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घोटालों से हम क्या सीखें?

''आज प्रीतिश नंदी जी का यह लेख भास्कर के माध्यम से पढने  को मिला इस लेख ने मुझे काफी प्रभावित किया,वैसे तो अधिकतर पाठकों की नजर से यह बचा नहीं होगा,लेकिन उस पाठकों के लिए हम इसे यहाँ लेकर आ रहे है जो इसे नहीं पढ़ पायें,आप इस विषय पर चिंतन करें, मनन करें  उसके बाद  अपनी राय को कमेंट्स के माध्यम से हम तक पहुंचाएं ''  


संभव है कि आप बहुत मेधावी व्यक्ति हों, लेकिन भारत में उद्यमशीलता की डगर इतनी आसान नहीं। जब लाइसेंसों व परमिटों का बंटवारा होगा, तो सत्ता के साझेदार और उनके संगी-साथी सब कुछ हड़प लेंगे। मीडिया भी उनका गुणगान करेगा कि भ्रष्टाचार की दलदल के बावजूद उन्होंने अपनी नैया किनारे लगा दी। कामयाबी का एक सूत्र यह भी है कि किसी नामी-गिरामी के पिछलग्गू बन जाओ।

हाल के दिनों में कई लोगों ने मुझसे यह सवाल पूछा है कि टेलीकॉम घोटाले से हमें क्या सबक मिलता है? ये रहा मेरा फौरी जवाब। मुमकिन है यह एक बौड़म-सा सबक हो। शायद..
आज राजनीति में भले और नेक लोग बहुत ज्यादा नहीं रह गए हैं। बहुतेरे राजनेता लूटने-खसोटने वाले हैं। कुछ ऐसे भी हैं, जो तमाशबीन बने खड़े रहते हैं, लेकिन भ्रष्टों को रोकने के लिए करते कुछ नहीं। यदि आपके कुछ प्रिय राजनेता हों (हममें से बहुतों के शायद ही कोई प्रिय राजनेता होंगे) तो आप खुद यह परख लीजिए, वे इन दोनों में से किस श्रेणी में आएंगे। पूरी संभावना है कि हमारे सभी राजनेता इन दोनों श्रेणियों में से किसी एक में पाए जाएंगे।

यदि आप किसी घोटाले का सच जानना चाहते हैं तो उसके भीतर घुसते चले जाएं। राजनीति की दुनिया में सस्तेपन और बिकाऊपन की कोई सीमा नहीं है। हम्माम में सभी नंगे हैं। सभी चोरों के अपने-अपने परिवार हैं। यार-दोस्त, संगी-साथी, प्रेमिकाएं और बॉस हैं। सभी मौसेरे भाई हैं। सभी मिल-जुलकर पैसा बनाते हैं। यही है सियासत : एक साझा उद्यम।

राजनीति के शब्दकोश में असंभव नाम का कोई शब्द नहीं होता। अगर आप सही कीमत चुकाने को तैयार हैं और किसी सही ब्रोकर की सेवाएं ले रहे हैं तो क्या नहीं किया जा सकता। इस बात से वाकई कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप ब्रोकर को क्या नाम देना चाहेंगे। आप चाहें तो उसे लॉबिस्ट कहकर पुकार सकते हैं। उसे पीआर कंसल्टेंट कह सकते हैं। पॉलिसी एडवोकेट या राजनीतिक सचिव कह सकते हैं। उसे किसी संगठन या परिसंघ का महासचिव कह सकते हैं या उसे खादिम, चाकर, दलाल या बिचौलिया भी कह सकते हैं। सवाल यह नहीं है कि उन्हें क्या कहकर पुकारा जाता है। असल बात यह है कि ये सभी लोग वे हैं, जिन्हें उल्लू सीधा करवाने की तरकीब मालूम है।

अगर आपको किसी उचित ब्रोकर की सेवाएं नहीं मिल पाती हैं तो शीर्ष के पत्रकारों से दोस्ती गांठिए। वे भी आपका मनचाहा काम करवा सकते हैं। कई बार मूर्खतापूर्ण गफलत में, अपनी महानता और महत्व के दंभ में डूबे हुए वे आपकी राह खोलेंगे। लेकिन अधिकतर मौकों पर वे ऐसा इसलिए करेंगे क्योंकि वे भी आप ही की तरह कतार में लगे हुए हैं। वे भी चाहते हैं कि ओहदे पर बैठे व्यक्ति से कुछ फायदा ऐंठ सकें। पत्रकार नए पार्ट टाइम ब्रोकर्स हैं।

संभव है कि आप बहुत विलक्षण और मेधावी व्यक्ति हों, लेकिन भारत में उद्यमशीलता की डगर इतनी आसान नहीं है। जब लाइसेंसों और परमिटों का बंटवारा होगा, तो सत्ता के साझेदार और उनके भाई-भतीजे, यार-दोस्त, संगी-साथी ही सब कुछ हड़प लेंगे। मीडिया भी उनका गुणगान करेगा कि भ्रष्टाचार और नाकारेपन की दलदल के बावजूद उन्होंने अपनी नैया सफलतापूर्वक किनारे लगा दी। तो कामयाबी का एक सूत्र यह भी है मित्रो कि किसी नामी-गिरामी के पिछलग्गू बन जाओ।

