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कांग्रेस की फैक्ट्री से निकला नया प्रोडक्ट-राहुल


आशुतोष
मैनेजिंग एडिटर आईबीएन7

आशीष नंदी बड़े विद्वान हैं और उनकी बहुत इज्जत है। चुनावों की समीक्षा करते हुए उन्होंने लिखा कि बीजेपी और दूसरी पार्टियों को उनका दंभ यानी "एरोगेंस" ले डूबा। उनकी तुलना में देश की जनता ने मनमोहन सिंह की "विनयशीलता और सज्जनता" को सराहा और उनके सिर जीत का सेहरा बांधा। नंदी का विश्लेषण दिलचस्प है, और अरुण जेटली की बात से काफी मेल भी खाता है। जेटली का कहना है कि मतदाताओ ने "श्रिलनेस" यानी अनावश्यक बयानबाजी, सतहीपने को नकार दिया, लोगों ने "मॉडरेशन" को पसंद किया न कि जिंगोइजम को।

जिंगाइजम और एरोगेंस बड़े शब्द हैं और अगर नंदी और जेटली जैसे लोग इनका इस्तेमाल करते हैं तो फिर अनायास ही सबकी नजर भी उधर ही उठ जाती है। इन जुमलों से चुनावों का खूबसूरत विश्वेषण तो हो जायेगा लेकिन सही तस्वीर सामने आ पाएगी, कहना मुश्किल है। देश मे इस वक्त दो तरह की धाराएं गडमड हो रही हैं। एक, पुराने परंपरागत "प्री-इंडस्ट्रियल" अंदाज में। और दो, आधुनिक "इंडस्ट्रियल स्टाइल" में। "प्री इंडस्ट्रियल" अंदाज की राजनीति के मूल में है "अस्मिता की पहचान", और उसके इर्द-गिर्द भावनात्मक स्तर पर वोटों का "ध्रुवीकरण" करने की कोशिश या फिर साजिश। ये राजनीति परंपरा सामंतवादी संस्कारों से ओतप्रोत है। इसमें जाति प्रमुख है, गोत्र को प्राथमिकता है, धर्म को सामने रखकर वोटों का व्यापार है, भारतीय गणतंत्र के नागरिक की जगह ब्राह्मण-क्षत्रिय-यादव-दलित होना, मराठी-तमिल होना, उत्तर भारतीय-बिहारी होना महत्वपूर्ण है।

लेकिन इंडस्ट्रियल युग की राजनीति ने अब इस को बदलना शुरू कर दिया है। और हैरानी की बात ये कि अस्मिता को अपनी राजनीति की धुरी बनाने वाली बीजेपी ने ही सबसे पहले नए बदलावों को पहचाना और इसको व्यवहार मे लाने का प्रयास भी किया। प्रमोद महाजन और अरुण जेटली जैसे आधुनिक ख्यालों के नेताओं ने इसे बीजेपी की स्ट्रेटजी का एक कारगर हथियार भी बनाने की कोशिश की। हर चुनाव क्षेत्र का सर्वे, पार्टी के टारगेट ग्रुप की पहचान , वोटरों के सम्मुख पार्टी की "पोजिशनिंग" , टेक्नालाजी के जरिए हर वोटर तक पहुंचना, जनता के सामने एक नेता की "इमेज बिल्डिंग" और इसमें टीवी की ताकत का उपयोग इस रणनीति का अहम हिस्सा है। इसकी शुरुआत तो 1998 से ही हो गई थी लेकिन इसको पूरी तरह से आजमाने का काम 2004 के चुनाव मे किया गया। "इंडिय़ा शाइनिंग" का कैम्पेन और वाजपेयी के रूप में एक निहायत करिश्माई व्यक्तित्व की "मार्केटिंग" प्रमोद के दिमाग की ही उपज थी। राजस्थान के चुनाव में हर विधानसभा क्षेत्र का डाटा बेस बनाना, उसके मुताबिक उम्मीदवारों का चयन और क्षेत्र विशेष के अनुसार मुद्दों को सामने रखने का तरीका इतना सफल हुआ कि बीजेपी ने एक ऐसी जीत हासिल कर ली जिस पर खुद महाजन को भी यकीन नहीं हुआ था। राजस्थान के बारे में कहा जाता था कि कांग्रेस का जीतना लगभग तय था। ये अलग बात है कि 2004 के चुनाव में बीजेपी का कैम्पेन कामयाब नहीं हुआ और वो औंधे मुंह गिरी।

