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Loksangharsha: स्वर्ग धरती पे उतरा किए



अश्रु नयनो से ढलका किए
छन्द गीत निकला किए

मन सदा ही भटकता रहा-
भंग अधरों से निकला किए

झूठ दर्पण ने बोला नही-
अपने चेहरे ही बदला किए

प्राण संकट में है और वो-
बिखरी अलके संवारा किए

यूं कुचलो मेरी आस्था-
हम तो सपनो में बहला किए

वस्त्र शव का धूमिल हुआ-
जीव काया ही बदला किए

पीर में मन ये जब-जब लगा -
स्वर्ग धरती पे उतरा किए

डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल 'राही'

Comments

  1. निस्संदेह ग़ज़ल अच्छी है, लेकिन शब्द बोलचाल के होते तो ज्यादा प्रभावी होती.

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आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर

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