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अंधविश्वास के खिलाफ एक मुहिम - तर्कशील बनने का आह्वान

अंधविश्वास के खिलाफ एक मुहिम
तर्कशील बनने का आह्वान

अजय कुमार सोनी की राममूर्ती स्वामी के साथ बातचीत

परलीका. इंसान अगर अंधविश्वास का रास्ता छोड़कर तार्किक विचारों की तरफ अपना रुख करले तो वह एक अच्छा इंसान माना जाता है। ये बात तर्कशील सोसायटी के प्रांतीय प्रतिनिधि राममूर्ति स्वामी ने हमारे साथ हुई बातचीत में कहा।
उनके अनुसार तर्कशील सोसायटी, राजस्थान, हरियाणा और पंजाब की टीम भारतीय मुद्रा के दो लाख रुपए संसार के किसी भी ऐसे व्यक्ति को देने के लिए वचनबद्ध है। जो धोखा रहित अवस्थाओं में अपनी दिव्य अथवा आलौकिक शक्ति का प्रदर्शन सोसायटी की शर्तों में से किसी भी एक अथवा अधिक को पूरा करके दिखा सकता है। सभी देव पुरुष, साधु, योगी, सिद्ध, गुरू, तांत्रिक, स्वामी, ज्योतिषी एवं कोई भी ऐसा व्यक्ति जिसने आध्यात्मिक त्रऎिया-कलापों, प्रभु भक्ति अथवा वरदान से कोई दिव्य शक्ति प्राप्त की हो, इस पुरस्कार को जीत सकता है।

