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लो क सं घ र्ष !: न्यायपालिका की स्वतंत्रता-5

संवैधानिक मिथ्या या राजनैतिक सत्य
रैण्डल बनाम विलियम एच साॅरेल 548 यू0एस0 230 (2006) मुकदमें में सुप्रीम कोर्ट ने छः भिन्न विचार व्यक्त किए उनमें से तीन जजों ने बहुमत राय से अभियान खर्चे की सीमाओं को समाप्त कर दिया एवं यह विचार व्यक्त किया कि खर्च पर कोई सीमा निर्धारित करना असंवैधानिक है। इस निर्णय से उन प्राइवेट कम्पनियों को काफी फायदा पहुँचा जो खुले तौर से राजनैतिक पदों की लालसा करती थीं।
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता को बचाने में बुरी तरह से असफल रहा है। जार्ज डब्लू बुश बनाम अलवर्ट गोरे जू0 531 यू0 एस0 98 (2008) के मुकदमें में यह बात साबित हो गईं। 5-4 जजों ने बहुमत से यह निर्णय दिया कि फ्लोरिडा में वोटों की गिनती रोक दी जाय। यह भी निर्णय में कहा गया कि ‘‘व्यक्तिगत वोटर को यू0एस0ए0 के राष्ट्रपति के चुनाव में वोट देने का कोई संवैधानिक अधिकार नहीं है, जब तक कि राज्य की विधायिका निर्णय न दे।’’ जस्टिस जाॅन पाल स्टीवेन्स ने इस निर्णय से असहमति व्यक्त की एवं फैसला दिया कि ‘‘बहुमत निर्णय ने असंख्य वोटरों को वोट देने के अधिकार से वंचित कर दिया। यद्यपि हमें कभी निश्चित रुप से यह पता नहीं चल सकता है कि इस वर्ष राष्ट्रपति के चुनाव में वास्तविक विजेता कौन है। लेकिन एक बात पूर्णतया स्पष्ट है कि वास्तविक पराजय किसको मिली। वास्तविक हार राष्ट्र के उस विश्वास की हुईं जो जज को कानून के संरक्षक के रूप में देखती थी।’’
भारत वर्ष में सुप्रीम कोर्ट के द्वारा दिए गए निर्णयों में, जो 1950 से 1989 के मध्य दिए हैं एवं उन निर्णयों में जो 1990 से 2008 के मध्य दिए गए हैं, स्पष्ट अन्तर हैं क्योंकि राजनैतिक वातावरण आर्थिक नीतियों से काफी प्रभावित हुआ। मल्टी नेशनल कम्पनियाँ वजूद में आईं। प्रबल भारतीय बिजनेस घराने पहले से ही राजनैतिक शक्ति के साथ मौजूद थे। 1950 से 1989 के मध्य सम्पत्ति के अधिकार के क्षेत्र में त्रुटिपूर्ण निर्णय दिए गए जिसके कारण पचास तथा साठ के दशक में भूमि सुधार कानूनों में अवरोध उत्पन्न हुआ तथा सामन्त वादियों एवं पूँजीपतियों को फायदा पहुँचा। सत्तर के दशक के मध्य सुप्रीम कोर्ट ने 1975 में राजनैतिक इमरजेन्सी के दौरान बन्दी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं के निलम्बन को उचित ठहराया, जिसके कारण जनता में सुप्रीम कोर्ट की काफी आलोचना हुई एवं बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए माफी भी माँगी। निर्णय के प्रभाव को संसद के द्वारा संविधान में संशोधन करके समाप्त किया गया। बन्दी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं का निलंबन अस्थाई रहा क्योंकि 1977 में चुनाव कराए गए। सामान्य तौर से किसी भी शैक्षिक एवं राजनैतिक परिचर्चा में जिस चीज की उपेक्षा की जाती है वह यह कि 1977 के पश्चात, भारत के कई हिस्सों में अधिक तानाशाही की परिास्थतियाँ मौजूद हैं। तथाकथित आतंकवाद विरोधी कानून इसका प्रमाण है। अनके फर्जी इनकाउन्टर इसके आवरण में कराए जाते हैं। न्यायिक-समाज अथवा बुद्धिजीवियों के द्वारा इस पर कोई विचार विमर्श नहीं किया जाता है क्योंकि जो लोग इन कानूनों से प्रभावित हैं वे या तो सामान्य (मज़दूर) लोग हैं या निम्न मध्यम वर्ग के लोग हैं।
