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लो क सं घ र्ष !: न्यायपालिका की स्वतंत्रता-4

संवैधानिक मिथ्या या राजनैतिक सत्य

आश्चर्यजनक रूप से सुप्रीम कोर्ट का एक कार्यरत जज इस बात पर जोर दे रहा था कि व्यक्तिगत अधिकार तथाकथित राष्ट्रीय सुरक्षा के हितों के कारण दबा दिए जाएँगे। 9/11 की आतंकवादी घटना से सम्बंधित बहुत से ऐसे प्रश्न हैं जिनका जवाब अभी प्राप्त नहीं हुआ है तथा उनमें ऐसे प्रश्न भी हैं जिनको तकनीकी एवं इन्जीनियरिंग विशेषज्ञों ने उठाया है। वास्तविकता यह है कि आतंकवाद के खिलाफ युद्ध का तात्पर्य मुख्य आर्थिक संस्थाओं एवं घरानों के द्वारा युद्ध है जो संयुक्त राज्य अमेरिका में इस गूढ़ आर्थिक एवं राजनैतिक संकट के समय में राजनैतिक विरोध को दबाने के लिए किया जा रहा हैं
कुछ महत्वपूर्ण मुकदमों के अध्ययन से जो कि 1990 या उसके आसपास हुए हैं, यह बात बिल्कुल स्पष्ट हो जाएगी कि संयुक्त राज्य अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट एवं भारत के सुप्रीम कोर्ट दोनों मंे कौन ज्यादा स्वतंत्र है।
संयुक्त राज्य अमेरिका के उपराष्ट्रपति डिक चेनी बनाम संयुक्त राज्य अमेरिका, जिला न्यायालय (कोलम्बिया) संख्या 4-475 दिनांक 18 मार्च 2004 के मुकदमें में न्यायाधीश जस्टिस अन्टोनिन स्कालिया ने सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही के दौरान अपने आपको डिक चेनी से व्यक्तिगत सम्बंध रखने से इनकार कर दिया। अमेरिका बार एसोसिएशन की आदर्श आचार संहिता के अनुसार ‘‘जजों को सभी प्रकार के अनुचित व्यवहार से अपने आप को बचाना है।’’ जस्टिस स्कालिया का उपराष्ट्रपति चेनी के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध, मुकदमे के चलते रहने के दौरान पूरी तरह अनुचित था। डिक चेनी उस समय बुश नेशनल एनर्जी पालिसी डेवलेपमेन्ट ग्रुप के चेयरमैन थे। जिस पर फेडरल एडवाइजरी के कानून तोड़ने का आरेाप था। इस कानून के अनुसार नेशनल एनर्जी पालिसी डेवलेपमेन्ट ग्रुप को अपनी कार्यवाही को जनता के समक्ष पेश करना था क्योंकि यह ग्रुप पूरी तरह से सरकारी अधिकारियों से बना था। इस ग्रुप में इनरान कम्पनी के सी000, स्व0 केनेथ ले भी शामिल थे। जस्टिस स्कालिया के द्वारा अपने आप को कार्यवाही के दौरान डिक चेनी से सम्बंध रखने से इन्कार करना न्यायिक स्तर के पतन की ओर इशारा करता है।
प्रजातंत्र के आवरण के पीछे संयुक्त राज्य अमेरिका में पुलिस राज्य है। यह इस बात से स्पष्ट है जिसमें ‘‘शत्रु लड़ाकू’’ के नाम पर हजारों बेगुनाह नागरिकों को ग्वान्टानामों बे एवं दूसरी जेलों में पिछले छः वर्षों से बिना मुकदमा चलाए कैद रखा जा रहा है। हमदी बनाम रम्ज़फील्ड नं0 542, यू0एस0 507, सन 2004 के मुकदमें के फैसले में यह बात स्वीकार की गई कि व्यक्ति को बन्दी प्रत्यक्षीकरण का अधिकार है। यह भी निर्णय दिया गया कि संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति को ‘‘आतंकवाद के खिलाफ’’ युद्ध में असीमित शक्तियाँ प्राप्त हैं जिसके तहत लोगों को बन्दी बनाया जा सकता है, बिना मुकदमा चलाए केवल शक के आधार पर जेलों में डाला जा सकता है। जस्टिस साॅण्ड्रा कोनर ने सैद्धांतिक रूप से यह स्वीकार किया कि न्यायालय को गिरफ्तार किए गए व्यक्तियों के सम्बन्ध में न्यायिक पुनरावलोकन का अधिकार हैं इस निर्णय का प्रभाव यह पड़ा कि निर्दोषता की अवधारणा के सिद्धांत का परित्याग कर दिया गया एवंसबूत का बोझअभियोग लगाए गए व्यक्ति पर हस्तांतरित कर दिया गया कि वह साबित करे कि वहशत्रु लड़ाकूनहीं है। सरकार का यह अधिकार कि वहफर्जी सबूत पेश करेबना रहा एवं मिलिट्री कोर्ट के समक्ष सुनवाई को पर्याप्त माना गया।
रसूल बनाम जार्ज बुश नं0 542 यू0एस0 466 सन् 2004 के मुकदमें में न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि ग्वान्टानामों कैदी, कान्ग्रेसनल हैबीस कारपस एक्ट 1863 के तहत, बन्दी प्रत्यक्षीकरण याचिका को दायर कर सकते हैं। इसको रोकने के लिए संसद ने डिटेनी ट्रीटमेन्ट एक्ट 2005 पारित किया एवं कम्बैट स्टेट रिब्यू ट्रिब्यूनल स्थापित किए गए, वास्तव मेंरिब्यू ट्रिव्यूनलकंगारु अदालतंे यानी फर्जी अदालतें थीं जिसमेंवकील एवं सबूतको कोई स्थान नही दिया गया।
