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भोपाल गैस त्रासदी : एक शब्द चित्र

भोपाल गैस त्रासदी : एक शब्द चित्र

















डॉ. कमल जौहरी डोगरा, भोपाल

*
याद है उन्नीस सौ चौरासी
दो दिसंबर की वह भीषण रात
और तीन दिसम्बर का धुंधला सवेरा
बीत गए जिसके छब्बीस साल.
















शीत ऋतु की काली रात वह
गैस त्रासदी के लिये कुख्यात.
बन गयी बिकाऊ खबर
विश्व-नक़्शे पर उभर आया भोपाल.

सहानुभूति-सहायता का समुद्र लहराया
पत्रकारों, छायाकारों की भारी भीड़
नेताओं की दौड़-भाग, गहमा-गहमी
सब उमड़ आये भोपाल में बादलों से.

कुछ देर में छँट गए थे बादल
बिना बरसे उड़ गए हवा में शीघ्र
रह गयी जनता कराहती, दुःख भोगती
अनाथ बच्चे, विधवा नारियाँ बिसूरती.

पुरुष जो बच गए, पुरुषार्थ से हीन
आजीविका कमाने में असमर्थ वे
परिवार बिखरे, कुछ के लापता सदस्य
जो आज तक गुमशुदा सूची में हैं.

कैसी घोर विपत्ति की थी रात?
सड़कों पर भीड़, भागता जन समूह
कहीं भी, कैसे भी भोपाल से
दूर भाग जाने को व्याकुल.















पर दिशाहीन इन मानवों का 
दिशादर्शन करनेवाली वाणी मौन थी.
सरकारी घोषणा न थी कहीं कोई
भेड़ों सी भागती जनता थी सब कहीं.

स्मरण है हम भी भागे थे भीड़ में
आँख जब अचानक खुल गयी थी.
खांसी की तकलीफ से छोड़ा बिस्तर
पहुँचे थे पानी पास, आँख की जलन से.

पीड़ा न कम हो पाई पर किसी तरह
अचानक शोर-गुल सड़क पर सुन
जिज्ञासा-कौतूहल ने उकसाया था
पूछने पर सुना: ''तुम भी भागो.

गैस निकली है कार्बाइड से विषैली.
मर रहे हैं लोग, शहर से दूर जाओ.''
घर में न सवारी थी, न कोई पुरुष ही
केवल एक बालक, विद्यार्थी था.

मृत्यु के भय ने लगा दिये थे पंख
किसी तरह हड़बड़ी में ताला डालकर
भाग लिये थे हम, पैरों पर दौड़ते से
रास्ते पर वाहन भरे थे लोगों से.

















कोई न सुन रहा था हमारी गुहार.
लिफ्ट देने की करुण प्रार्थना पुकार
न जगह थी, न समय उनके पास.
थी पीछे मौत, भागना था उससे दूर.

आखिर पैदल ही मीलों चले उस रात
कई और भी लोग थे हमारे साथ
रुके वहाँ जहाँ सो रहे थे निवासी
शरण ली के घर में परिचितों के साथ.

फिर पौ फटी, सूरज उग रहा था.
अफवाहों का घटाटोप भी छंटा.
कोई आया उनके घर, हादसे को देख
शवों, मूर्छितों से पटी सड़कें लाँघकर.

आँखों-देखी का वर्णन कर रहा था
अस्पतालों में पीड़ितों की भीड़
सड़कों पर नेताओं की कुछ जीपें
कितना विषैला प्रभाव था गैस का?

मानव ही नहीं मार्ग और गलियों में थी
गाय, बकरी, मुर्गियों की निर्जीव देहें.
झुलसे पेड़, पत्तियां थी जहर रहीं
मृत्यु की काली छाया सब पर पडी.

















हो गया शहर का जीवन गतिहीन
केवल रुदन, कराहें, अस्पतालों में लोग
आवागमन के साधन भी न थे कहीं
न तांगा, न टेम्पो, न कोई बस.

