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चैनलों की चमड़ी चमकदार होते हुए भी मोटी है


जयप्रकाश चौकसे–

यह मजे की बात है कि आमिर खान ने अपनी सामाजिक प्रतिबद्धता की सिताराविहीन फिल्म पीपली लाइव का प्रचार उसी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के माध्यम से किया, जिसका मखौल उनकी फिल्म उड़ाती है।

मीडिया ने इस पर एतराज भी नहीं किया क्योंकि उन्हें किसी भी कीमत पर सितारा चाहिए, भले ही उसके हाथ में इनके लिए जूता ही क्यों न हो। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने आत्मसम्मान खो दिया है और उनकी इनस्यूलर आत्मा पर आलोचना का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। उनकी चमड़ी चमकदार होते हुए भी मोटी है।

यह सच है कि भारत में प्राय: मनोरंजन उद्योग अर्धशिक्षित लोगों के हाथ रहा है, परंतु पारंपरिक अर्थ में अशिक्षित फिल्मकारों ने सामाजिक सोद्देश्यता की महान फिल्में भी रची हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कर्णधार बहुत पढ़े-लिखे लोग हैं, इसलिए उनकी संवेदनहीनता पर बहुत दुख होता है।

ये पढ़े-लिखे कर्णधार आमिर खान अभिनीत थ्री इडियट्स के उस पात्र की तरह हैं, जो घोटा लगाकर येन केन प्रकारेण उच्चतम अंक अर्जित करता है। चैनल संचालकों के दिमाग इतने छोटे हैं कि उन्हें निकालकर कीड़े-मकोड़ों के जिस्म में फिट किया जा सकता है, परंतु इनकी फितरत ऐसी है कि वहां भी ये नेटवर्क बना लेंगे।

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की आत्मा का तोता टीआरपी नामक पिंजरे में कैद है। टेलीविजन पर लोकप्रियता का आकलन करने वाली अंतरराष्ट्रीय ख्याति की कंपनी ने सांस्कृतिक विविधता वाले भारत में मात्र सात हजार घरों में उनके मीटर लगाए हैं और यह बताना कठिन है कि मीटर नौकर के कक्ष में लगा है या मालिक के टीवी में। कितने मीटर ग्रामीण क्षेत्र में हैं और कितने महानगरों में।

आकलन की यह विधि उन देशों में काम करती है, जहां अधिकांश लोग एक ही भाषा और धर्म के होते हैं। विविधता, विरोधाभास और विसंगतियों वाले देश में लोकप्रियता का आकलन आसानी से नहीं हो सकता। हमारे यहां तो लोकप्रिय सरकारें भी अल्पमतों से बनती हैं। इसी टीआरपी के आधार पर विज्ञापन मिलते हैं और उनकी दरें भी तय होती हैं। चैनल युद्ध इसी टीआरपी के लिए होता है और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की सारी संवेदनहीनता तथा गलाकाट प्रतिद्वंद्विता का कारण भी यही है।

खबरें देने वाले चैनल सातों दिन चौबीस घंटे सक्रिय रहते हैं और यथेष्ट खबरें नहीं होने पर खबरें गढ़ी जाती हैं। अतिरेक उनकी शैली नहीं, उनकी मजबूरी है। मनगढ़ंत व्याख्या करके घटना के इर्दगिर्द धुंध पैदा करना उनके लिए आवश्यक है। वे सत्य नहीं, सनसनी फैलाने में यकीन रखते हैं। कुछ उद्घोषक इतनी नाटकीयता से ऊंची आवाज में साधारण घटना को पेश करते हैं कि विश्व युद्ध का आभास होता है।

पीपली लाइव में एक पत्रकार और नेता की दोस्ती को भी प्रस्तुत किया गया है और मीडिया को नेता अपनी सुविधानुसार इस्तेमाल करते हैं। इस फिल्म में अखबार के एक पत्रकार को उसके प्रथम दृश्य में कविता पढ़ते दिखाया गया है और इस छोटे से दृश्य में ही उसका संवेदनशील होना स्थापित किया गया है। यह गौरतलब है कि यह संवेदनशील पत्रकार इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़ना चाहता है और उसकी यह ललक ही उसे उनके लिए काम करने को मजबूर करती है।

वह एक बददिमाग औरत को भी बर्दाश्त करता है। वह उस समय आहत होता है जब एक मुफलिस मेहनतकश किसान की मृत्यु को अनदेखा किया जाता है क्योंकि आत्महत्या करने वाला व्यक्ति मीडिया की निगाह में ‘स्टार’ है। यह पूरा खेल ही इस कदर ‘स्टार केंद्रित’ है कि आम आदमी हाशिए पर धकेल दिया गया है। यही संवेदनशील पत्रकार झुलसकर मरता है और उसे किसी और की लाश समझा जाता है। इस निर्मम व्यवसाय में इसे संवेदना का शव ही माना जाना चाहिए।

इस फिल्म में एक तरफ यह नामहीन शव है और दूसरी तरफ नायक महानगर में गुमशुदा का जीवन जीने के लिए बाध्य है। वह अनपढ़ स्वयं को तमाशा बनाए जाने से इतना दुखी है कि पहचानरहित जीवन का चयन करता है। यह प्रकरण कम डिग्री में प्यासा के नायक की तरह है जो स्वयं के वजूद से इनकार कर देता है, क्योंकि वह जानता है कि ‘ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है?’

