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पाक की पुरानी कहानी

शेखर गुप्ता

कुछ माह पहले ही मैंने अपने कॉलम में लिखा था कि पाकिस्तान का सत्ता तंत्र समय-समय पर गफलत में आ जाता है। उनके यहां कुछ ऐसे हालात बन जाते हैं कि सहसा वे अपनी ‘जीत’ को लेकर आश्वस्त हो जाते हैं। लेकिन उत्साह में वे खुद से यह पूछना भूल जाते हैं कि उनकी इस जीत के मायने क्या हैं और यह स्थिति कब तक बनी रहेगी। फिलवक्त पाकिस्तान ऐसे ही दौर से गुजर रहा है।

उसे लगता है कि दुनिया भर के अमन-चैन की चाबी उसी के हाथों में है और ओबामा और डेविड कैमरून का राजनीतिक भविष्य भी उसे ही तय करना है। ये एक ऐसे मुल्क के लिए बदले हुए हालात हैं, जिसे अभी तक बदहाल माना जा रहा था। लेकिन इस बार नई बात यह है कि पहले उसे हमेशा लगता था कि उसने यह ‘जीत’ भारत के विरुद्ध हासिल की है, जबकि इस दफे उसे लगता है कि उसने पूरी दुनिया को हरा दिया है। ओबामा की कमजोरी के चलते ही पाक आज खुद को सबसे ताकतवर महसूस करता है। लेकिन ऐसी ही स्थितियों में पाकिस्तान गंभीर भूलें भी करता है।

बीते हफ्ते इस्लामाबाद में जो हुआ, वह इसी का नतीजा था। खास तौर पर एसएम कृष्णा के साथ संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में शाह महमूद कुरैशी का दंभ भरा रवैया। बैठक से पहले जीके पिल्लई ने जो बयान दिया था, उससे किसी का भला नहीं हुआ। कुरैशी ने तो उनकी तुलना अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त आतंकवादी हाफिज सईद से कर डाली। लेकिन ऐसा कहकर कुरैशी ने खुद का ही नुकसान किया। इस दंभ के कारण भी पाक की दिक्कतों में इजाफा होता है। पाकिस्तान से बातचीत के 63 सालों का इतिहास इसका गवाह रहा है।

भारत और पाकिस्तान के वार्ताकारों के बीच सामाजिक और सांस्कृतिक (जिसमें राजनीतिक संस्कृति भी शामिल है) खाइयां ही नहीं हैं, उनमें पीढ़ियों का फासला भी है। कृष्णा 78 साल के हो चले हैं। उनकी आवाज लड़खड़ाती है, लेकिन वे भारतीय राजनीतिज्ञों के सुपरिचित नपे-तुले लहजे में बोलते हैं। उनकी तुलना में कुरैशी काफी कमउम्र हैं (वे उनसे 24 साल छोटे हैं)। उनकी तालीम कैम्ब्रिज में हुई है और उनकी कदकाठी शानदार है। मजे की बात तो यह है कि कृष्णा खालिस शहरी हैं, लेकिन उनकी राजनीतिक ताकत वोक्कालिगा के देहाती हलवाहों में है। वहीं अंग्रेजीदां नजर आने वाले कुरैशी हकीकत में मुल्तान की अपनी पुश्तैनी दरगाह बहाउद्दीन जकारिया के सज्जादा नशीन हैं। इससे बेमेल जोड़ी दूसरी नहीं हो सकती थी।

यह कहानी पुरानी है। साठ के दशक में जब कश्मीर के मसले पर सरदार स्वर्ण सिंह की भुट्टो से लंबी वार्ताओं का दौर शुरू हुआ तो ये एक और बेमेल जोड़ी थी। एक उच्चवर्गीय अंग्रेजीदां तो दूसरा धरती पकड़ पंजाबी राजनेता। एक शायद उपमहाद्वीप का सबसे अमीर सामंत तो दूसरा कस्बाई जमीनी राजनीति की उपज। ये एक और ऐसा दौर था, जब पाक खुद को ‘विजयी’ अनुभव कर रहा था। चीन युद्ध के बाद भारत ढहती अर्थव्यवस्था और खाद्य संकट से जूझ रहा था।

भुट्टो यह शिकायत करते कभी नहीं थकते थे कि वे स्वर्ण सिंह से कितने तंग आ चुके हैं और इसकी वजह न केवल उनकी सुस्त रणनीतियां थीं, बल्कि उनका अंग्रेजी बोलने का लहजा भी था। हर बार जब भुट्टो (जो बेहतरीन वकील भी थे) को लगता कि उन्होंने कश्मीर मसले का हल खोज निकाला है तभी पंजाबी लहजे वाली अंग्रेजी में स्वर्ण सिंह की ठंडी प्रतिक्रिया आती: ‘तो क्या किया जाए, भारत एक सेकुलियर मुल्क है’। या यह कि ‘मसला अब सकुर्टी कौंसिल के पाले में है।’ भुट्टो और उनके साथी भले ही स्वर्ण सिंह की पीठ पीछे उनकी खिल्ली उड़ाते हों, लेकिन हकीकत यह है कि स्वर्ण सिंह एक बेहतरीन वार्ताकार थे। वे अच्छी तरह जानते थे कि क्या कहना है और भारत के मुश्किल दौर में होने के बावजूद उन्होंने कुछ भी हाथ से जाने नहीं दिया।

