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जरूरी है आपसी संवाद

अंतरराष्ट्रीय सीमा और विद्वेष का लंबा इतिहास साझा करने वाले दो परमाणु ऊर्जा संपन्न पड़ोसी देश यदि अपने द्विपक्षीय रिश्तों के तकरीबन टूटने की हद तक पहुंचने की स्थिति में भी संतुष्ट बैठे हों तो इसका मतलब कोई गंभीर गड़बड़ी है। भारत-पाक के बीच यही हो रहा है क्योंकि दिल्ली में द्विपक्षीय बातचीत बहाल करने की कोशिशें नाकाम हो चुकी हैं। दोनों देश भले यह दिखाने की कोशिश कर रहे हों कि उन्हें यथास्थिति से फर्क नहीं पड़ता, पर सच यह है कि दोनों ऐसे हालात गवारा नहीं कर सकते।










पहले पाकिस्तान को लें। ऐसा लगता है कि इस्लामाबाद अपनी विदेश नीति में आए एक कठिन दौर से उबर चुका है। अमेरिका के साथ उसकी रणनीतिक बातचीत इस बात का संकेत है कि वैश्विक राजनीति में पाकिस्तान अचानक प्रासंगिक हो उठा है। जब से तालिबान और अन्य अफगानी लड़ाकों के साथ मेल-मिलाप का मुद्दा अफगानिस्तान की स्थिरता संबंधी विमर्श के केंद्र में आया है, अचानक इस समूचे खेल में पाकिस्तान की जबरदस्त वापसी हुई है। अकेले यही चीज पाकिस्तान के पक्ष में जाती है, हालांकि देश के सामने खड़ी तमाम चुनौतियों के संदर्भ में किसी भी लिहाज से यह अंतिम समाधान नहीं है।









अमेरिका द्वारा पाकिस्तान को तमाम वादे करके दोबारा लुभाने भर से रेंगती अर्थव्यवस्था और पूर्वी सीमाओं का संकट हल नहीं होने वाला। वास्तव में लगातार जारी आंतरिक असुरक्षा अमेरिका पर पाकिस्तान की निर्भरता बढ़ाएगी और अमेरिकी उदारता की वास्तविकता का परिचय कम-से-कम यहां देने की जरूरत तो नहीं लगती। अमेरिका यदि पाकिस्तान के साथ अपनी घोषित मित्रता को जारी रखता है तो यह उसकी तात्कालिक जरूरत है। ओबामा प्रशासन अफगानिस्तान से अपनी सेनाएं वापस बुलाने की 18 माह की अवधि से चूकना नहीं चाहता है। वॉशिंगटन चाहेगा कि वह अफगानिस्तान को इतना स्थिर कर दे कि वहां से सम्मानजनक वापसी कर सके, इससे पहले कि उसके पक्ष में बनी वैश्विक आम सहमति बिखर जाए।









यह सोच पाना मुश्किल है कि पाकिस्तान के साथ अमेरिकी संलग्नता उतनी ही तीव्र रहेगी, जैसी अभी दिख रही है। इसका अर्थ यह हुआ कि आने वाले दिनों में क्षेत्रीय राजनीति पाकिस्तान की चिंताओं के केंद्र में बनी रहेगी और पाकिस्तान की दिक्कतों को संतुलित करने के लिए हमेशा अमेरिका परिदृश्य में मौजूद नहीं रहेगा। अत: भारत से बातचीत बहुत जरूरी हो जाती है।









लेकिन बातचीत के नतीजे तभी आएंगे, जब भारत खुद इसमें दिलचस्पी ले। यह कहा जा सकता है कि भारत का नजरिया अब इतना बड़ा हो चुका है कि वह जमीनी सच्चइयों से अलहदा नजर आता है। भारत अब बड़ों की जमात में शामिल हो चुका है। वह दुनिया की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने की संभावना रखता है। जाहिर तौर पर पाकिस्तान की तुलना में भारत का वजन, इसके आकार व उपलब्धियों के लिहाज से बढ़ा है। इसके बावजूद याद रखना चाहिए कि भारत न तो अमेरिका है, और न पाकिस्तान नेपाल है।









भारत ने अभी-अभी यह अनुभव किया है कि कैसे दुनिया की राजनीति अचानक पाकिस्तानी कूटनीति के पक्ष में पलट गई है। बहुत दिन नहीं हुए, जब पाकिस्तान की हालत हुक्म बजाने वाले एक अदद कारिंदे से ज्यादा नहीं थी। अमेरिका लगातार उसे आतंकवाद के मोर्चे पर ‘और ज्यादा’ करने के लिए कहता था। मुंबई हमलों के मामले में तो उसे बाकायदा यह कहकर अग्निपरीक्षा देने के लिए बाध्य किया गया कि वह दिल्ली की चिंताओं को लेकर संवेदनहीन है। ब्रिटिश विदेश मंत्री डेविड मिलिबंड जब यहां आए तो उन्होंने लश्कर-ए-तैयबा के नेताओं पर मुकदमे तेज करने की जरूरत पर काफी भाषण दिया था ताकि भारत को शांत किया जा सके। अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन अपने हंसमुख स्वभाव के बावजूद विवादास्पद केरी-लूगर-बर्मान बिल के तहत पाकिस्तान को मिलने वाली अमेरिकी आर्थिक मदद के मसले पर काफी उखड़ी हुई थीं। उनका स्वर इतना तीखा था कि रिचर्ड होलब्रुक तक की आवाज मीठी लगने लगी।