मीडिया के इस सर्कस में जोकर का रुतबा रिंगमास्टर से बड़ा है। इसका राष्ट्रीय हानि का यह पक्ष भयावह है कि ट्रिविया के कारण हार्ड न्यूज का महत्व घट गया है। देश की असली समस्याओं का कभी जिक्र ही नहीं होता और महत्वहीन बातों को खूब उछाला जाता है। शनि के प्रकोप पर कार्यक्रमों की भरमार है। हमारी सारी कुरीतियों को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने पुन: जीवित कर दिया है।

इस प्रायोजित खेल ने अपने सितारों का निर्माण किया है, जिनका जमीन से कोई रिश्ता ही नहीं है। एक साथ ढेरों खबर चैनल अस्तित्व में आए और इस विस्फोट के समय प्रशिक्षित लोगों का अभाव था, अत: जबरन की भर्ती हुई है। कुकुरमुत्ते की तरह प्रशिक्षण संस्थाओं का उदय हुआ, जहां शिक्षकों का अभाव था। इस विधा में कोई एकलव्य नहीं हुआ। बंदरों के हाथ उस्तरा लग गया है।

लेडी डायना की कार दुर्घटना में मौत हुई, क्योंकि मीडिया की कारें उसके पीछे शिकारी कुत्तों की तरह पड़ी थीं। श्रीमती जैकलीन कैनेडी व्यक्तिगत समुद्र तट पर स्नान करती थीं तो उनके चित्र लेने के लिए मीडिया के लोग उपकरणों से लैस होकर जल के भीतर दूर से तैरते हुए आए। भारत का मीडिया पश्चिम के मीडिया की नकल कर रहा है। कत्ल हो, आत्महत्या हो, सूखा हो, अतिवृष्टि हो, वे सब जगह पहुंचकर मूर्खतापूर्ण प्रश्न पूछते हैं और परेशान लोगों के जख्मों पर नमक छिड़कते हैं। सबसे दुखद बात यह कि खबर चैनल और सीरियल एक वैकल्पिक संसार की रचना कर रहे हैं और यथार्थ से दूर एक नया संसार रच रहे हैं। विज्ञापन शक्तियों का यह सबसे मारक हथियार है।

जब चौबीस घंटे सातों दिन सक्रिय खबरी चैनलों का उदय हुआ, तब यह संभावना थी कि अखबारों की बिक्री घट जाएगी, परंतु इसी दौर में अखबारों की प्रसार संख्या खूब बढ़ी है। स्पष्ट है कि तमाशबीन जनता छोटे परदे पर खबरों का स्वांग देखती है, लेकिन भरोसा अखबारों पर करती है। हमारे पाठक फिल्मी समालोचना को मजे लेकर पढ़ते हैं, परंतु फिल्म चुनने का उनका अपना अलग तरीका है। जैसे समालोचना उनके लिए स्वतंत्र मनोरंजन है, वैसे ही नाटकीय और अतिरेक के साथ अभिनीत खबरें भी उनके लिए स्वतंत्र मनोरंजन हैं। प्रारंभ में खबरों का असर था, परंतु अतिरेक और दोहराव के कारण चैनल स्वयं का कैरीकेचर बनकर रह गए हैं।

इस विकराल तंत्र के लगातार फैलते दायरे को रोकने के लिए दूरदर्शन को लोकप्रियता आकलन का तंत्र विकसित करना चाहिए। शासन शासित लोकप्रियता आकलन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से कचरा बुहार देगा। गौरतलब है कि सरकार में व्यापक भ्रष्टाचार के बावजूद दूरदर्शन ने नितांत भारतीय कार्यक्रम रचे हैं, जबकि प्राइवेट चैनल अपने असीमित बजट के बावजूद सिर्फ फूहड़ता ही रच पाया है। देश के सांस्कृतिक डीएनए के साथ छेड़छाड़ के षड्यंत्र को रोकना आवश्यक है। आमिर और अनुषा रिजवी ने राष्ट्रीय हित का सार्थक सिनेमा रचा है।

भास्कर से साभार

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