सन् 2006 में हमदान बनाम रम्ज़ फील्ड नं0 548 यू0एस0 मुकदमे में सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला दिया किडिटेनी ट्रीटमेन्ट एक्टउन लोगों पर लागू नहीं होगा जिन्होंने बन्दी प्रत्यक्षीकरण याचिकाएँ पहले से दायर कर रखी हैं। इस सुविधा को समाप्त करने के लिए मिलिट्री कमीशन एक्ट 2006 पारित किया गया ताकि ग्वान्टानामो के कैदियों की सभी बन्दी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं को खारिज किया जा सके।
अन्ततोगत्वा सन् 2008 में लखदर बूमीडीन बनाम जार्ज बुश नं0 553 यू0एस0 2008 मुकदमे में संयुक्त राज्य अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने अन्तर्राष्ट्रीय विरोध के फलस्वरूप, ग्वान्टानामो एवं दूसरे स्थान की जेलों में कैदियों पर जो अत्याचार हो रहा था, एवं जिन्हें अकारण बिना मुकदमा चलाये छः साल जेलों में बन्द किया जा रहा था, यह निर्णय दिया किशत्रु लड़ाकूव्यक्तियों को बन्दी प्रत्यक्षीकरण की याचिका को दाखिल करने का अधिकार प्राप्त है। तथापि कार्यपालिका के उस अधिकार को चुनौती नहीं दी गई, जिसके अन्तर्गत किसी भी व्यक्ति को शत्रु लड़ाकू घोषित कर दिया जाता था। अन्य अधिग्रहीत देशों की जेलों के कैदियों को जिन्हें अवैध रूप से बन्द किया गया था, इस आदेश से कोई राहत नहीं मिली। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि लाखों लोग जो मारे गए एवं अधिग्रहीत देशों में ‘‘आतंकवाद के खिलाफ युद्धके नाम पर जिन लोगों को शरणार्थी बनाया गया, उनमें से लगभग 90 प्रतिशत लोग आम नागरिक थे। संयुक्त राज्य अमेरिका एवं यू0के0 की सरकारों नेजेनेवा कन्वेन्शन की धज्जियाँ उड़ा दी हैं।
प्रथम दृष्टया, अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने आर्थिक एवं कारपोरेट फ्राड (धोखाधड़ी) के फलस्वरूप अपने आप को पूरी तरह से अकर्मण्य साबित कर दिया है। फाइनेन्सियल डिस्क्लोजर रिपोर्ट 2001 के अनुसार अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के अधिकतर जज 9 में से 5 जज करोड़पति हैं। यदि उनके व्यक्तिगत निवास स्थानों की भी कीमत लगा दी जाए तो सभी 9 के 9 जज करोड़पति हैं। उनकी विचार धारा वही है जो वाॅल स्ट्रीट की है। इन्हीं जजों ने उस याचिका को खारिज कर दिया था जो वाॅल स्ट्रीट बैंकर्स के खिलाफ पेंशन एवं निवेश से सम्बंधित थी। इन बैंकों में मेरिल लिंच, क्रेडिट सुइस ग्रुप, एवं बार्क ले बैंक शामिल थे। इन बैंकों ने इनरान कम्पनी के अधिकारियों के ऋण को रेब्न्यू (आमदनी) के रूप में पेश करके दिखाया।
रीजेन्टस आॅफ यूनीवर्सिटी आॅफ केलीफोर्निया बनाम मेरिल लिन्च 2008 डब्लू0एल0 169504 (यू0 एस 2008) के मुकदमे में यह निर्णय दिया गया। इसका सम्बन्ध उस वृहत वित्तीय फ्राड से था जो होस्टन ऊर्जा जायन्ट, इनरान कम्पनी ने किया। यह निर्णय उस निर्णय के बाद आया जो स्टोनरिज इनवेस्टमेन्ट पार्टनर्स एल0एल0सी0 बनाम साइंटिफिक अटलांटा इंक 552 यू0सं0 2008 के मुकदमे में दिया गया था। जिसमें जस्ट्सि एण्टोनी केनेडी ने बहुमत से यह-निर्णय दिया था कि ‘‘ऐसी कम्पनियों को इन्वेस्टमेंट फ्राड के लिए उत्तरदायी ठहराना वाॅल स्ट्रीट के लिए बुरा सिद्ध हो सकता है एवं हमारे कानून के अन्तर्गत एक सार्वजनिक व्यापारिक कम्पनी होने की महंगी कीमत चुकानी पड़ सकती है।’’ उपयुकर््त निर्णय अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के उन तमाम निर्णयों में से एक था जिसको व्यापारिक संस्थानों के पक्ष में दिया गया।


लेखिका-नीलोफर भागवत
उपाध्यक्ष, इण्डियन एसोसिएशन आफ लायर्स

अनुवादक-मोहम्मद एहरार
मोबाइल - 9451969854

जारी ....

loksangharsha.blogspot.com

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