इसी स्थिति का फायदा उठाकर भारत ने पाकिस्तान पर और दबाव बनाया। उसने ‘मुंबई जैसा कोई अन्य हमला होने की स्थिति में’ युद्ध, सुरक्षात्मक हमलों और अन्य दंडात्मक कार्रवाइयों की धमकी दे डाली। अब ऐसा संभव नहीं है। वॉशिंगटन में चल रही रणनीतिक बातचीत से जैसी खबरें आ रही हैं, पाकिस्तान आज पहले से कहीं बेहतर स्थिति में है। फता और स्वात में आतंकवादियों के खिलाफ उसकी कार्रवाई की प्रशंसा हो रही है। सरकारी गलियारों में घूमने वाले अफगान तालिबान के प्रति पाकिस्तान की नीति में बदलाव की बात कह रहे हैं।









इसका अर्थ यह है कि कश्मीर पर पाकिस्तान की चिंताओं और भारत के साथ समग्र बातचीत बहाल करने के उसके आग्रह को आज दुनिया में पहले से कहीं ज्यादा सुना जाएगा। अफगानिस्तान के दक्षिण और पूर्वी हिस्से में उसका प्रभाव बढ़ेगा, जिससे वह अफगानिस्तान की सुरक्षा चिंताओं को भी संबोधित कर सकेगा। आज पाकिस्तान दो मोर्चो पर दबाव की स्थिति से उबर चुका है। उसे अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक व वित्तीय समर्थन हासिल है। इसके बल पर वह भारत के साथ अपने पत्ते और खुलकर खेल सकता है। पिछले आठ महीनों में पाकिस्तान जिन बदतर हालात से गुजरा है, उससे बुरे की आशंका अब बेमानी है। यदि तब वह वैश्विक दबावों को झेल गया था तो भविष्य में भी वह ऐसा कर पाएगा।









बेहतर होगा कि भारत और पाकिस्तान कुछ ऐसी व्यवस्था करें, जो इन दोनों के पक्ष में हो। दिल्ली-इस्लामाबाद-काबुल व्यापार मार्ग के माध्यम से मध्य एशिया को यूरोप से जोड़ने का मसला इसमें कारगर हो सकता है। इन बाजारों और तटों तक भारत की पहुंच ईरान के तटों और अफगानिस्तान की सड़कों के घुमावदार मार्ग के मुकाबले वाया पाकिस्तान कहीं ज्यादा आसान है।









यहां तक कि कश्मीर पर भी मुशर्रफ के दौर में जो कूटनीतिक काम किया गया था, वह पूरी तरह बेकार नहीं हुआ है। उसे ठीक किया जा सकता है। जहां तक आतंकवाद की बात है तो बातचीत द्विपक्षीय चिंताओं से निपटने का कारगर तरीका है। यदि भारत को यह अपर्याप्त लगता हो तो इसमें बदलाव किए जा सकते हैं। इस मुद्दे को कश्मीर से बिल्कुल अलग किया जा सकता है और संवाद के दो रास्ते समग्र वार्ता प्रणाली में जोड़े जा सकते हैं। इस तरह समूची वार्ता प्रणाली को विस्तारित करते हुए इसका नाम भी बदला जा सकता है। इसे हम पाकिस्तान-भारत रणनीतिक संवाद या ऐसा ही कोई नाम दे सकते हैं।









बात न करना कोई विकल्प नहीं है। इस जिद पर अड़े रहना कि संवादहीनता ही सर्वश्रेष्ठ विकल्प है, दरअसल तार्किकता और जमीनी सच्चई को झुठलाना है। यह तो भारतीय और पाकिस्तानी दोनों ही सभ्यताओं के लिए शर्म की बात है कि इनकी सरकारों का दिमाग और अधिकारियों का मुंह तभी खुलता है, जब अमेरिका से इन्हें पर्याप्त आंच मिलने लगती है। ऐसा लगता है कि 63 वर्ष पुरानी आजादी अब तक इन दोनों देशों को स्वतंत्र निर्णय और पहल का मूल्य नहीं सिखा सकी है, आजादी और संप्रभुता की क्या कहें।

लेखक पाकिस्तानी चैनल ‘आज टेलीविजन’ के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर हैं।


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