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ग़ज़ल

मैं तेरे दिल को सुकून दूँगा तेरे दिल नज़र को करार दूँगा
बस अपने दिल में जगह दे मुझको मैं तेरी दुनिया संवार दूँगा
कोई नज़र में बसा ले मुझको नही नही यह मुझे गवारा
तेरी अमानत है यह प्यार मेरा तुझे यह इख्तियार दूँगा
खुश परस्तों से राबता क्या गरज बन्दों से वास्ता क्या
जो मेरे सुख दुःख को अपना समझे उसी को अपना प्यार दूँगा
हज़ार मेरी वफ़ा से दामन बचाओ लेकिन मुझे यकीन है
तुम्हारे दिल में भी किसी दिन वफ़ा का जज्बा उभार दूँगा
तुम्हारी यह जान यह इज्ज़त हकीकतन है मेरी बदौलत
जहाँ में खातिर फिरो गे ठोकर मई जब नज़र से उतार दूँगा
"अलीम" ज़माना कदम कदम पर हज़ार कांटे बिछाएं फिर भी
यह मेरा वादा है ज़िन्दगी से की रूप तेरा निखार दूँगा

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