बीजेपी चुनाव जरूर हार गई लेकिन उसने सही दिशा में सही कदम उठाया था। दुर्भाग्य ये की पराजय और महाजन की मौत ने बीजेपी को वहीं ला खड़ा किया जहां से वो चली थी। फिर आरएसएस के प्रभाव में आ वो फिर उसी जाति-धर्म के मोह में फंस गई जिससे वो निकलने को तत्पर दिखाई दे रही थी। उधर, कांग्रेस ने बहुत चुपके से बीजेपी से सबक सीखा, उसपर अमल भी करना शुरू कर दिया। सीता राम केसरी की जगह सोनिया का पार्टी के शीर्ष पर होना पार्टी के लिये आशिर्वाद साबित हुआ। सोनिया की आलोचना करते समय हम सब ये भूल जाते हैं कि सोनिया का जन्म और लालन पोषण एक औद्योगिक देश में हुआ था और वो अपने साथ औद्योगिक समाज के संस्कार भारत ले कर आई थीं।
ये सही है कि सोनिया स्वाभाविक तौर पर कांग्रेस के लिये एकजुट ऱखने वाली गोद साबित हुईं और इसमें उनका कोई योगदान नहीं है। नेहरू-गांधी परिवार का जादू ही ऐसा है। लेकिन सोनिया ने एक मंझे हुए मैनेजर की तरह अपनी और पार्टी की कमजोरियों का आकलन किया, ताकत का अंदाजा लगाया, उसके मुताबिक पार्टी की रणनीति को धार दी। सोनिया जानती थीं कि वो कभी भी इस देश की नेता नहीं हो सकती और प्रधानमंत्री तो सवाल नहीं उठता। और बन भी जातीं तो चला नहीं पातीं। लिहाजा अपने आप को प्रधानमंत्री बनने से रोका और एक ऐसे शख्स को आगे किया जिसकी छवि विवादित न हो और जो महत्वाकांक्षी भी न दिखे। और प्रधानमंत्री का चुनाव पूरे होने के बाद इस बात पर जोर दिया कि विकास की बात हो और उस "आम आदमी" तक पहुंचने की कोशिश हो जो कभी कांग्रेस का था जिसको बीजेपी ने अपने "इंडिया शाइनिंग" कैम्पेन से दूर कर दिया था।

कांग्रेस ने सरकार बनते के साथ ही "टारगेट ऑडियंस" की पहचान की और उस तक कांग्रेस नाम का "प्रोडक्ट" पहुंचाने के ध्येय से 'नरेगा' जैसी स्कीम लॉन्च की। लेकिन सोनिया की अगुआई वाली कांग्रेस को भी अच्छी तरह पता था कि मनमोहन भले ही हों, असली नेता का आना अभी बाकी है। राहुल की राजनीति में एंट्री बंम्बइया फिल्मों की तरह धमाकेदार नहीं थी। इंडस्ट्रियल युग के संस्कारों की तरह "राहुल का लॉन्च" एक पेशेवर कंपनी के "प्रोडक्ट लॉन्च" की तरह था। पहले "मार्केट का एसेसमेंट" किया गया और फिर धीरे-धीरे उसे उपभोक्ताओं के बीच उतारा गया। और हर कदम पर इस बात का ध्यान रखा गया कि राहुल के साथ लोग आशातीत उम्मीदें न लगा बैठें। क्योंकि इस प्रोडक्ट की कामयाबी पर कांग्रेस नामक लगभग खस्ता हो चुकी कंपनी का भविष्य दांव पर लगा था। उन्हें पहले चुनाव लड़ाया गया। चुनाव जीतने के बाद भी जल्दबाजी नहीं दिखी। संसद से परिचय हुआ, पिछली बैंचों पर बैठकर पूरे बाजार का जायजा दिलाया गया और फिर राजनीति की ऊबड़-खाबड़ जमीन पर चलाने की प्रेक्टिस कराई गई।

अच्छे प्रोडक्ट की कामयाबी के लिये जरूरी है उसकी "टारगेट ऑडिंयंस" के हिसाब से "मार्केटिंग और इमेज बिल्डिंग"। एक रात एक दलित और गरीब के घर में ठहरना हो या फिर किसी रैली में गिरे किसी लड़के को उठाकर पानी पिलाना हो सब कुछ एक ऐसे प्रोडक्ट को निखारने की स्ट्रेटजी थी जिसमें करुणा भी है और जो राजघराने का होने के बावजूद आम आदमी के बारे में सोचता है और उनके लिये कुछ करना चाहता है। बिलकुल उन जैसा है। और जब लगा कि प्रोडक्ट को लेकर लोगों में विश्वास जमने लगा है तो फिर एक दिन चुपके से उसे पार्टी का महामंत्री बना दिया गया और ये बात फैला दी गई कि मंत्री बनने में उनकी दिलचस्पी नहीं है। जिस देश में मंत्री बनने और मलाईदार ओहदा पाने के लिए लोग जान देने को उतारू हों वहां राहुल प्रधानमंत्री का आग्रह ठुकरा रहे हैं कि मैं तो उन्हें मंत्री बनाना चाहता हूं लेकिन वो खुद बनने को तैयार नहीं हैं। है ना शानदार इमेज बिल्डिंग। सत्ता का लालच नहीं और गरीबों के साथ जुड़ने की लालसा। उधर, आडवाणी जी हैं जो प्रधानमंत्री बनने को परेशान हैं।

