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"उथले हैं वे जो कहते हैं"


किसी भी साहित्यिक रचना या रचना संग्रह को इमानदारी से पढने वाला पाठक अगर मिल जाता है और वो उस रचना पर अपनी राय भी व्यक्त कर देता है तो यह सोने पे सुहागा हो जाता है। उस संग्रह को फिर किसी दूजे पुरस्कार आदि की आवश्यकता ही नहीं होती। मेरे पूज्य पिताजी डॉ. जे पी श्रीवास्तव के काव्य खंड " रागाकाश" के प्रकाशन के लिये जब इस पर मैं वर्क कर रहा था तो कई सारी कठिनाइयां आ रही थीं। पहली तो यही थी कि मैं बगैर पिताजी की आज्ञा के उनकी धरोहर को छापना चाह रहा था। उनकी अपने दौर में लिखी गई कई सारी रचनायें, जिसमें कइयों के कागज़ भी पुराने होकर फटने लगे थे को सहेज कर मुम्बई तो ले आया था अब बस पिताजी की आज्ञा की देर थी। पहले जब उनका साहित्ययुग पूरे उफान पर था, देश-विदेश के बडे से बडे साहित्यकार आदि से मेल मिलाप था, तब परिवारिक परिस्तिथियों ने उनके किसी भी तरह के प्रकाशन सम्बन्धित कार्य को नहीं होने दिया। और जब परिस्थितयां सुधरी तो काफी देर हो चुकी थी, पूरा का पूरा युग मानों बदल गया था, फिर भी उनका लेखन सतत जारी रहा, आज भी पठन-पाठन वैसा ही है जैसा पहले था किंतु लेखन अब ज्यादा नहीं होता। इस दौर में किसी प्रकाशन के प्रति भी उनका रुख उदासीन रहा। फिर भी मेरा प्रयास जारी था, उधर मेरे बडे भाई ने ढांढस बन्धाया कि अभी काम पे लग जाओ बाद में अपनी मंशा पिताजी को बतायेंगे, कुछ हो न हो कम से कम रचनायें व्यवस्थित तो हो जायेंगी। हमारे लिये यही जरूरी था। सो टाइप और इसकी साज सज्जा मैने अपने कमप्युटर पर दिन रात बैठ कर तैयार कर ली। अब? यदि पुस्तक का रूप देना है तो खास समस्या थी प्रकाशक की। दरअसल मेरे पास एक साहित्यक निधि थी, साहित्य के रसिकों के लिये बेहद उपयुक्त व विशुद्ध धरोहर थी सो चाहता था कि अच्छा प्रकाशक मिले। किंतु इस 'बाज़ार' में प्रकाशकों की शर्तों व आनाकानी का जो सीधा अनुभव मैने किया वो संस्मरण योग्य है। खैर..अगर बेहतर सामग्री हो तो उसे बेहतर कलेवर देना ही आवश्यक होता है जिसमे मैं कोई समझौता नहीं करना चाहता था। लिहाज़ा एक प्रकाशक की भूमिका अख्तियातर करने की मानसिकता लिये मैं छापाखानों पर भटकने लगा। कई जगह अलग अलग लागत निकालता रहा और अंत में तय किया कि अब हो न हो अपना प्रकाशन शुरू कर इस दस्तावेज को पुस्तकाकार देना ही है। चाहे जितना पैसा लगे। सो पुस्तक छपने डाल दी। अब सामने था पिताजी को बताना और बाद में विमोचन या लोकार्पण ताकि साहित्य को उसका पूरा पूरा सम्मान मिल सके। कहते हैं न यदि आप अपने कार्य के प्रति इमानदार हों और वो सदमार्गीय हो तो ईश्वर रास्ते निकालते जाता है। रास्ते निकले। पिताजी माने। बडे भाई की मेहनत रंग लाई। फिर तो बाद में आचार्य राममूर्ति त्रिपाठी जी जैसे महान साहित्यकार की अद्वितीय कलम ने 'पुरोवाक' लिखा। "रागाकाश" छपकर आई। विमोचन भी बडे साहित्यकारों की संगत में हुआ। समीक्षायें हुई। किसी ने कहा कि ऐन समारोह पर किताब को डिसकाउंट में बेचा जा सकता है। काफी बिक सकती है। किंतु पिताजी ने साफ इंकार कर दिया। हम भाई भी इस मूड में नहीं थे कि किताब बेचें। साहित्यकार, इसके रसिक परिचितों, मित्रों के साथ साथ देश की कई पत्रिकाओं-समाचार पत्रों में 'रागाकाश' प्रेषित की गई। कुछ ने समीक्षा की, कुछ पचा गये। परिचितों, मित्रो आदि में से किसने कितना लाभ लिया यह उनका अनुभव होगा। किंतु जिस प्रयास की शुरुआत मैने की थी वो 2008 के अप्रैल महीने में सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। किताब के बारे में राय आती रही यानी उसकी सार्थकता सिद्ध होती रही। यह नहीं पता था, और न ही इसका कोई प्रयास था कि किसी प्रकार के पुरस्कार के लिये कोई अतिरिक्त उपक्रम किया जाये। वैसे भी पिताजी को पुरस्कार आदि का कभी मोह नहीं रहा, और मैने भी ज्यादा यही सोचा कि 'रागाकाश" पठनप्रेमियों तक ज्यादा से ज्यादा पहुंचे। लिहाज़ा सम्मान या पुरस्कार आदि के सन्दर्भ में कभी हमने सोचा ही नहीं था। पिताजी का मानना रहा है कि- होई वही जो राम रची राखा। सो दो वर्ष बीत जाने के बाद अचानक अखिल भारतीय साहित्य परिषद, जयपुर राजस्थान की ओर से स्व.सेठ घनश्यामदास बंसल स्मृति 2009-10 का पुरस्कार काव्य संग्रह " रागाकाश" को प्राप्त हुआ है, कि खबर डाक द्वारा आई। श्री नरेन्द्र शर्मा, डॉ. आनंद मंगल वाजपेयी, डॉ. त्रिभुवन राय और डॉ. सूर्य प्रसाद दीक्षित के सूक्ष्म परिक्षण के बाद तय हुआ रागाकाश को पुरस्कृत करना। इस पुरस्कार से और कुछ हो न हो किंतु यह जरूर ज्ञात होता है कि आज भी बेहतर साहित्य को पूछने-परखने वाले लोग हैं और यथासम्भव उनकी वजह से ही भारत में साहित्य जिन्दा है। क्योंकि साहित्य के जिन्दा रहने के लिये सुधी पाठकों की आवश्यकता होती है। बहरहाल, यह भी एक अनुभव रहा था मेरा जिसने सिखाया कि कार्य इमानदारी से करो, प्रतिफल जो भी हो जैसा भी हो, अच्छा ही होता है। इसी सम्बल से फिलवक़्त उनके एक निबन्ध संग्रह के कार्य में भी रत हूं। देखता हूं कब वो पुस्तक का आकार लेता है? अच्छे प्रकाशक की तलाश तब भी रहेगी ही। और न मिलेगा तो अपना दम है ही।
अब 'रागाकाश' के दूसरे खंड 'रागानुगा" की एक रचना भी चलते चलते आपको नज़र करता हूं, यह मुझे बहुत पसन्द है, शायद आपको भी पसन्द आयेगी-