आइए हम आज पढ़ते हैं स्वामी से बातचीत के कुछ अंश।
सवाल:- आपने तर्कशील सोसायटी की ओर कब आगमन किया और आपको ऐसा क्या लगा जिससे आप सोसायटी में आए?
जवाब:- हम जिस सामाजिक परिवेश में रहते हैं, अड़ोस-पड़ोस के वातावरण, गली-मोहल्लों की भूत-प्रेत की घटनाएं, चारों तरफ अंधविश्वास फैलाने वालों के नाटक, पाखंडी लोगों द्वारा समाज की लूट, आलौकिक शक्तियों का दावा करने वाले लोगों के कारनामे, मदारियों के खेल बचपन से ही मेरे दिमाग को झकझोरते थे। मेरे दिमाग में हमेशा एक ही प्रश्न उभरता था कि हर घटना के पीछे कोई न कोई कारण होता है और इसी झुंझलाहट ने मेरे दिमाग में कब, कहां, क्यूँ और कैसे? जैसे शब्दों की पृष्ठभूमि का वातावरण तैयार किया। मैं ये सोचता था कि इनमें कोई चमत्कार नहीं है। क्यूंकि ये लोग वही चीज पेश कर रहे हैं जो दुनिया में पहले से मौजूद है। कोई नई चीज अपनी शक्ति द्वारा उत्पन्न नहीं करते हैं। शुरू से ही मैं विज्ञान का विद्यार्थी रहा हूँ। विज्ञान में गहरी रूची से मिथ्या बातों के खण्डन के प्रति मेरा रूझान बढ़ा। लेकिन इस क्षेत्र में काम करने वाले लोगों से मुलाकात नहीं हो पाने के कारण सक्रिय रूप से कुछ न कर सका। संयोग से मैंने डॉ. ए.टी. काबूर की पुस्तकें मुझे पढ़ने को मिली और तर्कशील सोसायटी के बारे में जानकारी हासिल हुई। इसी समय हनुमानगढ़ जिले के जण्डावाली गांव के समाजसेवी तर्कशील डॉ. रूपसिंह से मुलाकात हुई और उनकी विवेकशीलता ने मेरी शंकाओं का समाधान कर मुझे तर्कशील बनाया।
सवाल:- सोसायटी का मूल उद्देश्य क्या है?
जवाब:- सोसायटी का मूल उद्देश्य समाज को अंधविश्वास से निकाल कर वैज्ञानिक चिंतन पैदा करना है। जिससे लोग वैज्ञानिक विचारधारा अपनाकर पाखंडियों की लूट से बच सकें। सामाजिक समन्वय, अंधविश्वास रहित स्वच्छ वातावरण का निर्माण हो सके। मिथ्या विश्वासों से पर्दा उठे और समाज सच्चाई की ओर बढ़े।
सवाल:- पूरे भारत में सोसायटी की कितनी इकाइयां कहां-कहां काम कर रही है?
जवाब:- तर्कशील सोसायटी अलग-अलग नामों से पूरी दुनियाभर में काम कर रही हैं। पंजाब और राजस्थान में तर्कशील सोसायटी, हरियाणा में रेशनलिस्ट सोसायटी, कहीं बुद्धिवादी समाज, अंधविश्वास निरोधक दस्ता के नाम से अपने-अपने क्षेत्र में काम कर रही हैं। राजस्थान में भी लगभग 20 इकाइयों के सैंकड़ों सक्रिय सदस्य काम कर रहे हैं और हजारों की संख्या में समर्थक हैं।
सवाल:- भूत-प्रेत, ओपरी-पराई की कसरें क्यों होती हैं? खासकर महिलाओं में। सोसायटी के क्या विचार हैं?
जवाब:- तथाकथित ओपरी-पराई की कसरें सामाजिक समन्वय के अभाव में उपजी मनोविकृतियों के कारण होती हैं। पुरुष प्रधान समाज में घर के सारे काम-काज की जिम्मेवारी, बच्चों के पालन-पोषण की, शिक्षा का अभाव, मानसिक बोझ महिलाओं पर ज्यादा होता है। ऊपर से घर की कलह, नशे़डी ऐबी पुरुष की उपस्थिति से उसके दिलों में घुटन घोट बनकर उभरती हैं। यही कारण है कि ये परिस्थितियां महिलाओं में ज्यादा होती हैं। घरों में पत्थर गिरना, कपड़े कटना, आग लगना इसी सामाजिक समन्वय के अभाव में उपजी मानवीय शरारतें होती हैं। जिनके पीछे कोई आलौकिक शक्ति का हाथ नहीं होता है।
सवाल:- ऐसी समस्याओं के समाधान के लिए सोसायटी क्या तरीका अपनाती है?
जवाब:- मनोविकृतियों को दूर करने के लिए रोगी से गहन पूछताछ कर स्कूलिंग द्वारा और जरूरत पड़ने पर सम्मोहन विधि द्वारा उसका ब्रेन वॉश किया जाता है। सम्मोहन नींद में रोगी को भरोसा दिलाया जाता है कि उसकी सारी समस्याएं ठीक हो जाएंगी। वास्तविक कारण की खोज कर उसके निवारण हेतु उचित सुझाव भी दिया जाता है। पत्थर गिरना, आग लगना, कपड़े कटना जैसी परिस्थितियों में तहकीकात द्वारा शरारती को पकड़ा जाता है और उसकी कुंठाओं का समाधान कर उसका नाम गुप्त रख कर के समस्या से छुटकारा दिलाया जाता है।

Comments

  1. आपके द्वारा किया जा रहा प्रयास सराहनीय है। अतार्किक होना कुंदमति अथवा मूढ़ता है। तर्क प्रकाश है। ज्ञान का प्रकाश, जलते हुए दीप का प्रकाश। अंधेरा करोड़ों वर्ष पुराना क्यों न हो प्रकाश सामने आते ही भाग खड़ा होता है। तर्क से अंधविशवास का कुहासा छटेगा। ज्ञान का आलोक फैलेगा। व्यंग्य उस पर्दे को हटा देता है जिसके पीछे अंध-विशवास पनपता है। अपना प्रयास जारी रखिए। शुभकामनाएं ।
    नीचे : अंध-विशवास को भेदने वाला लेख-कास्टोमीटर का लिंक है।
    ============================================
    http://dandalakhnavi.blogspot.com/2011/04/blog-post_17.html

    ReplyDelete
  2. @ डॉ० डंडा लखनवी साहेब,

    टिप्पणी के लिए आपका धन्यवाद.....हम लोग राजस्थान में तर्कशील सोसायटी के नाम से अन्धविश्वास दूर करने का काम करते हैं...आस्था के नाम पर हो रही लूटपाट को बंद करने के लिए हम लोग प्रयासरत है....

    ReplyDelete

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--- संजय सेन सागर

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