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अतुल्य भारत का अतुलित काला धन

प्रेम शुक्ल
प्रेम शुक्ल जी की लेखन शैली और विचारधारा देश हित की रही है और इनके लेख तीरों की तरह कार्य करते है.प्रेम जी ने यह लेख विस्फोट डॉट कॉम के लिए लिखा है जिसे हम साभार यहाँ प्रकाशित कर रहे है.आपकी राय आमंत्रित है
मुंबई से प्रकाशित हिन्दी सामना के कार्यकारी संपादक। पिछले 20 सालों से पत्रकारिता। पत्रकारिता के साथ ही मुबंई में हिन्दीभाषी समाज के विभिन्न सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रिय.

प्रोफेसर पटनायक के अनुसार यदि प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 2400 कैलोरी आहार का मापदंड माना जाए तो ग्रामीण भारत का लगभग 80 फीसदी निवासी गरीब है। यदि प्रति व्यक्ति प्रति दिन 2200 कैलोरी आहार मापदंड भी माना जाए तब भी 70 फीसदी लोग गरीबी रेखा के नीचे रहते हैं। दूसरी ओर इसी `अतुल्य भारत´ का 25 से 70 लाख करोड़ रूपए कालेधन के रूप में विदेशों में जमा होता है। देश में बसने वाले लगभग सवा लाख लोगों के पास 440 बिलियन डॉलर की जायदाद है। ये अकूत जायदाद और कालाधन कहां से लाया गया?
भारतीय जनता पार्टी के नेता और प्रतीक्षारत प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने वचन दिया है कि यदि केंद्र में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार आई तो वे विदेशी बैंकों में जमा कालाधन वापस ले आएंगे। भाजपा का मानना है कि विदेशी बैंकों में लगभग 2500000 करोड़ का कालाधन जमा है। भाजपा की इस मांग पर सकारात्मक सहयोग की बात करने की बजाय वर्तमान सरकार का नेतृत्व करने वाली कांग्रेस उसका मजाक उड़ाने पर उतारू हैं। आर्थिक विशेषज्ञ और कांग्रेस के प्रचार समूह के कर्ता-धर्ता जयराम रमेश इसे भाजपा की कपोल कल्पना कह रहे हैं। हालांकि प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह पिछले दिनों लंदन में समूह-20 के जिस सम्मेलन में हिस्सेदारी करने गए थे वहां आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओईसीडी) ने भी टैक्स हैवेंस (कर स्वर्ग) में छिपाए गए कालेधन को बाहर लाने पर व्यापक चर्चा की। अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन जैसे देश कालेधन को बाहर लाकर पश्चिमी देशों को मंदी की मार से बचाने के लिए प्रयासरत हैं। ऐसे में भारत जैसे देश में सत्तारूढ़ दल का कालेधन पर मौन आश्चर्यजनक है। वैसे कालेधन का अध्ययन करने वाली वैश्विक एजेंसी `ग्लोबल फाइनेंशियल इंटिगि्रटी´ (जीएफआई) के प्रमुख रेमंड बेकर का मानना है कि सन् 2002 से 2006 की कालावधि में भारत से प्रतिवर्ष औसतन 27.3 बिलियन डॉलर की राशि विदेशी बैंकों में पहुंची। इस आधार पर अर्थवेत्ता मानते हैं कि पिछले 60 वर्षों की कालावधि में लगभग 70 लाख करोड़ रुपयों की राशि विदेशी बैंकों में जमा हुई होगी। इस राशि की तुलना में भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी केवल 25 लाख करोड़ रूपयों की बात कर रहे हैं। इस पर जयराम रमेश या डॉ. मनमोहन सिंह को गंभीर होने की बजाय इस मुद्दे का मजाक उड़ाने का क्या औचित्य?एक तरफ कांग्रेस अपने घोषणापत्र में गरीबों को सस्ता चावल और मजदूरों को साल में सौ दिन तक मजदूरी देने का वादा करती है। भूखे को रोटी देने की बात तो चल रही है, पर भूख का स्थायी इलाज ढूंढ़ने से वह कतराती है। रेमंड बेकर का जीएफआई प्रतिवर्ष खरबों रूपए का कालाधन विदेशी बैंकों में जमा होने की बात करता है। ये कालाधन कहां से उपजता है? इसी देश के गरीबों का खून चूसकर। कांग्रेस सरकार 9 फीसदी की आर्थिक दर दिखाकर जिस `अतुल्य भारत´ के निर्माण की बात कर रही है, उस अतुल्य भारत का समृद्ध वर्ग गरीबों का खून किस कदर चूस रहा है क्या इसकी खबर जयराम रमेश और डॉ. मनमोहन सिंह को है? `अतुल्य भारत´ के योजना आयोग ने वर्ष 2004-2005 में दावा किया था कि इस देश में 30.1 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे रहते हैं। योजना आयोग के इस सरकारी आंकड़े का प्रोफेसर उत्सा पटनायक पोस्टमॉर्टम करती हें। प्रोफेसर पटनायक के अनुसार यदि प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 2400 कैलोरी आहार का मापदंड माना जाए तो ग्रामीण भारत का लगभग 80 फीसदी निवासी गरीब है। यदि प्रति व्यक्ति प्रति दिन 2200 कैलोरी आहार मापदंड भी माना जाए तब भी 70 फीसदी लोग गरीबी रेखा के नीचे रहते हैं।
