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यौनाचार के दलदल में कैथोलिक चर्च

>आर एल फ्रांसिस
पुअर क्रिश्चियन लिबरेशन मुवमेन्ट के अध्यक्ष आर एल फ्रांसिस ईसाई मिशनरियों के बीच व्याप्त भेदभाव और कटुता के खिलाफ लगातार अपनी आवाज बुलंद किये हुए हैं. आप उन्हें pclmfrancis@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं


आयरिश बिशपों के एक प्रतिनिधिमंडल ने पोप बेनेडिक्ट (सोलहवें) से मंगलवार को वेटिकन में ‘बच्चों के यौन शोषण’ के मुद्दों पर चर्चा की। अमेरिका के बाद आयरलैंड में कैथोलिक चर्च को यह दूसरा सबसे बड़ा झटका है। अमेरिका की तरह आयरलैंड के चर्च विश्वासी ‘पोप’ के प्रतिनिधि बिशपों एवं पादरियों को न्यायालय में घसीट रहे है। पीड़ित परिवार मुआवजे के रुप में 1.37 अरब डालर की मांग कर रहे है। वही दूसरी और पादरियों द्वारा पीड़ित लोग वेटिकन से उन गुप्त फाइलों को सर्वाजिनक किये जाने की मांग कर रहे है जिनमें रोमन कैथोलिक चर्च में यौन दुर्व्यवहार की अदरुनी जांच का ब्यौरा है।

पीड़ित परिवारों ने आरोप लगाया है कि सत्य को छुपाने, दबाने और बच्चों को बचाने के बजाए अपनी प्रतिष्ठा बचाने में वेटिकन और शीर्ष अधिकारियों का लम्बा इतिहास रहा है। पीड़ित लोगों द्वारा दायर मामले में वेटिकन से हर उस पादरी, हर उस बिषप और कार्डिनल को हटाने की मांग की गई है जिसने किसी भी बच्चे के साथ अपराध किया हो, अपराध को जटिल बनाया हो। अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट में लम्बित यह मामला दो कारणों से बहूत महत्वपूर्ण है पहला, क्योंकि कोर्ट यह निर्धारण करेगा कि संप्रभु छूट का दावा करने वाले वेटिकन पर क्या अमेरिकी अदालत में मुकदमा चलाया जा सकता है या नही। दूसरा, पीड़ितों ने कुछ ऐसे दस्तावेज जारी किये है जिनमें कहा गया है कि पोप बेनेडिक्ट सोलहवें और उस समय के कार्डिनल जोसेफ रेटजिंगर को अपराधी पादरियों के बारे में बार-बार बताने के बावजूद उन्होंने अपराधी चर्च अधिकारियों का साथ दिया और उनके विरुद्ध कोई कार्यवाही नही की।

ऐसी घटनाओं के मीडिया में आने के कारण कैथोलिक धर्मासन पर विराजमान लोग गहन चिंतन में पड़े हुए हैं। उनकी चिंता का मुख्य कारण है वर्तमान चर्च के ‘पुरोहितों में व्याप्त यौनाचार’। पुरोहितों में यौन कुंठाओं के पनपते रहने से वे मानसिक रुप से चर्च की अनिवार्य सेवाओं से मुंह मोड़ने लगे हैं। इस का असर कैथोलिक विष्वासियों में बढ़ते आक्रोष के रुप में देखा जा सकता है। विष्वासियों द्वारा चर्च की मर्यादाओं को बरकरार रखने की मांग बढ़ती जा रही है और इस आंदोलन ने अंतरराष्ट्रीय स्वरूप हासिल कर लिया है। इस आंदोलन में कैथोलिक युवा वर्ग अग्रणी भूमिका निभा रहा है। भारत के कैथोलिक पुरोहितों को इस आंदोलन से फिलहाल कोई खतरा नहीं है क्योंकि यहां का अधिकांश कैथोलिक समुदाय इतना दरिद्र एवं दबा हुआ है कि उसे यह सब समझने-समझाने की फुर्सत कहां। यहां जो भी ‘सुधारवादी आवाज’ उठाई जाती है, उसे बढ़ी कुटिलता से दबा दिया जाता है, क्योंकि एक तो बिशपों एवं पुरोहितों के पास गुलामों की संगठित फौज है दूसरा यहां कि तमाम बड़ी राजनीतिक पार्टियां एवं सत्ता का सहयोग इन्हें प्राप्त है।

