cancer of the skin. Consider any changes that you notice to any of your moles. Specifically you must consult your physician if a mole changes it'...

हाथी धूल क्यो उडाती है?

केहि कारण पान फुलात नही॥? केहि कारण पीपल डोलत पाती॥? केहि कारण गुलर गुप्त फूले ॥? केहि कारण धूल उडावत हाथी॥? मुनि श्राप से पान फुलात नही॥ मुनि वास से पीपल डोलत पाती॥ धन लोभ से गुलर गुप्त फूले ॥ हरी के पग को है ढुधत हाथी..

जूजू के पीछे के रियल चेहरे

हिन्दुस्तान का दर्द आज आपको बताने जा रहा है उन कलाकारों के बारे में जिनके काम की बदोलत ''जूजू'' ने सभी के दिलों मे जगह बना ली है..तो जानिए इन कलाकारों के बारे में और आपको यह जानकारी कैसी लगी अपनी राय से अबगत जरुर कराएँ बहुत ही क्यूट, अलग, और मज़ेदार से दिखने वाले जूजू असल में इंसान ही हैं, बस उनको जूजू के कॉस्टयूम पहना दिए गए है। पर ये करना इतना आसान नहीं था, जिस तरह का कॉस्टयूम और एक्ट शूट किए जाने थे उनमे हर मुमकिन कला और रचनात्मकता का प्रयोग किया जाना था। जूजू के पीछे के असल कलाकार कौन है आइये जानते हैं - प्रार्थना सुनिए विज्ञापन- इस विज्ञापन दो जूजू एक पेड़ से लटके दिखाए गए हैं और नीचे एक खाई है। उनमे से एक गिर जाता है और दूसरा अपना फोन निकलकर एक प्रार्थना सुनाता है जिस से की उस के दोस्त की आत्मा को शांति मिल सके। इस विज्ञापन में हैं ये दो कलाकार- रोमिंग विज्ञापन- इस में एक जूजू अपनी गर्लफ्रेंड को खुश करने के लिए फ़ोन पर उससे बातें करता रहता है चाहे वो दुनिया के किसी भी कोने में हो। इस विज्ञापन में सबसे बड़ी चुनौती थी एफ्फिल टावर और पिरा...