दूसरी ओर इसी `अतुल्य भारत´ का 25 से 70 लाख करोड़ रूपए कालेधन के रूप में विदेशों में जमा होता है। देश में बसने वाले लगभग सवा लाख लोगों के पास 440 बिलियन डॉलर की जायदाद है। ये अकूत जायदाद और कालाधन कहां से लाया गया? वर्ष 2003-04 में केंद्र सरकार ने सोलह राज्यों को 140 लाख टन खाद्यान्न गरीबों को राशन बांटने के लिए आबंटित किया था। इसमें गरीबों को मिला कितना? केवल 59 लाख टन अनाज दुकानों तक पहुंचा। गरीबों को इसमें से भी कुछ काट कर ही मिला होगा। 81 लाख टन खाद्यान्न बीच रास्ते से ही गायब हो गया। बिहार और पंजाब में तो यह स्थिति और खराब पाई गई। इन दोनों राज्यों में आबंटित खाद्य का तीन-चौथाई हिस्सा दुकानदारों, आपूर्ति अधिकारियों और दलालों ने खा-पी लिया। सीधी सी बात है कि सिर्फ खाद्य आपूर्ति मंत्रालय में अरबों रूपयों का कालाधन पैदा हुआ। अफसर-नेता-व्यापारी की यह तिकड़ी सिर्फ खाद्यान्न पचाकर नहीं अघाई। सरकारी हिसाब बताते हैं कि वर्ष 2002-04 में भारतीय खाद्य निगम को ढुलाई के दौरान 556 करोड़ रूपए का नुकसान हुआ। निगम ने अपना भंडारण नुकसान 842 करोड़ रूपयों का बताया। गरीबों का माल अमीरों और ठगों का नेटवर्क किस सफाई से पचाता है यह समझने के लिए सरकार द्वारा अप्रैल 2008 में लोकसभा में की गई एक स्वीकारोक्ति ही काफी है। सरकार ने स्वीकारा था कि गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों के नाम पर फर्जी लाल राशन कार्ड पूरे देश में 3.7 करोड़ पाए गए। यानी कुल जारी राशन काडो± में लगभग 35 फीसदी कार्ड फर्जी पाए गए। योजना आयोग जिस वर्ष 6.52 करोड़ परिवारों को गरीबी रेखा के नीचे मानता है, उसी वर्ष सरकार का खाद्य आपूर्ति मंत्रालय 10.28 करोड़ लाल राशन कार्ड बांटता है। सीधा मतलब है कि सरकार में बैठे लोग ऊपर से नीचे तक अवैध कमाई करने में जुटे होते हैं। इस सच्चाई को भी नहीं नकारा जा सकता कि इस देश में लाखों सचमुच के गरीबों को लाल राशन कार्ड नहीं मिलता।
इंदिरा गांधी सत्तर के दशक में `गरीबी हटाओ´ का नारा दे रही थीं। 40 साल बाद गरीबी को हट जाना चाहिए था। कहां हटी गरीबी? अब दस में 8 लोग गरीब हों तो `दमकते भारत´ की बात करना भी बेमानी है। बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन `स्लमडॉग करोड़पति´ को मिली प्रतिष्ठा पर नाराज हुए। उन्हें मुंबई की झुग्गी में जिंदगी बितानेवालों की दास्तां बयान करने वाली फिल्म `शाइनिंग इंडिया´ की बदनामी करने वाली लगी। जिस देश की अधिकांश आबादी गरीबी रेखा के नीचे बसर कर रही हो तो दुनिया उसकी गरीबी को बगल कर अमीरी देख कैसे पाएगी? हमारे अर्थवेत्ता पश्चिम की ओर मुंह बाए खड़े हैं कि उनकी कृपादृष्टि होगी तो हमारी गरीबी दूर होगी। वे सच्चाई को समझने के लिए तैयार नहीं कि उपभोक्तावाद की नाव पर सवार होकर अमेरिका जिस बाजारवाद की दरिया पार कर रहा था, आज वह खुद उस बाजार की मंदी के मगर का ग्रास बना पड़ा है। वषो± तक अपने कोढ़ को छुपाते आए अमेरिका को आखिर स्वीकार करना पड़ा है कि वह खुद गहरे आर्थिक संकट में दबा पड़ा है। अमेरिका के फंसने से विश्व ग्राम बनने में सिकुड़ चुकी पृथ्वी भी सकते में आ चुकी है। अमेरिका दुनिया की आर्थिक भूख को ढेर सारा ईंधन देते आया है। अमेरिका के बैंकों और निवेशकों ने दुनियाभर में अपने निवेश फंसा रखे हैं। अमेरिकी बैंक और निवेशक जिस तरह से डूबे हैं, स्पष्ट है उसका विश्वव्यापी असर पड़ा है। अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा उपभोक्ता देश है, वह दुनिया से तमाम उत्पाद खरीदता रहा है। अमेरिका के बैठते ही दुनिया को झटका लगना स्वाभाविक है। इसलिए अमेरिका मंदी से बाहर आए यह चिंता पूरी दुनिया की है। अखिल विश्व की संयुक्त अर्थव्यवस्था को मंदी से उबारने के लिए 12 बिलियन डॉलर का स्टिमूलस पैकेज दिया जा चुका है, फिर भी मंदी बरकरार है। अमेरिका के अब तक 41 बैंक ढह चुके हैं। मार्च के पहले सप्ताह में चीनी प्रधानमंत्री ने एक सार्वजनिक वक्तव्य दिया कि उन्हें फिक्र है कि अमेरिकी सरकार की वित्तीय प्रतिभूतियों में फंसे 1 ट्रिलियन डॉलर की राशि कहीं डूब न जाए। अमेरिकी राष्ट्रपति को तत्काल बयान जारी करना पड़ता है कि उनकी प्रतिभूतियां अभी भी बेहद पुख्ता हैं। चीन के इस पैंतरे के बाद अमेरिका कालेधन के खिलाफ अपनी मुहिम तेज कर देता है। जीएफआई का अध्ययन बताता है कि सन् 2006 में विकासशील देशों से 858.6 बिलियन डॉलर से 1.06 ट्रिलियन डॉलर की राशि बाहर गई है। इस हिसाब से यदि कालाधन बाहर आ जाए तभी मंदी से पार पाया जा सकता है। भारत सरकार को मंदी के साथ-साथ कालाधन देश में लाकर गरीबी के स्थायी इलाज का भी प्रबंध सोचना चाहिए। पर क्या यह संभव है? फिलहाल इसका उत्तर नकारात्मक है।
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Comments