अगर इंदिरा गांधी और जुल्फिकार अली भुट्टो के बीच हुई शिमला वार्ता, इस्लामाबाद में उनकी संतानों राजीव गांधी और बेनजीर भुट्टो के बीच हुई वार्ता और 1989 की गुजराल-साहिबजादा याकूब खान वार्ता को छोड़ दें तो बातचीत का यह बेमेलपन तभी से बरकरार रहा है। मुशर्रफ आगरा आए तो उन्हें हिदायत दी गई थी कि अटलजी सोचने में काफी समय लेते हैं, लिहाजा उन्हें भी धीरज रखना होगा। तब भी पाक के अंग्रेजीदां सामाजिक वर्ग का हिकारत भरा लहजा जाहिर हुआ था।

कुछ साल बाद जब अटलजी प्रधानमंत्री नहीं रहे, तब उन्होंने एक बातचीत में मुझे बताया था कि मुशर्रफ के दंभ भरे ‘वाहियात’ लहजे से वे कितने परेशान रहा करते थे। उन्होंने बताया, ‘मुशर्रफ अपनी पॉकेट से किसी संयुक्त घोषणापत्र का नया मसौदा निकालते, बातचीत के दौरान ही उसमें कुछ बदलाव करते और कहते, ओके, हमें मंजूर है, चलिए दस्तखत कर देते हैं। मैं कहता, अरे भाई जनरल साहिब, मेरी एक कैबिनेट है, मुझे अपने साथियों से मशविरा तो लेने दीजिए। मुशर्रफ कहते, मैं राष्ट्रपति हूं, आप प्रधानमंत्री हैं, फिर किसी और से पूछने की क्या जरूरत?’ वो एक और ऐसा दौर था, जब पाकिस्तान को लगा था कि वह ‘जीत’ रहा है। पाकिस्तान का सोचना था कि लगातार हो रहे फिदायीन हमलों से भारत इतना आजिज आ चुका है कि वह अमन के लिए हाथ बढ़ा रहा है। आगरा में मुशर्रफ ने शांति प्रक्रिया को उसी तरह कुचल डाला, जैसे इस दफे कुरैशी ने इस्लामाबाद में किया है।

भारत और पाकिस्तान दोनों को ही अपने-अपने सबक सीखने होंगे। भारत के कूटनीतिक और आंतरिक सुरक्षा तंत्रों को एकजुट होकर काम करना सीखना होगा, क्योंकि अतीत में ऐसा कभी नहीं हुआ है। विदेश नीति और खासतौर पर पाकिस्तान से जुड़े मसले पर अभी तक केवल विदेश मंत्रालय के बाद रक्षा मंत्रालय को ही अहम माना जाता था, लेकिन अब गृह मंत्रालय मुख्य भूमिका में आ गया है। नॉर्थ और साउथ ब्लॉक के बीच पुल बनाने की भी दरकार है। जहां तक पाकिस्तान का सवाल है तो उसे अपने पुराने सबक ही दोहराने होंगे, लेकिन लगता नहीं कि वह उनसे कुछ सीखेगा।

मैंने पहले भी कहा था कि पाकिस्तान की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि उसकी रणनीतियां अकसर बेहतरीन रणनीतिकारों द्वारा बनाई जाती है, लिहाजा वह छोटी-मोटी लड़ाइयां तो जीत लेता है, लेकिन बड़ी जंग हार जाता है। विलायत में पढ़े-लिखे अपने सियासतदानों-कूटनीतिज्ञों की होशियारी और फौज के चौकन्नेपन के बावजूद वह तकरीबन अपनी आधी आबादी और आधे इलाके को गंवा चुका है। 1948 के सीजफायर के वक्त उसके पास कश्मीर का जितना हिस्सा था, आज उससे भी कम है। गर्वीला इस्लामी गणतंत्र अब दुनिया भर के लिए सिरदर्द की तरह देखा जा रहा है। चूंकि लगता नहीं कि पाक सत्तातंत्र के मूल स्वभाव में जल्द ही कोई बदलाव होगा, लिहाजा कुरैशी के अतिनाटकीय टीवी बयानों को तवज्जो न दी जाए। गौर केवल इस पर करें कि कयानी के कार्यकाल में तीन साल का और इजाफा हो गया है।


लेखक द इंडियन एक्सप्रेस के एडिटर-इन-चीफ हैं

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