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मुक्तक संजीव 'सलिल'

*************************'सलिल' में प्रतिबिम्ब देखे, निष्पलक होकर मगन.
खन-खन, छम-छम तेरी आहट, हर पल चुप रह सुनता हूँ।
आँख मूँदकर, अनजाने ही तेरे सपने बुनता हूँ।
छिपी कहाँ है मंजिल मेरी, आकर झलक दिखा दे तू-
'सलिल' नशेमन तेरा, तेरी खातिर तिनके चुनता हूँ।
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बादलों की ओट में महताब लगता इस तरह
छिपी हो घूँघट में ज्यों संकुचाई शर्मीली दुल्हन।
पवन सैयां आ उठाये हौले-हौले आवरण-
'सलिल' में प्रतिबिम्ब देखे, निष्पलक होकर मगन।
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आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर

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