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नकारात्मक मतदान और कम वोटिंग ने उड़ाई नेताओं की नींद

सतीश कुमार सिंह
श्री सतीश कुमार सिंह भारतीय स्टेट बैंक में वरिष्ठ प्रबंधक हैं। इन दिनों वे मध्यप्रदेष के विदिषा जिले में कार्यरत हैं। पिछले एक वर्ष से स्वतंत्र लेखन कर रहे सतीष कई वर्षों तक मुख्यधारा की पत्रकारिता में भी सक्रिय रहे हैं। सन् 1995 में भारतीय जनसंचार संस्थान , दिल्ली से हिन्दी पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के बाद 1999 तक प्रिंट मीडिया से जुड़े रहे। इस दौरान दैनिक हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, ्प्रभात खबर, हिन्दुस्तान टाईम्स इत्यादि अखबारों के लिए काम किया। सन् 2000 में परीवीक्षाधीन अधिकारी के रुप में भारतीय स्टेट बैंक समूह से जुड़ गए। सतीश से संपर्क murwasman@gmail.comया फिर 09993035479 के जरिए किया जा सकता है।


15 वें लोकसभा में नकारात्मक मतदान और कम वोटिंग के कारण नेताओं की हालत पतली है। उनके सारे समीकरण बिगड़ते नजर आ रहे हैं। मध्यप्रदेष में प्रथम और द्वितीय चरण का मतदान हो चुका है। पर वोटिंग का प्रतिषत दोनों चरणों को मिला करके बमुष्किल 50 फीसदी तक के आस-पास ही पहुँच सका है। इस लोकसभा चुनाव में लगता है मतदाताओं का गुस्सा एकदम से फूट पड़ा है। लगभग सभी मतदाता मतदान से परहेज कर रहे हैं। लुभावने वादे और प्रलोभन मतदाताओं पर प्रभाव डालने में असफल रहे हैं। हालाँकि राजनीतिक दलों को बदलते परिवेष ने चिंता में जरुर डाल दिया है। फिर भी सुधरने के पक्ष में वे नहीं हैं। आज उनको दो चिंता खाए जा रही है। पहली चिंता तो उनकी नकारात्मक वोटिंग की है और दूसरी कम मतदान की।भारत का दिल कहे जाने वाले मध्यप्रदेष में प्रथम चरण का मतदान नकारात्मक वोटिंग के नाम रहा। मतदाता पोलिंग बूथ तक तो जरुर गये, लेकिन उन्होंने नकारात्मक मतदान करना ही उचित समझा। नकारात्मक वोटिंग का निहितार्थ नेताओं के लिए कुनैन की गोली के समान है। वे इस मतदान को कभी भी मीठी गोली नहीं समझ पायेंगे। क्योंकि यह उनकी योग्यता और विष्वसीनयता पर प्रष्नचिन्ह लगाता है।अगर इसको परिभाषित किया जाए तो इसका आषय यह है कि जो भी प्रत्याषी चुनाव के मैदान में हैं , वे मतदाताओं के मतानुसार सही और योग्य उम्मीदवार नहीं हैं। मध्यप्रदेष में प्रथम चरण के मतदान में नकारात्मक मतदान करने वाले कुल वोटर 1413 थे।