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ऐसे भी तो हो सकती है मदद

विनय बिहारी सिंह

हालांकि आजकल जाड़े के दिनों की बातें करना आपको अजीब लग सकता है, लेकिन बात तो की ही जा सकती है। इस विचार से आप भी सहमत हो सकते हैं। क्या है यह ? हर रोज किसी गुल्लक में एक रुपए जमा करें। जब जाड़े का दिन आए तो उससे एक कंबल खरीदें औऱ रात को टहलते हुए सड़क पर निकल जाएं। किसी ठिठुरते अनजाने व्यक्ति या स्त्री या बच्चे को उस कंबल से ढंक कर चुपचाप वापस आ जाएं। फिर अपने कमरे में आ कर आराम से सो जाएं। मैं कोलकाता के एक आदमी को जानता हूं जो हर एक साल बाद यह काम करता है। हालांकि इस साल कोलकाता में बिल्कुल ही जाड़ा नहीं पड़ा। इसलिए ठिठुरने वाली बात इस साल हुई नहीं। इस आदमी को गुल्लक में पैसे जुटाने की जरूरत नहीं पड़ती। उसके पास पर्याप्त धन है। जब कड़ाके की ठंड पड़ती है तो वह एक साथ दस कंबल खरीदता है और अपनी कार में उसे डाल कर रात के बारह बजे निकल पड़ता है। किसी भी जगह किसी को ठिठुरते देख वह चुपचाप उसे नया कंबल उढ़ा कर वापस आ जाता है। वह कहता है- मुझे यह काम करके बड़ा आनंद आता है। सुबह जब वह आदमी खुद को नया कंबल ओढ़े हुए देखता होगा तो कितना खुश होता होगा। मुझे उसकी यह बात सुखद लगी। ऐसे काम कर भी तो सुख पाया जा सकता है।

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