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लो क सं घ र्ष !: कुत्ता


मुझे जानवरों का कोई शौक नहीं है और न ही जानवरों में कोई दिलचस्पी। वे इसलिए कि जानवर पालने के लिए जानवर बनना जरूरी है, चाहे वह थोड़ी ही देर के लिए। यह जरूर है कि जानवरों से पैदा होने वाली चीज़ का इस्तेमाल करता हूं। जानवरों से एक सीख जरूर मिली है कि एक जानवर दूसरे जानवर को कभी कुछ देता नहीं है, शायद इसीलिए मैथिली शरण गुप्त ने लिखा हैः

यही पशु प्रवृत्ति है कि आप-आप ही चरे,
मनुष्य
है वही जो मनुष्य के लिए मरे।

आज अगर मैथिलीशरण गुप्त जीवित होते तो हर पल जीवित रहते हुए मरते रहते, वो इसलिए कि मनुष्य ने भी पशुता को चरितार्थ कर लिया है। एक मनुष्य दूसरे मनुष्य को खाते हुए नहीं देख पाता अच्छा खाना देखकर चाहता है कि सामने वाले का खाना ऐन केन प्रकारेण उसकी प्लेट में आ जाए। बिना परिश्रम के वह धनवान बन जाए। अपनी सेवा के लिए सेवक भी रखे और सेवा के बदले सेवक को कुछ न देना पड़े तो फिर कहना क्या।
लगता है कि विषय से भटक गया हूं मैं। लिखने बैठा कुत्ते के विषय में और लिख डाला पशु और मनुष्य के विषय में और शायद मैंने ऐसा इसलिए किया कि अपन आदत के अनुसार मैंने कभी कुत्ता भी नहीं पाला। हां, मैं अपने बड़े भाई के साथ जब रहता था तो उन्होंने जरूर एक बार कुतिया पाली थी। कुत्तों के विषय में जानकारी न रखते हुए भी मैंने विषय कुत्ता चुना और इसीलिए इस विषय पर बहुत ज्यादा लिख नहीं पाऊंगा, फिर भी जितना ज्ञान है उसको यहां उड़ेलने की कोशिश में हूं।
मैं गांव में पैदा हुआ पला-बढ़ा, इसलिए गांव की गलियों में घूमने वाले कुत्तों की जानकारी जरूर रखता हूं। मेरे गांव में एक डूंडा कुत्ता रहता था लेकिन था बहुत तेज। उसका उसके क्षेत्र में इतना आतंक था कि बच्चे हाथ में रोटी लेकर बाहर नहीं निकलते थे, बड़े खुले में बैठकर खाना नहीं खा सकते थे, वो इसलिए कि वह झपट कर लोगों से खाना छीन लेता था। ऐसे भी कुत्ते थे जो आदमियों से डरे सहमे रहते, एक बार एक डण्डा पटकने से भाग खड़े होते और अपने से मजबूत कुत्ते को देखकर दुम दबाकर दांत निपोर देते थे। अगर अपने से मजबूत कुत्ता उनकी तरफ झपटा तो झपटने वाले कुत्ते की मंशा भांप कर ही वो लेट जाते। अब देखिए अपना समाज, क्या अपना समाज इन कुत्तों के समाज से भिन्न है। मनुष्य समाज भी अपने से कमजोर को दबाकर रखता है। कोशिश करता है कि उसका हिस्सा भी खुद खा जाए और दूसरा समाज जो उससे डरता है उसी कमजोर और डरपोक कुत्ते की तरह अपने से मजबूत के सामने दांत निपोरता रहता है। उसका जूठन पाने के लिए झूठी तारीफें करता और क्रोध की मुद्रा में आने पर उस मुद्रा को भांपने के बाद चित पड़ जाता है।
गांव से निकलकर कस्बे में आया। मैंने अपने बड़े भाई को देखा उन्होंने कुतिया पाल रखी थी और लोगों को बड़े गर्व से बताते थे कि ये कोई मामूली नस्ल की नहीं है और पहली बार उनकी ही जबान से सुना कि वह अलसीशियन नस्ल की है, भेड़िये की नस्ल से मिलती-जुलती। बड़े भाई का शौक देखकर उनके कहते रहने से मुझे भी उस कुतिया का ध्यान रखना पड़ता था। उसके लिए रातिब का इंतजाम करना पड़ता था, दूध और रोटी तो रोज ही खिलाया जाता। जब तक वो कुतिया नहीं थी मेरे भतीजों के लिए घर में दूध खरीदकर आता था, लेकिन कुतिया पालने से अपने को प्रतिष्ठित होने के एहसास से घर में एक गाय भी पाल ली गई। मैं आज भी सोचता हूं कि गाय पालनी थी तो अपने और बच्चों के लिए क्यों नहीं पाली गई और पाली गई भी तो कुतिया के लिए। उस वक्त भी मेरे अन्दर कुतिया से छोटे होने का एहसास जागा था, लेकिन वो एहसास मन्द पड़ जाता था, जब सोचता था कि शायद वो शिकार में कुछ मददगार साबित हो। कभी-कभी मैं उस कुतिया को लेकर नदी की तरफ चला जाता था, जहां झाड़ी में बहुत सारे छोटे-छोटे जानवर रहते थे और मैं उस कुतिया से उम्मीद रखता था कि वह उन छोटे जानवरों को पकड़ लेगी, लेकिन मुहावरा गलत नहीं है, शिकार के वक्त कुतिया ...........................। कुतिया को शिकार की तरफ ललकारने के लिए हमेशा मैं उससे आगे रहा और वो कभी पुचकारने पर भी मुझसे आगे नहीं हो सकी, इस लिए इस मुहावरे को मैंने तजुर्बे के बाद कहा गया मुहावरा समझा।
एक आदत मैंने और देखी कुत्तों में कि अगर आप एक हड्डी फेंकिये तो कोई कुत्ता अपने सामने वाले कुत्ते को उस हड्डी तक नहीं पहुंचने देना चाहता। इसीलिए शायद यह मुहावरा भी कहा गया - कुत्ते के सामने हड्डी डालना। इस मुहावरे का इस्तेमाल समर्थ लोग खूब करते हैं। हड्डी डालकर लड़ाते और तमाशा देखते हैं और जब लोगों की नजर हड्डी पर होती है तब हड्डी डालने वाला अपने लिए मांस के प्रबंध में लग जाता है। मांस खाता है और हड्डी के लिए लड़ाता है।
कहा जाता है कि कुत्ता एक वफादार जानवर है और अपने मालिक से वफादारी करने में अपनी जान तक की बाजी लगा देता है। समझदार लोग कुत्ते की वफादारी की जानकारी रखने के कारण कुत्ता पालते हैं, उन्हें दूध और मांस खिलाते हैं। यही सब देखकर पं0 सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ के कलम से स्वर फूटे:

श्वानों को मिलता दूध-वस्त्र, भूखे बालक अकुलाते हैं,
मां की छाती से चिपक, ठिठुर जाड़े की रात बिताते हैं।

यह श्वानों को जो दूध-वस्त्र मिलता है वह उनकी हैसियत बढ़ाने या उनकी भूख ठीक से मिटाने के लिए मानवतावादी दृष्टिकोण से नहीं होता। उन्हें दूध-वस्त्र मिलता है उनकी सेवाओं के बदले। अक्सर बात चली है कि अमुक घर में ऐसे मोटे और तन्दुरूस्त कुत्ते हैं जो किसी को फाटक से अन्दर नहीं जाने देते। अगर कोई हिम्मत करके आना भी चाहे तो उसकी बोटियां नोच डालते हैं और इस प्रकार उनके घर में कुत्ते रहने से वो और उनका घर सुरक्षित रहता है। इसके अतिरिक्त कुछ ऐसी नस्ल के कुत्ते हैं जो देखने में सुन्दर लगते हैं और उनकी सुन्दरता इतनी अधिक होती है कि कहीं-कहीं उन कुत्तों के मुकाबले उनके बच्चे नहीं आकर्षक लगते। इसी कारण ऐसे लोगों की गोद में उनके बच्चों की जगह ये कुत्ते पाये जाते हैं। इतना सब होते हुए भी कोई व्यक्ति अपने को कुत्ता कहलवाना नहीं पसंद करता। वह चाहे जिस कुत्ते के चरित्र का हो, अगर कोई उसे कुत्ता कह दे तो कुत्ते की तरह उसका मुंह नोंच लेता है।

हम मनुष्य हैं, मनुष्य रहें, मानवता के लिए अपने को समर्पित कर दें, स्वयं में मानवता लायें, कुत्ते के चरित्र से अपने को दूर रखें तो यह मानव समाज, मानव समाज बन जाएगा और इस समाज को हम कुत्ता समाज से अलग कर सकेगें। इसलिए हम अपने लिए जब कुत्ता शब्द उचित नहीं समझते तो आवश्यक है कि कुत्ता चरित्र छोड़कर मानव चरित्र अपनायें। बस इतने मात्र के लिए मैंने आज कुत्ता विषय पर कुछ पंक्तियां लिख डालीं।

-मोहम्मद शुऐब एडवोकेट

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