फिर जरा गौर कीजिएगा दिल्ली में राहुल की प्रेस कॉन्फ्रेंस पर और उसमें नीतीश और चंद्रबाबू नायडू की तारीफ करना और परिवारवाद पर कहना "हां ये सही है कि मैं इस गलत सिस्टम की उपज हूं लेकिन मैं ये सिस्टम क्यों नहीं बदल सकता।" प्रोडक्ट अब चल निकला था और अब उसे मार्केट में पूरी तरह से लॉन्च करने का वक्त आ गया था। राहुल अब खुद फैसले करने लगे। यूपी हो या फिर बिहार अपनी चलाई। सोनिया धीरे-धीरे नेपथ्य में रहने लगीं। सोनिया से ज्यादा चुनावी दौरे किए। पांच साल की ट्रेनिंग अब रंग लाने लगी। लेकिन अभी भी इमेज बिल्डिंग का काम जारी है। प्रधानमंत्री और पार्टी अभी भी कह रही है कि मंत्री बन जाओ लेकिन राहुल अब कह रहे हैं कि वो एक वक्त मे एक ही काम कर सकते हैं छह नहीं और मंत्री बनने से ज्यादा उनकी प्राथमिकता संगठन खड़ा करना है। दरअसल एक वाक्य में कहें तो राहुल गांधी कांग्रेस नामक आधुनिक फैक्ट्री के पहले प्रोडक्ट हैं जिनको काफी करीने और काफी सोच-विचार कर लॉन्च किया गया है।

राहुल के लांच के साथ-साथ ही कांग्रेस ने अपने कोर वोट बैंक को पहचानने काम भी शुरू कर दिया था। ये टेक्नीक जाति और धर्म आधारित नहीं थी । ये सही है कि निशाने पर जातिमूलक और धर्ममूलक तत्व ही हैं। दलित है और मुसलमान हैं लेकिन गरीब और आम आदमी के पर्दे से इनको ढकने की नायाब कोशिश नई राजनीति की नई मिसाल है।

नई सरकार बनने के साथ ही ये कार्यक्रम भी जारी है। नरेगा की चुनावी कामयाबी के बाद अब जोर बुनियादी मंत्रालयों पर है और इनकी जिम्मेदारी भारीभरकम नेताओं के कंधों पर डाली गई है। सरकार के केंद्र में है स्वास्थ्य़ और परिवार कल्याण - गुलाम नबी आजाद देखेंगे, सड़क परिवहन और राजमार्ग - कमलनाथ के जिम्मे, ग्रामीण विकास - सी पी जोशी, शहरी गरीबी उन्मूलन नाम से नया कैबिनेट मंत्रालय बना दिया गया है और कुमारी शैलजा संभालेंगी। खाद्य प्रसंक्करण विभाग एक पूरे कैबिनेट मंत्री को दिया गया हैं। मंत्रालय वितरण को देखते हुये मुझे चुनाव के दौरान कांग्रेस का कैम्पेन हैंडल करने वाली कंपनी JWT के मैनेजिंग पार्टनर रोहित ओहरी की बात याद हो आई। उनके मुताबकि चुनाव के लिये बनने वाली फिल्म के लिये राहुल गांधी की ब्रीफ स्पष्ट थी विकास महत्वपूर्ण है लेकिन ये बात कैंपेन में रेखांकित होनी चाहिए कि विकास अंत नहीं एक सतत यात्रा है।

मैं ये नहीं कहता कि कांग्रेस जाति और धर्म की राजनीति नहीं करती। उम्मीदवारों का चयन हो या फिर मुद्दों को सामने लाने की कोशिश कांग्रेस अस्मिताओं की भावनात्मकता का खूब इस्तेमाल करने से चूकती नहीं है लेकिन ये भी सच है कि उसने तेजी से औद्योगिकीकरण के रास्ते पर आगे बढ़ते देश में आते बदलावों को भी आत्मसात करने की कोशिश की है। उसका टारगेट अभी भी दलित, मुसलमान और ऊंची जातियां ही हैं लेकिन उनतक पहुंचने का तरीका उसने बदल दिया है। और यही बात आशीष नंदी साहब को मैं बताना चाहता हूं। हालांकि जेटली इन बातों को समझते हैं इसलिए अपने लेख में वो कहते भी हैं कि समाज बदल रहा है और देश की राजनीति भी और तमाम राजनेताओं और राजनीतिक दलों को ये समझना चाहिए। राजनीति है तो ऐरोगेंस तो रहेगा लेकिन इस ऐरोगेंस को औद्योगिकीकरण के जमाने में कैसे और किस तरह के मुलम्मे में मार्केट किया जाये और कैसे पोजिशन किया जाए कि ऐरोगेंस करुणा लगने लगे और आम आदमी प्रोडक्ट मार्केंटिंग की चमक में उसे अपना बना बैठे ये इंडस्ट्रियल युग के आभामंडल और उससे प्रभावित मुल्यों की नई चाणक्यनीति है। और बीजेपी को अगर इस राहुल नाम के नए कांग्रेसी ब्रांड की तोड़ खोजनी है तो उसे भी नया प्रोडक्ट लॉन्च करना होगा और इसके लिये उसे विचारधारा का नया रैपर लाना होगा और टारगेट आडिंयंस के मुताबिक पार्टी और नये ब्रांड की पोजिशनिंग भी करनी होगी। क्योंकि अगर युग नया है तो अंदाज पुराना क्यों हो।


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