इस मामले में खजुराहो संसदीय क्षेत्र के मतदाता सबसे आगे रहे। इस संसदीय क्षेत्र में नकारात्मक मतदान डालने वाले 712 वोटर थे। इसी क्रम में भोपाल संसदीय क्षेत्र दूसरे नम्बर पर था। इस संसदीय क्षेत्र में 418 मतदाता ऐसे थे जिन्होंने नकारात्मक मतदान किया था। अन्य संसदीय क्षेत्रों में जहाँ नकारात्मक मतदान पड़ा उनमें छिंदवाड़ा, बैतुल, बालाघाट, षहडोल, मंडला, जबलपुर एवं सतना का नाम प्रमुख है। इस संबंध में यह भी कहना समीचीन होगा कि प्रथम चरण में मध्यप्रदेष में कुल 13 सीटों के लिए मतदान हुआ था और कमोबेष सभी 13 संसदीय क्षेत्रों में नकारात्मक वोटिंग हुई थी। यह निष्चित रुप से नेताओं और राजनीतिक पार्टियों के लिए गंभीर झटका और चिंता का विषय है। दूसरी ध्यान देने वाली महत्वपूर्ण और आष्चर्यजनक तथ्य इस संबंध में यह है कि नकारात्मक वोटिंग अधिकांषतः मध्यप्रदेष के ग्रामीण, खास करके आदिवासी या जनजातीय बहुल इलाकों में ज्यादा देखने को मिला है। दूसरे चरण में हुए मतदान के दौरान कितने नकारात्मक वोटिंग हुए, इसका आंकड़ा फिलहाल उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन इसका मतलब यह कदापि नहीं है कि दूसरे चरण में नकारात्मक वोटिंग नहीं हुए होंगे।ऐसा नहीं है कि नकारात्मक वोटिंग का प्रावधान एक नई परिकल्पना है। वस्तुतः इसका प्रावधान सर्वप्रथम सन् 1961 के लोकसभा चुनाव में किया गया था। तब से बदस्तुर यह प्रावधान हमारे लोकतंत्र में उपस्थित है। किन्तु किसी ने कभी उल्लेखनीय रुप से इसका प्रयोग नहीं किया । दूसरी ध्यान देने वाली बात इस संबंध में यह है कि इस प्रावधान का मूल उद्वेष्य फर्जी मतदान को रोकना था। पहले होता यह था कि अगर कोई मतदाता यदि मतदान नहीं करना चाहता था तो उसके मत का प्रयोग फर्जी तरीके से दूसरे उम्मीदवार के पक्ष में कर दिया जाता था। इस विकल्प के आने से मतदाता के पास एक और विकल्प हो गया। अब वह सही उम्मीदवार के मैदान में नहीं रहने की दषा में नकारात्मक मतदान करके अपना विरोध जता सकता है।हो सकता है मीडिया के प्रभाव और आम मतदाताओं के बीच बढ़ती जागरुकता के कारण आज छोटी-छोटी जगहों के मतदाता भी इस विकल्प को इस्तेमाल करने में हिचक नहीं रहे हैं।वस्तुतः नकारात्मक वोटिंग एक सामान्य प्रक्रिया है, लेकिन नेताओं के स्वास्थ के लिए यह कत्तई सामान्य नहीं है। क्योंकि चुनाव कानून की धारा 49(0) के अंतगर्त डाले गये नकारात्मक वोट यह सोचने पर जरुर मजबूर करते हैं कि क्यों और किस परिस्थिति में नकारात्मक वोट डाले गये। नकारात्मक वोटिंग करने का अर्थ वास्तव में बहुत ही गंभीर है। इसका साफ अर्थ यह है कि मतदाता प्रत्याषी के कार्यकलापों से खुष नहीं है। उसके वादे उसे खोखले और आधारहीन लगते हैं। दूसरे षब्दों में मतदाता यह मान चुका कि सभी उम्मीदवार जो चुनावी मैदान में खड़े हैं ,वे सिर्फ झूठ और झूठ के सिवाय कुछ नहीं बोलते हंै।