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गुरु गोबिंद दोउ खड़े काके लागूं पाय। बलिहारी गुरु आपनो जिन गोबिंद दियो बताय।।


शिक्षक दिवस का आरम्भ तब हुआ था जब एक बार राधाकृष्णन के कुछ मित्रों और शिष्यों ने उनसे उनका जन्मदिन मानाने के लिए आग्रह किया तब उन्होंने कहा की उनका जन्मदिन मानाने के बजाय अच्छा होगा कि इस दिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाए। तब से उनके जन्मदिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है । राधाकृष्णन का जन्म पांच सितंबर 1888 को तमिलनाडु के तिरूतानी के एक मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ था। प्रारंभिक स्कूली शिक्षा के बाद मद्रास के क्रिश्चियन कालेज में उन्होंने दर्शनशास्त्र की पढ़ाई की। मद्रास के प्रेसिडेंसी कालेज में अध्यापन के शुरूआती दिनों मे ही उन्होंने एक महान शिक्षाविद् की ख्याति प्राप्त कर ली थी। मात्र 30 वर्ष की उम्र मे उन्हें कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्राध्यापक पद की पेशकश की गइ थी। राधाकृष्णन 1931 से 1936 तक आंध्र प्रदेश विश्वविद्यालय के कुलपति रहे। वर्ष 1939 में वह बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति बने। वह आक्सफोर्ड में पूर्वी धर्म एवं नीतिशास्त्र की स्प्लैंडिंग प्रोफेसर की पीठ पर 16 वर्ष तक रहे। भारत सरकार ने उनकी सेवाओं को देखते हुए 1954 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया था । स्वतंत्रता के बाद वे सोवियत संघ में भारत के राजदूत के रूप में कार्यरत रहे । वर्ष 1952 में उन्हें भारत का उपराष्ट्रपति बनाया गया। सन् 1962 में वह देश के दूसरे राष्ट्रपति बनाए गये। 12 मई 1967 तक वे देश के राष्ट्रप्रमुख रहे। 17 अपैल 1975 को इस महान दार्शनिक का निधन हुआ।
“जब तक शिक्षक शिक्षा के प्रति समर्पित और प्रतिबद्ध नहीं होता और शिक्षा को एक मिशन नहीं मानता तब तक अच्छी शिक्षा की कल्पना नहीं की जा सकती”- डॉ राधाकृष्णन


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