अमेरिका के रोमन कैथोलिक चर्च के छह करोड़ तीस लाख अनुयायी हैं अर्थात अमेरिका की कुल जनसंख्या का एक चौथाई भाग कैथोलिक अनुयायियों का है, साथ ही यहां के बिशपों एवं कार्डीनलों का वेटिकन (पोप) पर सबसे अधिक प्रभाव है। जब कभी नए पोप का चुनाव होता है, तो यहां के कार्डीनलों के प्रभाव को साफ देखा जा सकता है। यहां के कैथोलिक विष्वासी चर्च अधिकारियों की कारगुजारियों के प्रति अधिक सचेत रहते हैं ‘‘वर्तमान समय में विष्वभर के कैथोलिक धर्माधिकारियों, पुरोहितों तथा सबंधित लोगों में तीन ‘डब्ल्यू’ का बोलबाला हैं अर्थात वैल्थ, वाइन एंड वूमेन। इस प्रकार का अनाचार कैथोलिक चर्च के अंदर लगातार घर कर रहा है।’’
अमेरिका के वोस्टन में कई चर्चों के पादरियों पर वहां की अदालतों में मुकदमें चले एवं कैथोलिक चर्च द्वारा कानूनी लड़ाई हारने के बाद भुगत-भोगियों को मुआवजा देना पड़ रहा है। वहां के विष्वासी अदालतों में यौनाचारी पुरोहितों को घसीट रहे है। कैथोलिक चर्च द्वारा ऐसे अपराधियों को संरक्षण देने, बचाने तथा उनकी काली करतूतों पर पर्दा डालने से वहां के मसीही विश्वासियों में भारी असंतोष है। उनका कहना है कि ‘यह हमारी आत्मा के साथ बलात्कार हैं’-‘यह हमारी आस्था के साथ धोखा है’-‘यह निर्बोधता की हत्या है।’
‘पाप’ में गले तक डूबे अपने प्रतिनिधियों को उबारने के लिए पोप बेनेडिक्ट (सोलहवें) ने दो वर्श पूर्व पापों की एक अधिकारिक सूची जारी की थी पापों की इस सात सूत्री सूची में ‘पर्यावरण को बिगाड़ना, जेनिटिक हेराफेरी, जरुरत से ज्यादा दौलत इक्कठा करना, गरीबी पैदा करना, नषे का धंधा करना या नशाखोरी, अनैतिक प्रयोग और मानवाधिकारों का हनन। लेकिन अफसोफ ‘दलदल’ में फसें पोप के अधिकतर प्रतिनिधि गर्त में धसतें जा रहे है। इसी के साथ आम विश्वासियों में यह धारण भी जोर पकड़ती जा रही है कि स्वर्गीय ‘पोप जॉन पाल द्वितीय ने जानबूझकर ‘पापाचार’ में लिप्त पादरियों के विरुद्ध आने वाली शिकायतों की जांच नही होने दी और चुप्पी साधे रखी। और वर्तमान पोप बेनेडिक्ट (सोलहवें) अपने पूर्व नाम कार्डिनल जोसेफ रेटजिंगर ने ऐसी शिकायतों को इस लिए रद्दी की टोकरी में फेंक दिया कि इससे कैथोलिक चर्च के व्यापक हितों की हानि होगी। पापाचार को रोकने से अधिक वेटिकन के हित क्या हो सकते है? चर्च का मानना है कि पापकर्म से बाहर आने पर ही मानव की मुक्ति हो सकती है अगर चर्च के प्रचार का यही पहला सैद्धांतिक नियम है तो फिर उसे ऐसे ‘पापाचारी’ पादरियों को बाहर करने में परेशानी क्यों है? वेटिकन किन्हीं अन्य हितों की रक्षा के लिए इन ‘पापाचारियों’ को संरक्षण क्यों दे रहा है? और नये नये क्षेत्रों में अपना साम्राज्यवाद बढ़ाने में लगा है।

