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'ट्रेन रोको आंदोलन'' की अनछुई हकीकत

'ट्रेन रोको आंदोलन''  सागर को रेल सुबिधा मुहैया करने की एक कोशिश है,लेकिन इसकी वास्तविकता और अनछुए पहलू पर नजर डाली जाये तो यह कदम हमें विकास से कुछ मिनिट या कुछ घंटे पीछे तो धकेल ही सकता है.सागर को विकास की जरुरत है और विकास के लिए आवश्यक होता है की आवाज़ उठाई जाए लेकिन वास्तव में आवाज़ उठाने का भी एक स्तर होता है,हमें अपने हितों से पहले ये देखना होता है की कही  इससे  किसी और के  हितों पर आंच तो नहीं आ रही है,

कल सागर के बाशिंदे मकरोनिया रेलवे स्टेशन पर रेलगाड़ी को रोककर रखेंगे चूकी मकरोनिया को रेल सुबिधा मुहैया करानी है ,होनी भी चाहिए क्या फर्क पड़ता है की अगर उस ट्रेन में कोई ऐसा व्यक्ति बैठा है जिसके पिता गुजर गए है,जिसकी माँ की हालत गंभीर है,किसी को ऑफिस जल्दी पहुंचना है और क्या फर्क पड़ता है की अगर किसी औरत की डिलीवरी होनी है और उसे अस्पताल पहुँचने की जल्दी है,जी नहीं सरकार कोई फर्क नहीं पड़ता.

इस तरह के आंदोलन में देश के वो प्रभावशाली लोग शामिल होते  है जिनके हाथ में संसद और विधानसभा तक की ताकत होती है और होनी भी चाहिए हमने आखिर इसी के लिए उनका चुनाव किया है की वो हमारी आवाज़ को संसद और विधानसभा तक ले जा सके,लेकिन दोस्तों क्या हम जिस तरह से अपनी आवाज़ उठा रहे है वो जायज है.क्या यह देश के विकास को किसी भी प्रकार की गति प्रदान कर सकता है,देश में इस तरह के सैकड़ों आंदोलन हर रोज होते है अगर हम एक हिसाब से देखें तो देश की विकास की गति को हम अपनी जायज और नाजायज मांगों को गलत तरीके से मांगकर ही मंद कर रहे है
संसद और विधानसभा में बैठे राजनेताओं को अपनी आवाज़ में वो दबंगता नजर नहीं आती जिससे की हमारी मांगे सारी संसद  और विधानसभा में गूँज सके,आखिर क्यों हमारी महत्वपूर्ण मांगों को भीडभाड भरे इलाकों में गुम होने के लिए छोड़ दिया जाता है ,जानते है क्यों ? क्योंकि  अगली बार फिर यही भीडभाड उन्हें उस कुर्सी तक पहुंचाएगी,वरना मांगे तो संसद या विधानसभा से ही पूरी होती है सड़कों से नहीं.एक सांसद या विधायक को इस तरह के आंदोलन मेरी समझ से तो शोभा नहीं देते. 

यह बात निश्चित है की रेल प्रशासन के साथ साथ सागर के यात्रिओं  को भी खासी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा जो एक लिहाज से गलत है,मांगे मागना जरुरी है क्यों की आज बिना मांगे कुछ भी नहीं मिलता,कई बार प्यार से कई चीज़ें मिल जाया करती है जो जबरन करने के बाद भी नहीं मिलती.इस तरह के आंदोलन से हर एक बर्ग हर एक तबका संतुष्ट नहीं है और न ही हो सकता है जबकि ये मांगे उनके हितों के लिए भी है और वो भी किसी और तरह से मदद करना चाहते है तो क्या हम कुछ ऐसा कर सकते है जिससे की सभी बर्गों का सहयोग प्राप्त हो सके तब यह आंदोलन और भी सार्थक हो सकता है 

   छात्रों की मांगों पर कालेज बंद ,डॉक्टर की मांगो पर अस्पताल बंद ,और बिजली की मांगो पर बिधुत विभाग को जला दो,भाई बहुत खूब है आपके आंदोलन लेकिन जरा हमारी ही समझ कम है. देश की जनता ही विकास को आगे बढाती है और  वही रोढे लगाती है तो जागरूक जनता कभी नहीं चाहेगी के  देश के विकास की गति जरा भी मंद पड़े!           


                                                                                                          संजय सेन सागर 




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