  1. प्रेम जी यह लेख बहुत पसंद आया
    देश की समाप्ति को बापिस लाना ही होगा

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  2. लाल कृष्ण आडवानी जी ने बचन दिया है की बह कालाधन बापस ले आयेंगे
    लेकिन इस पर यकीन कैसे किया जा सकता है,महज चुनावी वादा भी हो सकता है
    कैसे यकीन करें और क्यों यकीन करें

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  3. प्रिय मित्र,
    आपकी रवनाएं पठनीय व संग्रह योग्य हैं। मैं एक साहित्यिक पत्रिका का संपादक हूं। आप चाहे तो अपनी रचनाओं को प्रकाशन के लिए भेज सकते हैं। मेरे ब्लाग पर अवश्य ही विजिट करें।
    अखिलेश शुक्ल्
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    http://katha-chakra.blogspot.com
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    http://world-visitor.blogspot.com

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  4. काला धन बापिस कैसे आएगा क्योंकि वो आखिर है तो हमारे पूजनीय भ्रस्त नेताओं का ही

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  5. काला धन बापिस कैसे आएगा क्योंकि वो आखिर है तो हमारे पूजनीय भ्रस्त नेताओं का ही

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  6. अच्छा लिखा है
    प्रेम जी ने......मुद्दा लेकिन राजनीतिक बनता जा रहा है

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--- संजय सेन सागर

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