इस तरह की स्थिति क्यों उत्पन्न हो रही है? यह नेताओं को जरुर सोचना चाहिए। आज की तारीख में कोई भी राजनीतिक दल ऐसा नहीं है, जिसके उम्मीदवार दागी न हों। सच तो यह है कि बिना बाहुबली के राजनेता अपनी नैया चुनाव की वैतरणी में पार ही नहीं लगा सकते। आज कोई भी सांसद अपने सांसद कोष का उपयोग आम जन के कल्याण के लिए नहीं करता है। चुनाव खत्म होने के बाद नेताओं के दर्षन ही दुर्लभ हो जाते हैं। अगर वाकई में नेतागण सरकारी कोष का उपयोग निजी फायदे के बजाए जन कल्याण में करें तो न तो उनकी संपत्ति 5 सालों में दोगुनी होगी और न ही स्वीस बैंक में उनका काला धन दिन प्रति दिन सुरसा के मुख की तरह बढ़ता जाएगा। साथ ही भारत के लिए विकासषील देष से विकसित देष बनने का रास्ता भी प्रषस्त हो जाएगा।इस संदर्भ में विदिषा संसदीय क्षेत्र का उल्लेख करना प्रासंगिक होगा। कभी विदिषा संसदीय क्षेत्र अटल बिहारी बाजपेयी का चुनाव क्षेत्र था। बावजूद इसके विदिषा में विकास ने कितनी लंबी छलांग लगाया है? यह किसी से छुपा नहीं है। वर्तमान समय में विदिषा और विदिषा की जनता दोनों के हालत अच्छे नहीं हैं। 15वें लोकसभा चुनाव में भाजपा से सुषमा स्वराज उम्मीदवार हैं। वोटिंग हो चुकी है। चुनाव विष्लेषकों की बातों पर यदि यकीन किया जाये तो उनका जीतना लगभग तय है। अब देखना है कि श्रीमती स्वराज विदिषा और विदिषा की जनता के लिए क्या करती हैं?मानो या न मानो, नेताओं के लिए खतरे की घंटी अवष्य बज चुकी है। अगर समय रहते वे नहीं चेतते हैं तो नकारात्मक वोटिंग उनके उज्जवल भविष्य के बीच निष्चित रुप से फांस बन जायेगा। अभी भी समय है सभी नेतागण सकारात्मक रुप से इस समस्या का हल निकालने के बरक्स अपने आदतों को बदलने का प्रयास करें और साथ ही गंभीरता पूर्वक अपने घर की तरह पूरे देष में आमूलचूल परिवर्तन लाने की दिषा में सदैव अग्रसर रहें। राजनीति कोई सेवा क्षेत्र नहीं है। सेवा करना है, लेकिन अपना नहीं। जनता का। इसलिए एक अच्छे प्रत्याषी का राजनीति में आना बहुत जरुरी है। 15वें लोकसभा चुनाव में 850 से ज्यादा उम्मीदवार ऐसे हैं जो करोड़पति हैं। इनके पास अकूत संपत्ति है। बहुत सारे उम्मीदवार उघोगपति हैं। वे जनता की सेवा कितना कर पायेंगे? यह भी देखने की चीज होगी। सच कहा जाये तो राजे-महाराजे तो चले गये, लेकिन इनकी जगह आज नेताओं ने ले ली। न तो पहले राजे-महाराजों को जनता की फिक्र थी और न आज नेताओं को है। जो भी हो आज नकारात्मक वोटिंग और नेताओं के ऊपर जूता फेंकने के विकल्प के रुप में जनता के हाथ में एक ऐसा हथियार आ गया है जो देर -सबेर कारगार तो जरुर सिद्व होगा। बेषर्मी अब ज्यादा देर काम नहीं कर सकती। सच का सामना नेताओं को करना ही होगा।30 अप्रैल को अंतिम चरण का मतदान भी मध्यप्रदेष में खत्म हो गया। देष के दूसरे हिस्सों की तरह ही इस प्रदेष में भी बहुत ही कम मतदान हुआ है। पहले चरण के मतदान में वोटिंग प्रतिषत प्रदेष में 51फीसदी रहा तो वहीं दूसरे और अंतिम चरण के मतदान में भी मतदान का प्रतिषत अमूमन इसी के आस-पास रहा। प्रथम चरण के मतदान में कुल 13 संसदीय क्षेत्रों के लिए मतदान हुआ था। पर 13 संसदीय क्षेत्रों में से 5 संसदीय क्षेत्र ही ऐसे थे जहाँ 50 फीसदी से ज्यादा मतदान