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बेहतरीन अदाकारी का इनाम ट्रक भरकर फूल


भावना सोमाया

जब कोई फिल्म चलती है तो कोई भी उसकी सफलता के कारण की पड़ताल करने की परवाह नहीं करता, लेकिन फिल्म के पिट जाने पर सभी समीक्षक बन जाते हैं। रावण के साथ यही हो रहा है। समीक्षक फिल्म की कहानी, रणनीतिकार फिल्म के प्रचार और दर्शक फिल्म के चरित्र चित्रण को दोष दे रहे हैं। दर्शकों और फिल्म जगत को मणिरत्नम की फिल्म से बहुत उम्मीदें थीं। लेकिन ऐसा पहली बार नहीं हुआ जब कोई अतिप्रचारित फिल्म पिट गई हो।

यह बड़े-बड़े फिल्मकारों के साथ भी हो चुका है। राज कपूर की मेरा नाम जोकर, यश चोपड़ा की सिलसिला और लम्हे, बोनी कपूर की रूप की रानी, चोरों का राजा, सुभाष घई की यादें, अमिताभ बच्चन की मृत्युदाता.. सभी इसी श्रेणी में आती हैं। कुछ लोग नाकामी के दौर से गरिमा के साथ बाहर आते हैं। कुछ खामोशी से इसका सामना करते हैं तो कुछ इसे चुनौती की तरह लेते हैं। अमिताभ बच्चन ने यही किया था, जब कौन बनेगा करोड़पति से उन्होंने जोरदार वापसी की थी।

वे भले ही अपनी निजी जिंदगी में बहुत ज्यादा शब्दों का इस्तेमाल नहीं करते हों, लेकिन सदाशय प्रतिक्रियाएं देने में वे कभी पीछे नहीं रहे। 70 के दशक में अपनी एक सहकलाकार के अच्छे अभिनय पर उन्होंने ट्रक भरकर फूल भिजवाए थे। हेमा मालिनी से लेकर अनिल कपूर और आमिर खान से लेकर शाहरुख खान तक सभी महानायक के शुभकामना संदेशों की दरियादिली के कायल हैं।

एक बातचीत में अमिताभ बच्चन ने उन यादगार फिल्मों और दृश्यों को याद किया, जिसके बाद उन्होंने कलाकारों को शुभकामनाएं भेजी थीं। अमिताभ ने बताया ‘मुझे दिल चाहता है इतनी अच्छी लगी कि मैंने सैफ, आमिर, फरहान और अक्षय को व्यक्तिगत रूप से फूल भिजवाए। नेमसेक में इरफान खान और तब्बू का अभिनय कमाल का था। खासतौर पर तब्बू का टेलीफोन दृश्य, जहां उसे पति की मौत की खबर मिलती है।

परिणीता में विद्या बालन सम्मोहक थीं। मैं उनसे नजरें नहीं हटा सका। मेरे साथ ऐसा पहले वहीदा रहमान की फिल्में देखते ही हुआ था। मेरे ख्याल से स्वदेस में शाहरुख ने अपना अब तक का सर्वश्रेष्ठ अभिनय किया था। करीना की इतनी फिल्में हैं, लेकिन मुझे उनका एक विज्ञापन बहुत पसंद है, जिसमें उनके एक्सप्रेशन देखते ही बनते हैं। गुरु में अभिषेक ने फिल्म का अंतिम दृश्य बहुत अच्छे से किया था। पा के अस्पताल वाले दृश्य में भी वे बहुत प्रभावी थे। कमीने में शाहिद कपूर के क्लोज अप दृश्य शानदार थे।

वे मुझे गोआ की फ्लाइट में मिले तो मैंने उन्हें इसके लिए बधाई दी। प्रतीक बब्बर एक खोज हैं। जाने तू या जाने ना में उन्होंने इस तरह सहज अभिनय किया, जैसे उन्हें कैमरे का कोई भान ही नहीं हो। जोधा अकबर में रितिक रोशन अद्भुत थे। खासतौर पर ख्वाजा मेरे ख्वाजा गाने के दौरान, जब वे उठकर सूफियों के साथ नाचने लगते हैं। मैं थिएटर में यह फिल्म देख रहा था और मुझे महसूस हुआ कि मुझे खड़े होकर इस दृश्य पर ताली बजानी चाहिए।

थ्री इडियट्स में शरमन जोशी का इंटरव्यू दृश्य और हाल ही के उनके सारे मोबाइल फोन विज्ञापन बेहतरीन हैं। इनमें उनकी सहजता और एक्सप्रेशन की बारीकियां नजर आती हैं। रावण के क्लाइमैक्स दृश्य में ऐश्वर्या ने जो एक्सप्रेशन दिया है, अगर उसे डायलॉग के रूप में लिखें तो दस पेज लग जाएंगे। और सबसे अंत में रावण में वह दृश्य, जहां बीरा को रागिनी के प्रति अपने आकर्षण का पता चलता है। यह मणिरत्नम का जादुई सिनेमा है। खालिस जादू!’

लेखिका की सिनेमा पर नौ किताबें प्रकाशित हैं।

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