मृतकों को ढो रही थीं सरकारी गाड़ियाँ
या कि एम्बुलेसों में जिंदा बेहोश देहें
स्वयंसेवक व्यस्त थे, मूर्छितों को ढोते.
झुग्गी-झोपडी से निकालते पीड़ितों को.

उधर दान का था दौर चल पड़ा
अस्पतालों में था अम्बर भोजन का.
औषधियाँ भी दान में आने लगीं थीं.
दानियों की भीड़ लगी थी, होड़ सी.

भाग्यशाली थे वे जो बच गये थे.
या कि वे जिन्हें कम क्षति पहुँची थी.
देखने को उत्सुक थे, चिंतित भी
वे ही दानी थे, वे ही सेवा में रत.

उज्जवल पक्ष एक था इस त्रासदी का
सरकारी चिकित्सकों ने किया रात-दिन एक.
भूखे-प्यासे जुटे थे वे बचाने में
पीड़ितों को जीवित मृत्यु-मुख से.
















शहर के सब अस्पताल भर गए
बल्कि तम्बू भी तने थे शरण देने हेतु.
नागर में अफवाह थी: पानी, वनस्पति
हवा सब कुछ, हो गया दूषित यहाँ पर.

आतंकित थे लोग, हवा-पानी किस तरह छोड़ें?
सब्जी खाना छोड़ दी थी सभी ने.
सब कुछ अछूत सा हो गया था शहर में
जन-पलायन भी शुरू हो चला था.

कई मोहल्ले सूने हो गए पूरे के पूरे.
ताले लगे हुए थे द्वारों पर, पुराने भोपाल में.
कुत्ते भटक रहे थे भूख से व्याकुल बहुत
वीरान हो गया था शहर का बड़ा हिस्सा.

हमीदिया अस्पताल में देखे थे हमने
कुछ नन्हें बच्चे नर्सों की गोद में
जिनको लेने कोई नर-नारी न आया था.
अब अनाथों की सूची में थे वे लावारिस.

स्कूल-कालेज बंद हो गए अनिश्चय में
पढने, पढ़ानेवाले दम साध घर में बैठे थे.
कुछ के संबंधी चल बसे थे, कुछ खुद पीड़ित थे.
कौन-किसे आदेश देता? जिसकी प्रतीक्षा थी.














दफ्तरों में हाजिरी थी न्यून याकि शून्य.
कुछ तो खुले ही न थे, खोलनेवाला न था.
डाक, तर, टेलीफोन सब बंद हो गये.
बहर के शहरों में दुखी-चिंतित थे संबंधी.

मृत्यु का तांडव नृत्य देखा आँखों से
भोपाल आ गया था काल की चपेट में.
अकाल मौत की छाया मंदर रहे एथी
सब ओर हाहाकार, आशंका और भय था.

ऐसे दिन कभी न देखे थे जीवन में.
कितने प्राणियों को डँस लिया था
कितनों को निर्जीव-अपंग बना था
'युनियन कार्बाइड' के कारखाने ने.

यह कारखाना जो कभी खुला था
सौभाग्य बनकर इस धरती पर
हजारों की आजीविका का साधन बनकर
अधिकारी बन गए थे कुछ  पहुँचवाले.

उनका व्ही. आई. पी. गेस्ट हाउस
शरण देता था बहुतों को कृपा कर
फिर भला कौन जाँच करता उनके
जन-घातक कारनामों की समय पर.
















पहले भी छुट-पुट घटनाएँ हुईं थीं
विधान सभा में उठे प्रश्न, हुई चर्चा
दबा दी गयी आवाज़ सत्य- न्याय की
दफना दी गयीं घटनाएँ फाइलों में.

शासन की यही उपेक्षा भारी पड़ गयी
बन गयी महाकाल के तांडव की वज़ह.
काल-सर्प डँस गया हजारों को भोपाल में
लिख गया इतिहास भयावना-डरावना.

दोषी कोई और, पाप किसी और का
फल भोग निर्दोष नागरिकों ने, भाग गए
ज़िम्मेदार नेता, जन प्रतिनिधि, अधिकारी
बची रही सभी की कुर्सी, की कर्त्तव्य की उपेक्षा.

प्रधानमंत्री ने लगाया फेरा अस्पताल का
दिया आश्वासन पूरी सहायता का, 'की कृपा?'
बोले मुख्यमंत्री, 'सभी साधन हैं यहाँ',
'सफ़ेद झूठ' कह हँसा महाकाल. कौन सुनता?

विदेशों से आये आश्वासन, संवेदनाएँ, राशियाँ
समां गए प्रशासन के भस्मासुरी पेट में,
कट न पाये कष्ट बेबस जनता के आज तक
हो नहीं सका है न्याय, न आशा शेष है न्याय की.













विदेशी पत्रकार लिये कीमती कैमरे
आ धमके अमरीकी वकील, दिलायेंगे न्याय
लुटेरे बाँटेंगे खैरात?, कैसा ढकोसला?
हाय रे मानव! पीड़ितों को दिलासा भी झूठी.

आने लगे शोधकर्ता क्रमवार, पूछते प्रश्न
चिकित्साशास्त्र के विद्यार्थी, कुरेदते घाव
समाजशास्त्र के शोधकर्ता जुटते आँकड़े
किसे चिंता पीड़ितों की?, सभी चाहते तथ्य.

आया ए.आई.एम्. संस्थान करने परीक्षण
परखने 'मिक' का दुष्प्रभाव मनुज शरीर पर
दी होगी कुछ सच्ची-कुछ झूठी रिपोर्ट
जनता तक न पहुँचने दी गयी उसकी भनक.

अखबारी खबर: 'सरकार ने छिपाली रपट.
कैसे और कौन करता प्रकाशन? खुलता झूठ
बेनकाब होता शासन-प्रशासन. हद तो यह
घातक रोगों से घिरे जन को न दी गयी जानकारी.

कौन किसे कब कैसे देगा मार्गदर्शन?
इस विपदा से जूझने का, न जानता था कोई.
अँधेरे में सुई टटोलते से, रोगियों को
सतही स्तर पर दावा दे रहे थे चिकित्सक.

















लक्षणों पर आधारित पद्धति से हो रहा था
इलाज साधनहीन सरकारी अस्पतालों में.
चिकित्सकों को भी ज्ञात न था उस वक़्त
कौन से विषैले रासस्याँ मिले थे गैस में.

'कार्बाइड मौन था, सरकार चुप्प, अँधेरा घुप्प.
अधिकारी थे संवेदना शून्य-उदासीन.
लोगों में व्याप्त थी दहशत, दानवी कारखाने से
अब भी बची थी भारी मात्रा में 'मिक' भंडारों में.

किसी भी दिन फ़ैल सकती है विषैली गैस.
वायुमंडल को कर सकती है दूषित.
लौट न पा रहे थे लोग, इसी भय से.
अतः, घोषणा हुई 'ऑपरेशन फेथ' की.

भगोड़ा अर्जुन आया तानकर सीना, बोला:
'वैज्ञानिक करेंगे नष्ट 'मिक को, न हों भयभीत'
न हुआ भरोसा किसी को झूठे-लबार  पर
तिथि तय हुई, फिर भागे लोग जान बचाने.

वह दिन भी आया और निकल गया
शनैः-शनैः हुआ था भय कुछ कम.
पनप रहे थे रोग- घातक, असाध्य, पीड़ादायी
चल रही थी दावा लम्बे समय की.















क्रमशः दम तोड़ रहे थे पीड़ित
मृत्यु दर तीव्रता से बढ़ रही थी.
सरकारी आँकड़े कह रहे थे कुछ और
फिर भी संख्या पहुँची हजारों में.

जो बच भी गए वे कमाने काबिल न थे.
खाँसते-कराहते थे रात-दिन अस्पतालों में.
धरती या खाट पर पड़े कमजोर-कंकाल
भविष्य की फ़िक्र में तिल-तिल घुल रहे थे.

खुले थे कुछ वार्डों में अस्थायी कैम्प.
बँट रहा था अनाज गरीब तबकों में.
कुछ ज़रूरी राशन कुछ को मिला मुफ्त.
ले रहे थे काँपते हाथ, हताश चेहरे, बुझी नज़रें.

धीरे-धीरे आ रही थी गति शहर में
खुले थे दफ्तर, शालाएँ, महाविद्यालय भी.
पर चहल-पहल न थी कहीं, सर्वत्र उदासी
तूफ़ान के बाद की सी शांति फ़ैली थी.

गैस-राहत का दफ्तर खुल गया था'
अधिकारी भी नियुक्त किए गये थे उनमें.
 सक्रिय हो रहे थे वे धीरे-धीरे,
बन रहे थे कानून,निबटने समस्या से..
















सरकारी तंत्र चलता है जिस तरह 
समय तो लगना ही था व्यवस्था में,
किन्तु काल कब करता है इन्तिज़ार?
उसकी गति तेज़ थी निगलने की..

यंत्रवत सा सब चलने लगा था.
दिनचर्या चलने लगी पर निर्जीव सी,
लोग आने लगे वापिस, पलायन रुका
बँट रहे थे फार्म 'दावे; के प्रचुरता से..

उस हेतु भी वापिस आ रहे थे लोग
आशा बंध गयी थी कि कुछ होगा अब.
क्षतिपूर्ति का लाभ मिलेगा शीघ्र ही
धंधा-इलाज सब कर सकेंगे जिससे..

किन्तु एक साल बाद ही मिल पाये थे
केवल दो सौ पचास रुपये प्रति माह के.
'अंतरिम राहत' के नाम से, भीख की तरह
अनेक चक्करों और लंबी कतारों के बाद..

बैंकों की शाखाएँ खुलीं फिर तो
भीड़ जब सम्हाली न थी सरकारी तन्त्र से.
दावों की सुनवाई का चला नाटक
न्यायाधीशों की नियुक्ति ने लिये कुछ साल..
















कराहती जनता कर रही थी एकत्र
साक्ष्य के लिये चिकित्सा के सबूत.
मृतकों के पोस्टमार्टम की रिपोर्ट
श्मशानों, कब्रिस्तानों के प्रमाण पत्र भी..

बहुत मुश्किल था यह सब जुटाना
कहाँ, किसके पास रखा था सुरक्षित
अशिक्षित जनता कहाँ जानती थी
इंसान से ज्यादा, कागजों का महत्त्व?

बेबस, बीमार, लाचार काट रहे थे चक्कर
न्याय पद्धति जटिल-जानलेवा-समयलेवा.
शासकीय मशीनरी जड़, संवेदना से शून्य.
न्यायाधीश करते कानून का पालन?

कानून जो होता है अंधा और बहरा
भीषणतम त्रासदी कभी कहीं नहीं घटी
इससे उसे क्या सरोकार? उसे चाहिए-
सबूत, आप जिंदा हैं? इसका भी..

कानून की इस प्रक्रिया ने ले लिये
कितने ही वर्ष?, पीड़ितों की दशा
बाद से बदतर हो रही थी प्रति पल
न्याय की आस में तोड़ गए दम कितने ही..















न वकील, न बहस, न तारीख
एक दिन आता कागज़- 'आइये! लेने मुआवजा
फलां दिन, फलां जगह, फलां समय'...
श्रेणीबद्ध कर दिये पीड़ित, क्या पीड़ा भी?

ए, बी, सी, डी... श्रेणी में बाँटा था जिनने
नहीं विदित था उनको भी आधार रहा क्या?
भीषणतम विभीषिका थी यह इस शताब्दी की
इंसानों के साथ मरे पशु-पंछी अगणित..

जीवन भर को बन गए थे लाखों रोगी.
अस्थमा, खांसी, ह्रदय की बीमारियाँ.
नेत्र-ज्योति ही हानि, कैंसर से भयंकर रोग
पल-पुस रहे थे अगणित शरीरों में दिन-रात.

गर्भिणी महिलाएँ, गर्भस्थ शिशु भी
हुए थे दुष्प्रभावित विषैली गैस संक्रमण से.
आजीवन ही नहीं, पीढ़ियों तक रहेगा प्रभाव
हानि का मूल्य आँकना संभव नहीं.