चर्च से पीड़ित अब खुलकर सामने आने लगे है उनके खुलकर सामने आने से यह साबित हो रहा है कि किशोरों के साथ अनैतिक कर्म में एकाध देश या दो चार पादरी ही सीमित नही है बल्कि अंधिकाश रोमन कैथोलिक चर्च इस में शामिल है। इसी कारण वेटिकन लम्बे समय से ऐसी शिकायतों को दबाने का कार्य करता रहा है। इस ‘पापाचार’ से अंदर तक हिल चुके वेटिकन के कुछ शीर्ष अधिकारी कैथोलिक पादरियों को ‘शादी’ की इजाजत दिये जाने के पक्ष में है। ब्रिटिश कैथोलिक चर्च के बिशप मैक्कम मैकमोहन ने कहा कि ‘पादरियों को शादी करने से रोकने का कोई वाजिब कारण नही है।’ मैकमोहन का नाम कार्डिनल ‘कार्मेक मर्फी ओकोनोर के उत्तराधिकारी के तौर पर चल रहा है। यहां यह तथ्य भी ज्ञातव्य है कि प्रभु यीशु ने कभी भी ब्रह्यचर्य का प्रचार नहीं किया-उन्होंने अपने संदेश वाहकों के रुप में जो शिष्य या अपोसल चुने थे वे प्रायः सभी विवाहित तथा बाल-बच्चों वाले थे। यदि प्रभु यीशु अपने अनुयायियों को ब्रह्यचारी बनाने की योजना बनाते तो वे अपने शिष्यों में शादी-शुदा, बाल-बच्चों वालों का चुनाव क्यों करते? वे मात्र कुंवारों और कुंवारियों को ही आमंत्रित करते। यीशु ने वास्तव में जिस ईश्वर सम्मत साम्यवादी क्रांति की शुरुआत की थी उसे चर्च ने साम्राराज्यवाद राज्यतंत्र और पूंजीवादी शोषण का पोषक बना दिया और उसी की सुरक्षा के लिए 11वीं सदी में ‘पोप ग्रेगरी सप्तम’ ने रोमन कैथोलिक पादरियों के लिए ब्रह्यचारी रहने यानी अजीवन कुंवारा रहना अनिवार्य कर दिया।

चारों ओर से सैक्स स्कैंडलों में घिरते वेटिकन ने अपने बचाव के लिए अमेरिका की यहूदी लाबी और इस्लामिक संगठनों को अपने निशाने पर ले लिया है। दूसरी और वेटिकन से न्याय की गुहार लगाने वाले लोग उस को संयुक्त राष्ट्र संघ में मिले ‘पर्यवेक्षक’ के दर्जे पर भी अंगुली उठाने लगे है। अब यह प्रश्न भी उठने लगा है कि वेटिकन एक राज्य है या केवल एक उपासना पंथ का मुख्यालय? क्यों पोप को एक धार्मिक नेता के साथ साथ राज्याध्यक्ष का दर्जा दिया जाता है? क्यों वेटिकन संयुक्त राष्ट्र संघ में पर्यवेक्षक है? क्यों वेटिकन को दूसरे देशों में अपने राजदूत नियुक्त करने का अधिकार मिला है? क्यों वेटिकन किसी भी देश के कानून से ऊपर है?

अब समय आ गया है कि वेटिकन को अपने साम्राज्यवाद को रोक कर आत्मशुद्धि की तरफ बढ़ना चाहिए। अतीत में की गई अपनी गलतियों को मानने हुए भविष्य में उसे न दोहराने का कार्य करना चाहिए। अपने को राज्य की बजाय धार्मिक मामलों तक सीमित रखना चाहिए। विश्व भर में फैले अपने विषाल संसाधनों से भरपूर संगठन तंत्र को बिना धर्म-परिवर्तन के मानव मुक्ति का रास्ता खोजने में लगाना चाहिए। वेटिकन को ईसा मसीह के यह शब्द याद रखने चाहिए - कि ‘‘तुम धरती के नमक हो, पर यदि नमक अपना स्वाद खो बैठे तो वह फिर किससे नमकीन किया जाएगा? वह किसी काम का नहीं रह जाएगा, केवल इसके लिए बाहर (घूरे पर) फैंका जाए और लोगों के पैरों तलें रौंदा जाए।’’

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