Skip to main content

Loksangharsha: मुक्तक

मुक्तक


ताप से तप से कभी-
राग से रस से कभी-
जीवन विसंगतियों भरा -
राम से रब से कभी॥

तुम मिलो जिंदगी दीप वन जल उठे ।
अश्रु की धार में प्यार भी पल उठे ।
भावना के सलोने मधुर दे बता-
तुम मिलो जिंदगी गीत में ढल उठे॥

तूलिका सी वरौनी सजाये हुए।
भेद भरे नैन सपने संजोय हुए।
कोर काजर ह्रदय पर करे घात यों-
जैसे मुनि मेनका में समाये हुए॥

लाल अंधेरो में मोती सजाये हुए।
नासिका सुकू सी गर्दन झुकाए हुए।
चैन छीना है मादक कपोलो ने यों-
जैसे राधा ठगी दृग लगाये हुए॥

डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल 'राही'

Comments

  1. लाल अंधेरों में मोती सजाएँ है
    इन शब्दों ने दिल जीत लिया !

    ReplyDelete
  2. लाल अंधेरों में मोती सजाएँ है
    इन शब्दों ने दिल जीत लिया !

    ReplyDelete
  3. इतना सुंदर लिखे हैं आप की दिल खुश हो गया! तितली का फोटो भी खूब लगाया है आपने! आप एक बहुत ही उंदा लेखक और कवि है!

    ReplyDelete

Post a Comment

आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर