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कोई शक नहीं कि भारत आज भी अंग्रेजों का उपनिवेश है!


♦ विश्वजीत सेन
प्रभात खबर (तारीख 29 अप्रैल 2011) में यह खबर आयी है कि इंगलैंड के राजकुमार प्रिंस विलियम और केट की शादी के मौके पर पटना के बच्चे शुभकामनाएं भेज रहे हैं। बाकायदा हेडलाइन बनाकर खबर दी गयी है। इससे पता चलता है कि प्रभात खबर अखबार का प्रबंधन भी इस बात से काफी पुलकित है। लेकिन अफसोस, इस पुलक में हमारी हिस्सेदारी नहीं है। एक तस्वीर भी है, जिसमें तोहफों के साथ बच्चे हैं, उनके साथ निनाद संगठन के सचिव हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि यह निनाद की ही पहल है।
कोई भी शादी, चाहे वह रिक्शा चालक की हो या राजकुमार की, खुशी का मौका है। लेकिन खुशी गम में तब तब्दील होने लगती है, जब भारत की जनता पर उपनिवेशवादिओं द्वारा ढाया गया जुल्म याद आता है। 200 वर्षों का एक लंबा इतिहास है, जिस इतिहास में लाशें हैं, चीखें हैं, कालकोठरियां हैं। इसी इतिहास में वैसी नारियों के चेहरे भी हैं, जिनकी अस्मत लूटी गयी। इसी इतिहास में वैसी माताएं भी हैं, जिनकी गोद सूनी हो गयी। क्या अंग्रेज राजघराने के राजकुमार की शादी के मौके पर यह हर्षोल्लास हमें शोभा देता है?
अगर आप भारतीय हैं, तो अपने परिवार के इतिहास में झांकें। कोई न कोई पूर्वज, कोई न कोई नाते रिश्तेदार आपको अवश्य मिल जाएंगे, जो अंग्रेजों के जुल्म के शिकार हुए। अपने-अपने मजहब की मान्यताओं के अनुसार आपने या आपके पिता ने उनका तर्पण भी कर दिया होगा, लेकिन क्या उनके द्वारा सही गयी यातनाओं का प्रतिकार महज एक पुरोहित को दी गयी दक्षिणा तक ही सिमट कर रह गया? आगे के लिए क्या कुछ भी नहीं बचा? कोई हिदायत? किसी किस्म का संदेश? हमने क्या सीख ली उनकी जिंदगी से, उनके त्याग से? क्या हमने यही सीख ली कि अंग्रेज राजकुमार की शादी के मौके पर बच्चों से तोहफे भिजवाये जाएं? और कैमरे के सामने खड़े होकर गर्वमिश्रित मुस्कान बिखेरे जाएं?
इसके पूर्व एक मौके पर भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भारत में अंग्रेजीराज के प्रति अपनी कृतज्ञता जाहिर की थी। मनमोहन सिंह के कहने का आशय शायद यही था कि अंग्रेजीराज के कारण ही भारत विकसित हुआ, भारत का औद्योगीकरण हुआ। केवल मनमोहन सिंह ही नही, बहुत सारे भारतवासी इसी भ्रांत धारणा के शिकार हैं। हमारे प्रधानमंत्री अर्थशास्त्री हैं। इतिहास के ज्ञान की कमी के लिए उन्‍हें माफी तो मिलनी ही चाहिए। इतिहास का ज्ञान अगर उन्‍हें होता, तो वारेन हेस्टिंग्‍स की उस रिपोर्ट के बारे में भी उन्‍हें पता अवश्य ही होता, जो उन्‍होंने ब्रिटिश पार्लियामेंट के समक्ष पेश की थी। इस रिपोर्ट में खुद वारेन हेस्टिंग्‍स ने लिखा था – दिनभर में शायद ही एक पल ऐसा हो, जब संपूर्ण बंगाल में तांत चलने की आवाज बंद होती है।
वारेन हेस्टिंग्‍स ने आगे बताया था कि बुनकरों में सभी जाति और मजहब के लोग थे। ब्राह्मण परिवार की औरतें भी अपना वस्त्र खुद ही बना लेती थीं। इसे कोई अछूत काम नहीं समझा जाता था। इतने बड़े और व्यापक औद्योगिक आधार को नष्ट किसने किया? अंग्रेजों ने। ढाके के मलमल के आगे मैनचेस्टर में बने वस्त्र फीके पड़ जाते, इसलिए बुनकरों की उंगलियां काट ली गयीं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से शायद हम भी सहमत हो जाते, तोहफे भेजनेवाले बच्चों को शायद हम भी शाबाशी देते, अगर ये सारी बातें हमारे जेहन में नहीं होतीं।
शंकर के उपन्यास चौरंगी (मूल बंगला में, हिंदी अनुवाद राजकमल चौधरी का) के अंतिम हिस्से में एक पात्र कहता है – लोग समझते हैं 1947 में अंग्रेज भारत छोड़कर चले गये। वे गलत हैं। 1947 में यह देश हमेशा हमेशा के लिए अंग्रेजों का गुलाम हो गया।
इसे शायद आप अतिशयोक्ति कहें, लेकिन प्रभात खबर में छपी खबर और तस्वीर को देखते हुए बरबस ये पंक्तियां याद आ गयीं। शायद यह मेरी भूल है। मै कह नहीं सकता। लेकिन अंतर्मन में एक सवाल रह रह कर कौंधता है। क्या भारत आज भी अंग्रेजों का उपनिवेश है?
(विश्‍वजीत सेन। पटना में रहने वाले चर्चित बांग्ला कवि। पटना युनिवर्सिटी से इंजीनियरिंग की पढ़ाई। बांग्ला एवं हिंदी में समान रूप से सक्रिय। पहली कविता 1967 में छपी। अब तक छह कविता संकलन। पिता एके सेन आम जन के डॉक्‍टर के रूप में मशहूर थे और पटना पश्‍िचम से सीपीआई के विधायक भी रहे।)
मोहल्ला लाइव से साभार प्रकाशित 

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