हुए थे। दूसरे चरण के मतदान में हालाँकि रातनीतिक दलों और उनके कार्यकत्र्ताओं ने खूब जोर लगाया था, मतदाताओं को मतदान केन्द्र तक लाने के लिए। फिर भी 16 संसदीय क्षेत्रों में से 12 संसदीय क्षेत्रों में मतदान का प्रतिषत 50 फीसदी से भी कम रहा। इसतरह दोनों चरणों के मतदान को मिलाकर कुल 29 संसदीय क्षेत्रों में मतदान हुआ और 29 में से 19 संसदीय क्षेत्रों में 50 फीसदी से कम मतदान हुआ। उल्लेखनीय है कि मध्यप्रदेष में कुल 29 संसदीय सीट ही हैं। वैसे तो सभी राजनीतिक दल गर्मी को कम मतदान का कारण मान रहे हैं। हो सकता है कि कुछ हद तक उनका आकलन सही हो। पर मोटे तौर पर राजनीतिक दलों और नामचीन नेताओं का करिष्मा धीरे-धीरे लुप्त हो रहा है। मध्यप्रदेष में न तो सुषमा स्वराज मतदाताओं को मतदान करने के लिए प्रेरित कर पाईं और न ज्योतिरादित्य सिंधिया। सुषमा स्वराज का प्रसिद्व नारा ”पहले मतदान फिर जलपान“ मतदाताओं के ऊपर कोई खास प्रभाव नहीं डाल सका। इस मामले में आष्चर्यजनक रुप से ग्वालियर में मतदान का प्रतिषत मात्र 36 फीसदी रहा। जबकि वहाँ से भाजपा की तरफ से यषोधरा राजे सिंधिया चुनाव मैदान में थीं। सागर संसदीय क्षेत्र से कांग्रेस के प्रसिद्व हाॅकी खिलाड़ी असलम षेर खान खड़े थे। बावजूद इसके इस संसदीय क्षेत्र में भी कुल 39 फीसदी मतदान हुआ।दोनों चरणों के मतदान के दौरान तकरीबन पूरे प्रदेष में 24 मतदान केन्द्रों में मतदान का बहिष्कार किया गया। मतदान के बहिष्कार का मूल कारण पूर्व के सांसदों या चुनाव में खड़े विविध प्रत्याषियों द्वारा जीवन के लिए जरुरी बुनियादी जरुरतों को उपलब्ध नहीं कराना था।मध्यप्रदेष में मतदान का दौर खत्म होने के साथ ही षांतिपूर्ण ढंग से चुनाव सम्पन्न कराने का श्रेय चुनाव आयोग को निष्चित रुप से दिया जा सकता है। क्या चुनाव आयोग की तरह की कोई संस्था नेताओं के मन मस्तिष्क का षुद्वीकरण नहीं कर सकता? रात के बाद सुबह के आने की आषा तो की ही जा सकती है।सच कहा जाये तो नकारात्मक वोटिंग और मतदाताओं के मन में मतदान के प्रति उदीसीनता और उनके प्रति गुस्सा, दोनों में चोली दामन का रिष्ता है। वस्तुतः अब धीरे-धीरे मतदाता वर्तमान स्थिति से ऊब चुके हैं। वे जानते हैं कि सभी समस्याओं का जड़ हमारे राजनेता ही हैं। उनके कारण ही पूरी व्यवस्था सड़ चुकी है। उम्मीद की कोई किरण नज़र नहीं आती। सत्ता मिलने के बाद सभी अपने वायदे भूल जाते हैं। कभी दलितों की पार्टी मानी जाने वाली बहुजन समाज पार्टी, आज करोड़पति उम्मीदवारों को टिकट देने के संबंध में तीसरे नम्बर की पार्टी है। तस्वीर साफ है। अब आप जनता को और ज्यादा बेवकूफ नहीं बना सकते। अगर अक्ल है तो संकेत समझ जाओ। नही ंतो चिंगारी कब जंगल की आग बन जायेगी, पता भी नहीं चलेगा।आगे पढ़ें के आगे यहाँ

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