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लो क सं घ र्ष !: बजट नीतियाँ लीक से हटने की दरकार - 2

सुप्रसिद्ध अर्थशास्त्री श्री कमल नयन काबरा की शीघ्र प्रकाशित होने वाली पुस्तक 'आम आदमी - बजट और उदारीकरण' प्रकाशन संस्थान नई दिल्ली से प्रकाशित हो रही है जिसकी कीमत 250 रुपये है उसी पुस्तक के कुछ अंश नेट पर प्रकाशित किये जा रहे हैं
-सुमन

देश में असमानताएँ, गरीबी, आजीविका विहीनता, असुरक्षा बढ़ी हैं। कारण-अकारण निजी तथा सामूहिक (भीड़) के स्तर पर आक्रोश के हिंसक धमाके-वाकये आम घटना बन गये हैं, कुछ सैकड़ो असुरक्षित नेताओं की जान की रक्षा करने पर 5 से 6 सौ करोड़ रूपए फूँके जा रहे हैं और हजारों- लाखों लोग चंद बाहरी-अन्दरूनी आतंकियों के शिकार बनते रहते हैं। पर्यावरण प्रदूषण तथा प्राकृतिक संसाधनों की घटती मात्रा तथा गिरती गुणवत्ता बजट में उधार जुटाई गयी अतिविशाल राशि के बोझ से भी ज्यादा बोझ अजन्मी भावी पीढ़ियों पर डाल रहे है।
इन सब सवालों से कन्नी काटते हुए वही बढ़त दर को बढ़ाने का खटराग लगातार हमारे बजटकारों का महँगा, अदूरदर्शी, असामाजिक शौक बना हुआ हैं। अभी एक जगह विजयदान देथा ने लिखा था कि पूरी तरह करोड़ों तारों से रोशन आसमान कि तरह धरती के अँधेरे में अपनी राह टटोलते इंसान को एक चिंगारी भर रोशनी नहीं दे पाता हैं। यह उसी आसमाँ की चर्चा है जो अमीर खुसरो की पहेली की रत्नों भरी उल्टी थाली की तरह कभी जमीन पर रोशनी का एक कतरा तक पहुँचाने में कई प्रकाश वर्ष लगा देता हैं। मुझे लगा कि हमारे अर्थशास्त्री और नीतिकार आखिर करोड़ों तारो से चमकते आसमान और पिछले कुछ दर्शकों में कई गुणा बढ़ी राष्ट्रीय आय की समरूपता, उनका सादृश्य क्यों नहीं देख पाते है। बढ़ती राष्ट्रीय आय की यह अरबों की राशि इतनी ऊपर ही अटक जाती है और दूरान्त सितारों की तरह एक टिमटिमाती ढिबरी जैसी और एक ढिबरी जितनी उपयोग भी इन करोड़ों नागरिकों के लिए नहीं बन पाती है।
हाँ, बढ़ाए उत्पादन। तेज आर्थिक वृद्धि। परन्तु उस दूरस्थ आसमान में नहीं, उन अटटालिकाओं में नहीं, जिन्हे आम आदमी केवल हसरत भरी निगाहों से देख भर सकते हैं, किन्तु उन्हें पा सकने के नादान ख्वाब तक नहीं पाल सकते हैं।
यदि इस रूपक को आगे बढ़ाएँ, तो कहा जा सकता है कि उल्कापात की तरह गरीबों और ग्रामीणों के लिए हजारों-लाखों करोड़ रूपए कि कार्यक्रमों के बजट में जगह दी गयी हैं। पुराने बजटोें से चालू कीमतों पर और कहीं अधिक मात्रा मेें, परन्तु प्रति-व्यक्ति क्या पल्ले पड़ता है? क्या अरबों रूपयों के सार्वजनिक उपक्रमों बेचने का मानस बनाकर, उसे बजट से बहरहाल बाहर रखकर, कुछ हजार परिवारों को यह जन-सम्पत्ति ’बेच’ कर, हमारे बजटकर्ता देश में व्याप्त दारूण गैर- बराबरी को दारूणतर नहीं कर देगंे? क्या ऐसा अनार्जित, राजकीय अनुकम्पा पर आधारित सम्पत्ति का केन्द्रीकरण तथाकथित सामाजिक कार्यक्रमों (जिन्हे समावेशी विकास की धुरी बताया जाता है) की मरहम से गरीबी, बेरोजगारी, बदहाली और गन्दगी के नासूरों का इलाज कर पाएगा? क्या अगले वर्ष वित्त मंत्री जब लोक सभा में बजट पेश करने खड़े होंगे, तो यह दावा कर पाएँगे कि इस साल गरीबी घटी है, रोजगार बढ़त के कारण बेरोजगारों की संख्या घटी है, उपभोक्ता कीमतों मेें कमी आयी है आदि- आदि समावेशी विकास की आड़ में दूरस्थ आसमाँ में और नये, चमकते सितारे जोड़कर क्या अँधेरी झोपड़िययों, तंग बस्तियों और गांवों की पगडंडियों पर अंधेरा कुछ कम कर पाएँगे?
विकास के विकट भ्रम में फँसे खाते-पीते अभिजात तबके व्यस्त हैं बजट के फलस्वरूप अपनी-अपनी माली हालत में आने वाले बदलाव, आमतौर पर इजाफे का हिसाब जोड़ने में। बाकी भारत के लिए ये बजट, ये बहसें आदि सब चोंचले हैं खाए- अघाए, लोगों का। क्या हम कह सकते हैं कि चलो, 2009 के जनादेश के बाद इस बजट में ’कुछ’ तो हुआ और जब इतना हो सकता है तो और ज्यादा, और शुभ, और जनपक्षीय भी हो तो सकता है। हाँ यह सम्भव है और होगा, विशेषतः हमारे नये उदीयमान युवकों की ताकत से जो न नेताओं के वंशज हैं, न जिनके जन्म के वक्त से ही उनके मुँह में चाँदी की चम्मच है और न ही उनके अग्रज हमारे अखबारो के तीसरे पन्ने की शख्सियत है। आम आदमी के बेटे-बेटियाँ ही एक नये बजट की शुरूआत कर पाएँगें।
वृद्धि और समावेशीकरण: एक म्यान में दो तलवार
एक बार एक प्रखर अन्तर्दृष्टिपूर्ण अर्थशास्त्री ने भारत की एक नयी पंचवर्षीय योजना के बारे में कहा था कि यह वहीं चली आ रही योजनाओं की नवीनतम किस्त है। हमारी संघीय सरकार के इस वर्ष के बजट के बारे भी यह उक्ति उपयुक्त नजर आती है। बजट में खर्च राष्ट्रीय आय की आम तौर पर दो अंकों में देखी गयी वृद्धि दर के असर से बढ़ जाते हैं। इस वर्ष भारत सरकार का खर्च दस लाख करोड़ रूपयों का अंक पार कर गया हैं।

कमलनयन काबरा
(क्रमश:)

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