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गुलामों की बस्ती में

गुलामो की बस्ती में थे हम
पर गुलामी से लड़ पड़े थे हम
नामंजुर था गुलाम बनना
करते गए ख़ुद को फना हम......................
उसकी चाहत थी ऐसी की
ख़ुद को मिटटी बनाया
एक आखरी आगोश ने उसके
दुश्मनों का मिटटी पालित कराया.........................
थर्राने लगे थी उनके कदम
जब हमने कदम बढाया
ये अफसाना भी तो देखो
चाहत ने मेरे अपना फ़र्ज़ निभाया..........................
उसकी चाहत की तो हिम्मत थी
एक कदम पर हम न घबराए
धर दबोचा उन न पाखो को
सीमा सा बहार फिक्वाया.......................................
जान न्योछावर करते गए हम
और कदम भी न पीछे हटाया
उनकी चाहत में तो हमने
हर दिन को दिवाली बनाया.........................
देवाने थे हम उनके दीवानेपन
आजादी का पागलपन चाय था हर आंगन माँ
शोक न था हमें खोने का
क्यूंकि खो कर भी हमने
कुर्बानी को उनके
आत्मविश्वास बनाया.......................................

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आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर

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