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25 साल। 1984 से शुरू हुए इन पच्चीस सालों में पूरी एक शताब्दी, 20 वीं का अंत हुआ है औऱ एक नई शताब्दी का आगाज हुआ। दुनिया के इतिहास में जब इन 25 सालों का जिक्र होगा तो इसमें यकीनन बहुत सारी बातें होंगी। कुछ सफेद-कुछ काली। मगर इनमें सबसे स्याह लफ्जों में होगी भोपाल की कहानी। दुनिया की सबसे विकराल मानवीय त्रासदी की कहानी-1984 की कहानी। एक रात की कहानी। 2-3 दिसंबर की आधी रात की कहानी। जिस रात में अपने-अपने घरों में सोए हजारों बेगुनाए लोगों को बहुराष्ट्रीय कंपनी यूनियन कार्बाइड ने जहर सुंघाकर मार डाला गया औऱ लाखों लोगों को धीमे जहर की सजा दे डाली गई।
 
दो दिसंबर की उस सर्द रात को घड़ी का कांटा तीन दिसंबर की तरफ ले जाने को अपनी पूरे रफ्तार से घूम रहा था। इतवार की छुट्टी मनाकर अपनी-अपनी रजाइयों में दुबके कल के सपने देख रहे थे। इनमें से किसी को इस बात का गुमान भी न था कि बहुराष्ट्रीय अमरीकी कंपनी यूनियन कार्बाइड ने उस दिन मौत को भोपाल में आने की दावत दे रखी थी। मैं भी उस रात सबकी तरह बेखबर था। रात में कोई एक-डेढ़ बजे अचानक गले में कांटा सा चुभने लगा। नींद के आगोश में भी बेचैनी बढ़ने लगी। गले में फंसा कांटा एक ठंडी लकीर बनकर ऊपर उठने लगा। ऐसा लगा मानो सब कुछ खत्म हो रहा है। पास ही लेटी पत्नी की लगातार खांसी की आवाज से उठ बैठा। उसका दम घुट रहा था। मैं डर गया। कुछ समझ नहीं आ रहा था कि हुआ क्या है। तभी अहसास हुआ कि नीचे गली में कुछ हलचल है। भागकर खिड़की से झांका तो मोहल्ले के लोग खांसते-खूंसते अपने मुंह को किसी कपड़े से ढ़के हुए चले जा रहे हैं। इस मंजर ने अचानक मेरे अंदर एक मनहूस आशंका को जगा दिया। जिसके बारे में मैं पिछले दो साल से लगातार अखबारों के जरिए सबको चेताने की कोशिश कर रहा था। पहले अपने छोटे से साप्ताहिक 'रपट' के जरिए और फिर दिल्ली के 'जनसत्ता' के जरिए। भोपाल ज्वालामुखी के मुहाने बैठा है। थोड़ा होश संभालकर फोन की तरफ दौड़ा। पुलिस कंट्रोल रूम का नंबर 100 घुमाया। घंटी बजी और कुछ सेकंड में ही फोन उठ गया। फोन उठाने वाला भी सबकी तरह खांस रहा था। मैंने लगभग चीखते हुए पूछा, 'क्या हुआ है शहर में?। उधर से वैसी ही उखड़ी हुई आवाज में जवाब मिला साहब, यूनियन कार्बाईड का जहरीला टैंक फट गया है'। और लगभग निराश और रूआंसी आवाज में उसके अंतिम शब्द थे 'दम घुट रहा है'। तो आखिर ऐसा हो ही गया। अपनी असफलतता और बेबसी पर रोने के अलावा अब चारा क्या था। नजर के सामने सिवाय मौत के कुछ नजर नहीं आता था। औरों से कुछ ज्यादा। ज्यादा इसलिए कि मैं कार्बाइड में जमा जहरीली गैस (मिथाईल आयसोसाईनेट) और फाग्जीन के असर के बारे में, औरों से कुछ ज्यादा जानता था। आखिर पिछले तीन साल से इस पर काम कर रहा था। दिसंबर 1981 में कार्बाइड में काम करने वाले मित्र मोहम्मद अशरफ की मौत ने मुझे जबर्दस्त झटका दिया। कारखाने में काम करते हुए 24 दिसंबर की रात फाग्जीन गैस के संपर्क में आने के नतीजे में उसकी मौत हुई थई। मैने तय कर लिया कि एक पत्रकार के नाते मेरी यह जिम्मेदारी बनती है कि मैं इस मामले की तहकीकात करूं।
 

Comments

  1. यह एक ऐसा दर्द है जो कभी भी हल्का न होगा...
    हमेशा इन आँखों से आंसू रिश्ते रहेंगे............!!

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--- संजय सेन सागर

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