सरकार ने आंकी थी कीमत, बहुत सस्ती
शासन के आकाओं की नज़र में
आदमी की पीड़ा की कीमत
न्यूनतम केवल बीस हज़ार ही थी.
















अधिकतम?... कुछ ज्यादा हज़ार...
मृतकों का मुआवजा- लाख रुपये
इंसान की कीमत आंकी गयी जीवित रहते
उपार्जन क्षमता से, आयु से, रुतबे से.

करोड़ों की राशि लेकर बैठी सरकार
अत्यंत कृपण थी उसे पीड़ितों तक पहुँचाने में.
न योग्यता का मूल्य, न विशेषज्ञता का,
न विद्वता का, न त्याग-समर्पण का.

योजनायें बनाती रहीं, चलती रहीं
बरसों तक इलाज़ की, बसाहट की.
रोज़गार देने की, अशक्तों को
निराश्रितों को पेंशन दिलाने की.

खोले गए नए अस्पताल करोंड़ों के
कुछ तो आज तक न हो सके क्रियाशील
कैसी ढील?, कीमती मशीनों में लगी में जंग 
अब भी चल रहा है चक्र लगातार.

आधे-अधूरे मन से हो रहा है यह सब
किसी की सच्ची लगन या रूचि नहीं
नेता है राजनीति और वोटो के खेल में व्यस्त
अधिकारी लाल-फीताशाही के मद में ग्रस्त.
















लंबी अंतहीन कहानी, न जाने कब तक चले?
एक और महत्वपूर्ण पक्ष है इस त्रासदी का
हत्यारों को दंड दिलाना भी तो जरूरी था
जो जिम्मेदार थे हजारों प्राणियों की मौत के.

कंपनी के मलिक को न कर गिरफ्तार
भगाया था देश से सुरक्षित, सरकारी यान से
फिर बन कमजोर केस, कई दिनों बाद
कुछ साल चलता रहा, ख़बरें छपती रही.

अंत में किया गया एक समझौता
राष्ट्रीय अस्मिता से, बहुत अपमानजनक ढंग से
केवल कुछ करोड़ रुपयों की राशि देकर
बरी हो गया अपराधी जघन्य अपराध से.

उत्पीड़ितों से कुछ पूछा-जाना नहीं गया.
वाह रे जनतंत्र, साफ़ हो गया कि आज भी
हम दास हैं विदेशी आकाओं के.
उस दिन इस स्वतंत्र देश का सिर नीचा हुआ.

भारतीयों की जान की कीमत कुछ भी नहीं.
भारतीय की हत्या देश में हो या विदेश में
अपराध नहीं बनती, सजा नहीं मिलती
कलंकित हुआ देश दुनिया और भावी पीढ़ियों के सामने.













किसने किया यह अन्यायपूर्ण  समझौता?
व्यक्ति हो या सरकार किसने दिया अधिकार?
जनता दण्डित देना चाहती है कंपनी मालिकों को
'एंडरसन' को फाँसी होनी ही चाहिए.

हम दे न सके हत्यारों को सजा कोई.
धनराशि का हुआ भरपूर दुरूपयोग.
चिल्लाते हैं उत्पीडित आज भी
वर्षगाँठ मनती है हर बरस, होती हैं घोषणाएँ.

अब भी कहाँ सुरक्षित है यह शहर?
अब भी दबे हैं विशिले-घातक रसायन
कारखाने की मिट्टी और टैंकरों में.
ला सकते हैं कभी भी प्रलयंकर भूचाल.

भूलते जा रहे हैं वह भीषण रात क्रमशः.
प्रकृति का नियम है भूलो और जिओ
कितु याद न रखा तो- फिर-फिर होंगे हादसे
फिर-फिर होगा अन्याय देश में यहाँ या अन्यत्र.

दास्तां लंबी है पीड़ितों की पीडाओं की
कहाँ तक कही-लिखी जाये?, इस घड़ी
सिर्फ और सिर्फ कलम की श्रृद्धांजलि
मृतकों को, संवेदना पीड़ितों के लिये अशेष.














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दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम

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