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क्रिकेट की कूटनीति

ऑपरेशन ब्रासटैक्स के समय भारत-पाकिस्तान में युद्ध की तेज हुई चर्चाओं के बीच 1987 में पाकिस्तान के सैनिक तानाशाह जनरल जिया-उल हक ने क्रिकेट के बहाने कूटनीतिक बढ़त हासिल करने की चाल चली, जिसे क्रिकेट कूटनीति के रूप में जाना जाता है। वो शीत युद्ध का जमाना था और आतंकवाद की आड़ में भारत का खून बहाने की पाकिस्तानी नीति पुरजोर ढंग से जारी थी। तभी भारत ने नवंबर 1986 से मार्च 1987 के बीच राजस्थान में अभ्यास के लिए अपनी फौज का सबसे बड़ा जमावड़ा किया। उसी पृष्ठभूमि में जनरल जिया अपनी पहल पर भारत-पाकिस्तान का क्रिकेट टेस्ट देखने जयपुर आए। कोशिश खुद को शांतिदूत और भारत को आक्रामक दिखाने की थी। लेकिन 2005 में जब पाकिस्तान के अगले तानाशाह जनरल परवेज मुशर्रफ वन डे मैच देखने दिल्ली आए, तो वह यात्रा सिर्फ एक रणनीति नहीं थी। तब भारत और पाकिस्तान के बीच अहम मुद्दों पर समझौते की जमीन तैयार हो गई थी और एक ऐतिहासिक सफलता का इंतजार था। लेकिन पाकिस्तान की अंदरूनी उथल-पुथल ने उस संभावना पर पानी फेर दिया। तब से दोनों देशों के रिश्तों में उतार-चढ़ाव का लंबा दौर चला है। मगर थिम्पू में सार्क शिखर सम्मेलन के साथ पिछले साल शुरू हुई नई प्रक्रिया और विदेश सचिवों की वार्ता से दोनों देशों के रिश्ते पटरी पर लौटते दिखे हैं। मनमोहन सिंह ने विश्व कप सेमीफाइनल में भारत-पाकिस्तान का मैच देखने के लिए पाकिस्तान के शीर्ष नेतृत्व को आमंत्रित कर क्रिकेट कूटनीति को नया आयाम दिया है। पाकिस्तान से रिश्ते सुधारने के प्रति डॉ सिंह की प्रतिबद्धता कभी संदिग्ध नहीं रही। विकीलीक्स से तो यह सामने आया कि इस मुद्दे पर कई बार वे सरकार में अलग-थलग नजर आए हैं। उन्होंने फिर एक पहल की है, जो सकारात्मक दिशा ग्रहण कर सकती है।

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