राजनीति और व्यवसाय दोनों में ही साफ छवि के लोगों के दिन अब लद चुके हैं। आजकल चालाक लोगों या चलते पुर्जो का सिक्का चलता है। कुछ ऐसे भी हैं जो चालाकों के साथ ही हो लेते हैं। कुछ अपना उल्लू सीधा करने के लिए पहले तो चालाकों की सेवाएं लेते हैं और फिर बाद में हर तरफ फैले भ्रष्टाचार का स्यापा करते हैं। घड़ियाली आंसू बहाते हैं।

ऐसे चतुर-सुजान भी कम नहीं हैं, जो चालाक लोगों की कारगुजारियों को कानून सम्मत ठहराने के लिए नए नियम-कायदे गढ़ने का सुझाव दे सकते हैं। कुछ लोग अपने कारोबारों के लिए कोई अच्छा-सा शीर्षक भी खोज सकते हैं ताकि वह कानून सम्मत मालूम हो। जो लुटेरा है, वह सामाजिक न्याय की खोज करने वाला बन जाता है और जो दलाल है, वह वैकल्पिक अधिकारों के लिए झंडा बुलंद करने लगता है।

अगर कोई स्मार्ट नौकरशाह अपने तौर-तरीकों को कानून सम्मत नहीं ठहरा सकता तो इसमें भी कुछ गलत नहीं है। असल में हमारे तमाम कानून इसी तरह गढ़े गए हैं कि गलत को सही साबित किया जा सके और सही को गलत ठहराया जा सके। कुछ कानून ऐसे भी होते हैं, जिनकी मनमानी व्याख्या नहीं की जा सकती। ऐसे मौकों पर चतुर-सयाने नौकरशाह उन कानूनों की रूपरेखाएं ही बदल देते हैं।

भ्रष्ट राजनेताओं या सरकारी अफसरों को दंडित करना आसान नहीं है। ज्यादा से ज्यादा यही किया जा सकता है कि उन्हें उनके मलाईदार ओहदे से बेदखल कर दिया जाए ताकि इसके बाद वे मजे से आराम फरमाएं, फ्रेंच रिविएरा पर शैम्पेन की चुस्कियां लें और ऐशो-अय्याशी की जिंदगी बिताएं। उनकी जगह पर कोई और भ्रष्ट आ जाएगा और आप और हम पहले की तरह ठगे जाते रहेंगे।

किसी टिकाऊ सरकार को चलाने के लिए एक साथ बहरा, गूंगा और अंधा होना जरूरी है। यदि आप स्वयं भ्रष्ट नहीं हैं तो यह आपके लिए अच्छा ही है क्योंकि तब मीडिया आपको बरी कर देगा और आरोपों का सारा ठीकरा आपके सहयोगियों के सिर पर फूटेगा। आप भी कभी-कभार दोषारोपण के खेल में शामिल हो सकते हैं और अपने आसपास के लोगों पर अंगुलियां उठा सकते हैं। वास्तव में यह काफी दिलचस्प खेल है।

मीडिया भले ही आपको भ्रष्ट कहकर पुकारे और दुनियाभर की बुराइयों के लिए आपकी लानत-मलामत करे, लेकिन याद रखें कि मीडिया बुरे लोगों को पसंद करता है। आखिर बुरे लोग ही तो उनकी टीआरपी बढ़ाते हैं। देश को बदलने या हालात को बेहतर बनाने की कोशिश करने का कोई फायदा नहीं है क्योंकि मीडिया कभी इसकी खबर दिखाने से रहा। मदर टेरेसा को प्रसिद्धि पाने में पचास साल लग गए। दाऊद इब्राहीम को महज तीन साल लगे। राजा रातोंरात नामचीन हो गए।

अगर आप विपक्ष में हों तो मूर्खो की तरह व्यवहार करें और इतना शोरगुल मचाएं कि कोई भी न सुन पाए आप क्या कहना चाहते हैं। क्योंकि यदि कोई आपकी बात सुन पाएगा तो वह यह भी कह सकता है कि जब आप खुद सत्ता में थे, तब आपने क्या कर लिया? महज शोरशराबा करें और बेबूझ बने रहें। अतीत के अंधेरे कोनों से पुराने पाप सरककर बाहर आएंगे और आप अपनी नैतिक जाजम से भड़भड़ाकर नीचे गिर पड़ेंगे।

हम कभी कोई सबक नहीं सीखते। किसी ने भी यह सवाल नहीं पूछा कि इन प्राइवेट फोन कॉल्स को किसने और किसकी इजाजत से टेप किया? हर कोई राजनीतिक बढ़त हासिल करने में इतना मुब्तिला है कि असल मुद्दे पर किसी का ध्यान नहीं गया। वह यह है कि सरकार में बैठे लोग किसी दिन आपकी बातचीत टेप कर उन्हें सुन लेंगे। यह इतना भयावह परिदृश्य है, जिसकी ऑरवेल जैसे लेखकों ने कभी अपने दु:स्वप्नों में कल्पना की थी। ऑरवेल के दु:स्वप्न आज हकीकत बन चुके हैं। 
प्रीतीश नंदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार और फिल्मकार हैं

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