1990 के पश्चात, भारत का सर्वोच्च न्यायालय कारपोरेट घरानों के आक्रमण के प्रभाव से अपने आप को नहीं बचा सका। यूनियन कार्बाइड कारपोरेशन बनाम यूनियन आॅफ इण्डिया एवं अन्य (ए0आई0आर0 1990 सुप्रीम कोर्ट 273) भोपाल गैस काण्ड मुकदमे में यह पूर्णतया दृष्टिगोचर है। यूनियन कार्बाइड की लापरवाही के कारण दो-तीन दिसम्बर 1984 को मिथाइल आइसोसाइनेट गैस का रिसाव हुआ, जो बहुत ही जहरीली गैस है। इस रिसाव के फलस्वरूप औद्योगिक एवं वातावरण सम्बंधी बहुत ही गंभीर दुर्घटना हुई जिसमें हजारों लोग मारे गए। इस मामले में यूनियन कार्बाइड, भारत सरकार से अपनी शर्तों को मनवानी चाहती थी। सुप्रीम कोर्ट ने यूनियन कार्बाइड की शर्तों को जल्दबाजी में स्वीकार कर लिया। इन शर्तों के तहत यूनियन कार्बाइड को, विश्व के सबसे भयानक वातावरण सम्बंधी (गैस) दुर्घटनाओं में से एक में बहुत ही कम क्षति पूर्ति करनी थी। यह क्षतिपूर्ति यू0एस0ए0 में की जाने वाली तुलनात्मक क्षतिपूर्ति के मुकाबले में बहुत कम थी। साथ ही साथ भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने भारत सरकार के उस अधिकार का भी सौदा कर दिया जिसके द्वारा यूनियन कार्बाइड के अधिकारियों पर आपराधिक उपेक्षा एवं हत्या का मुकदमा चलाया जाता। भोपाल गैस काण्ड में लगभग तीन हजार लोग मारे गए, 60 हजार लोग गम्भीर रूप से घायल हुए तथा लगभग 2 लाख लोग स्थायी रूप से प्रभावित हुए। हजारों जानवर मारे गए। फसलंे नष्ट र्हुइं, व्यापार एवं वाणिज्य बाधित हुआ। सुप्रीम कोर्ट के उपर्युक्त निर्णय को पुनरावलोकित किया गया, क्योंकि पुनरावलोकन याचिकाएँ दायर की र्गइं एवं जनता में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की काफी आलोचना की गई। सुप्रीम कोर्ट के द्वारा इस याचिका का निस्तारण प्रभावित लोगों के संतोष तक कभी नहीं किया गया। यूनियन कार्बाइड ने भारत मंे विभिन्न स्तरों पर अधिकारियों को प्रभावित किया। इसका प्रमुख वारेन एण्डरसन जमानत के दौरान फरार हो गया। 5 जजांे वाली सुप्रीम कोर्ट की बेन्च ने यह फैसला दिया कि शर्तें सुप्रीम कोर्ट के द्वारा इसलिए निर्धारित की गईं क्योंकि सम्बंधित पक्ष इस पर सहमत हुए एवं भारत में उपचार प्राप्त करने में विलम्ब हुई। इसी घटना के साथ एक अन्य घटना यह हुई कि अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय हेग में एक मशहूर भारतीय न्यायाधीश डा0 नगेन्द्र सिंह की मृत्यु के कारण वह सीट रिक्त हो गई थी। उनके स्थान पर एक दूसरे भारतीय के चुनाव के लिए उस देश का वोट आवश्यक था। जहँा पर यूनियन कार्बाइड का मुख्यालय था।
