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आपत्तिजनक बयान में उलझती राजनीति

आपत्तिजनक बयान ने तो राजनीति को अपने परिवेश में ढाल लिया है लेकिन लोकतन्त्र को भी अपनी आवेश में समेटने को आतुर ऐसी अभद्र टिप्पणी पर जनता को एक बार फिर अपनी खामोशी दिखानी होगी। जिससे बदलती राजनीति एक बार फिर सर्तक हो सके।
कुछ ही वर्षों में विधानसभा चुनाव होने को है राजनीति के मंझे खिलाड़ी अभी से ही मुद्दे को तैयार कर रहे है। चाहे वह काग्रेस,भाजपा या बसपा और सपा ही क्यों न हो। नेताओं ने तो बयानबाजी व भड़काऊ भाषण से शांति व्यवस्था को तार तार कर दिया हैं। लेकिन कही ज्यादा खेदजनक बात है कि ऐसे बयान जो लोकतन्त्र की मर्यादा को नग्न कर देते है उसी बयान पर ढोल पीटने के बाद खेद जताना।
नेता देश के भविष्य होते हैं और जब भविष्य साफ न दिखाई दे तो वर्तमान में ही उसे बदल देना चाहिए। लेकिन हमारा मुल्क पड़ोसी की तर्ज पर जीने को नहीं कहता, वरना क्या होता यह बताने की जरूरत नहीं है। हमने भी पड़ोसी के सियासी हालात को 62 वर्षों में कई बार बदलते हुए देखा है। ऐसे में शान्ति बनाने के लिए जनता का मूक दर्शक बने रहना ही स्वाभाविक है।
पहले लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा नेता वरुण गांधी के द्वारा अल्पसंख्यकों के लिए आपत्तिजनक बयान और अब उत्तर प्रदेश की कांग्रेस अध्यक्ष रीता बहुगुणा ने जिस तरह मायावतीको कहा है वह तो किसी सम्मानित नेता के द्वारा कहा जाना उचित नही है। लेकिन मुख्यमंत्री मायावती ने यह क्या किया? उन्होने तो बड़प्पन दिखाने के बजाय इसे मुद्दे का रूप दे दिया है और कह दिया यह दलित का अपमान है। दलित की बेटी का अपमान है। अब भला भोली जनता क्या जाने ऐसा बयान तो राजनेताओं का आम चलन है। तभी तो माया ने इसे पूरी पार्टी से जोड़ दिया ओर कह डाला यह बयान नही बल्कि सोची समझी साजिश है मेरे खिलाफ। लग रहा है माया ऐसे बयान से आहत हुई। उनकी आत्मा को ठेस पहुंची जो उनके उपर ऐसी अभ्रद टिप्पणी की गई। लेकिन क्या उन्हें याद है यूपी में दो साल पहले मुलायम सिंह के राज में बलात्कार की एक घटना के बाद मुख्यमंत्री साहिबा ने भी मुलायम के लिए भी इसी तरह की एक टिप्पणी की थी।
राजनीति में पड़कर जनता की हमदर्दी को अगर पाना है तो कोई इन नेताओं से सीखे। गर्व है ऐसी राष्ट्रीय पाटियों पर जो कभी भी किसी भी समुदाय को अपनी उंगली पर नचा सकती है। किसी का घर जलवा सकती है तो किसी की गोद को सूना कराने में सक्षम है। इतना ही नही दंगा, जाम व हड़ताल तो इन राजनेताओं का पैंतरा बन गया है। कभी पार्टी से असन्तुष्ट तो कभी विपक्षी नेता के नाखुशगवार बयान। अब इनको क्या पता शिक्षा भी संस्कार का एक अंग है। जो राजनीति में आवश्यक है।
उदाहरण है ऐसे सम्मानीय नेता जो बहुत सी अभ्रद टिप्पणी के बाद भी अपने शांत स्वभाव के लिए जाने जाते है और राष्ट्र की जनता उनका सम्मान करती है। मात्र कारण यह नही कि वह भाषण नही देते बल्कि विदेशों में जाकर अपने भाषण से देश का गौरव बढाते हैं जहां उसमें आपसी नोंकझोंक नहीं होती। और ऐसे नेता जो बयान बाजी को लेकर उलझते रहते है उन्हीं की मूर्तियां व पद लोलुपता उनका हनन का कारण होती है जो जनता की नजर में केवल मायाजाल होता है। जनता इन सब के बावजूद इसका आसान सा जवाब देगी। और फिर कुछ दिन थम सा जाएगा भड़काऊ भाषण का सिलसिला।

अनुराग शुक्ला,anuragshukla2600@gmail.com


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