" उथले हैं वे जो कहते हैं
वर्ना दुख तो सब सहते हैं
किसको है मिल गया किनारा
सब धारा ही में बहते हैं।

सूखेगा जो हरा बना है
टूटेगा जो अभी तना है
कोई काम नहीं आता है
बडबोलापन यहां मना है।

सृष्टि किसी की नहीं, यहां सब
नश्वर है, टिकता है क्या कब?
जाने किसके हाथ डोर है
दिखा रहा प्रतिक्षण नव करतब।

हार-हार कर हार न मानी
मृत्यु वरण करने की ठानी
ऐसे पुरुषार्थी भी डूबे
डूबे पीर, औलिया, ज्ञानी।

काल अजय है, अजय विधाता
माया है सब रिश्ता-नाता
धीरे-जल्दी, हंसके-रोके
आया है जो, निश्चित जाता॥"

Comments

  1. हिन्दी में विशिष्ट लेखन का आपका योगदान सराहनीय है. आपको साधुवाद!!

    लेखन के साथ साथ प्रतिभा प्रोत्साहन हेतु टिप्पणी करना आपका कर्तव्य है एवं भाषा के प्रचार प्रसार हेतु अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें. यह एक निवेदन मात्र है.

    अनेक शुभकामनाएँ.

    ReplyDelete

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आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर

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