1991 के पश्चात, राजनैतिक रूप से शक्तिशाली भारतीय कम्पनियों के द्वारा फूट डालने वाला एक कार्यक्रम अपनाया गया। इस कार्यक्रम में मल्टी नेशनल कम्पनियों एवं बैंकों ने फासीवादी पार्टियों जैसे भारतीय जनता पार्टी, शिव सेना, महाराष्ट्र नव निर्माण सेना आदि पार्टियों का प्रयोग खुले तौर पर किया। यह कार्य मुम्बई तथा अन्य स्थानों पर भिन्न नामों से इसलिए किया गया ताकि जनता का ध्यान उन हानिप्रद आर्थिक नीतियों से हटाया जा सके जो वे कम्पनियाँ यहाँ सरकार की मदद से लागू कर रही थीं। इन कम्पनियों ने इन फासीवादी पार्टियों की मदद से धर्म की दुहाई शुरू की एवं मुस्लिम एवं अन्य अल्पसंख्यक लोगों को राक्षस बनाकर पेश किया ताकि लोगों के ध्यान को आर्थिक नीतियों से हटाया जा सके। इसी समय सुप्रीम कोर्ट के 3 जजों की बेन्च ने मनोहर जोशी बनाम नितिन भाउराव पाटिल (ए0आई0आर0 1996 एस0सी0 796) मुकदमे में मुम्बई हाईकोर्ट के उस फैसले को उलट दिया जिसमें शिवसेना प्रत्याशी को लोक प्रतिनिधि अधिनियम 1951 के अन्तर्गत साम्प्रदायिक उन्माद भड़काने वाला भाषण देने के लिए चुनाव लड़ने हेतु अयोग्य घोषित किया गया था। शिवसेना प्रत्याशी ने आम सभा में घोषणा की थी कि यदि उनकी पार्टी विजयी हुई तो महाराष्ट्र को प्रथम हिन्दू राज्य घोषित किया जाएगा। यही प्रत्याशी जीतने के बाद भारतीय जनता पार्टी एवं शिवसेना के द्वारा मुख्यमंत्री चुना गया। इसके पूर्व सुप्रीम कोर्ट ने केसवन भारती बनाम स्टेट आफ केरल मुकदमे में सात जजों के बहुमत ने यह फैसला दिया था कि धर्म निरपेक्षता भारतीय संविधान की मूल भावना है। जिसको न तो परिवर्तित किया जा सकता है और न ही रद्द किया जा सकता है। किसी ऐसे मामले में जिसका सम्बन्ध चुनाव में धर्म के आधार पर अपील करने जैसी भ्रष्ट क्रियाओं से हो।
भारत की न्यायिक एवं कानूनी व्यवस्था निर्दोष नागरिकों की सामूहिक हत्या एवं अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों की हत्याओं के सम्बन्ध में पूरी तरह से कार्य करने में सक्षम सिद्ध नहीं हुई है। फासीवादी, राजनैतिक दलों ने, जिनकी पुश्तपनाही कारपोरेट घरानों, एवं धनी वर्ग के द्वारा की जाती है, अनेक जघन्य कार्य अंजाम दिए हैं ताकि वे लोगों के ध्यान को भारत की अर्थव्यवस्था पर कारपोरेट घरानों के कन्ट्रोल से हटा सकंे। यद्यपि इन कारपोरेट घरानों के मुख्य सदस्यों को, जाँच आयोगों द्वारा जिनकी अध्यक्षता हाईकोर्ट के कार्यरत जज करते हैं, दोषी पाया गया है। पहले तो इन मामलों में शिकायत दर्ज नहीं की जाती है और यदि दर्ज कर ली गई तो उसकी जाँच पड़ताल नहीं की जाती है एवं अन्ततोगत्वा फाइल को बन्द कर दिया जाता है। दिसम्बर 1992 एवं जनवरी 1993 में मुम्बई (महाराष्ट्र राज्य) में हुई सामूहिक हत्या के मामलों में किसी को दोषी नहीं ठहराया गया है। इन साम्प्रदायिक हमलों में 2000 से अधिक लोग मारे गए, सैकड़ों लोग लापता हो गए, तथा पुलिस सैकड़ों मामलों में केवल ऊपर के आदेश का पालन करती हुई मूक दर्शक बनी रही। इसके विपरीत, 1993 के मुम्बई विस्फोट घटनाओं के मुकदमों के मामले में, जिसके मुख्य अभियुक्त, अन्डरवल्र्ड के खरीदे हुए सदस्य थे, उनको बचने का मौका दिया गया। इन विस्फोटो में सभी धर्मों के लोग मारे गए थे।



लेखिका-नीलोफर भागवत
उपाध्यक्ष, इण्डियन एसोसिएशन आफ लायर्स

अनुवादक-मोहम्मद एहरार
मोबाइल - 9451969854

जारी ....

loksangharsha.blogspot.com

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