Skip to main content

पापा मैं स्कूल नहीं जाउंगी........!!


अभी-अभी अपनी छोटी बिटिया मौली को स्कूल छोड़कर रहा हूँ,जिसे दस दिनों पहले ही स्कूल में दाखिल किया है....उसकी उम्र ढाई साल है....और रोज--रोज स्कूल के दरवाजे पर पहुँचते ही इतना रोटी है कि उसे वापस घर ले आने को मन करता है....और तक़रीबन सारे ही बच्चे स्कूल के गेट के एब सम्मुख आते ही जोरों से चिंघाड़ मारना शुरू करते हैं....और सारा माहौल ही रुदनमय हो जाता है...कितनी ही माताओं की आँखे नम हो जाती हैं....और कुछ को तो मैंने बच्चों को छोड़कर गेट पर ही रोते हुए भी देखता हूँ....ख़ुद मेरी भी आँखे कुछ कम नहीं नम होती...मगर बच्ची को स्कूल जाना है तो जाना है...अब चाहे रोये...चीखे या चिल्लाए....अपना दिल काबू कर उसे रोता हुआ छोड़कर अपने को रोज वापस जाना होता है......!!
सवाल बच्चे द्वारा नई जिन्दगी की शुरुआत का नहीं है....मेरे लिए सवाल बच्चे की उम्र का है...जो दो से ढाई साल का है...यहाँ तक कि बहुत से शहरों में तो ग्यारह-ग्यारह महीनों के बच्चे भी स्कूल में लिए जा रहे हैं...और उनके कामकाजी माता-पिता कितनी राजी-खुशी उन्हें स्कूल छोड़कर बड़े आराम से अपने काम को रवाना हुए जा रहे हैं.... और फिर बच्चा स्कूल से वापस दाई या नौकर के साथ लौटता है....और फिर माँ-बाप के वापस लौटने तक उन्ही के साथ अकेला या किसी की किस्मत अच्छी हुई तो किसी पार्क आदि में खेलने का मौका मिल जाता है.... जबकि हमने शायद छः या सात साल में स्कूल का स्वाद चखा था...उस उम्र में में भी हम,मुझे याद आता है कि हम रोया करते थे....और कई बार मन नहीं करता था तो माँ-बाप हमें स्कूल जाने से रोक भी दिया करते थे....माँ-बाप द्बारा दिया गया यह प्रेम आज भी उनके प्रति अथाह सम्मान के रूप में हमारे ह्रदय में कायम है....और कभी भी हम उनकी अवज्ञा करने की हिमाकत नहीं करते....और जहाँ तक किसी समस्या पर अपने विचारों और दुनिया की वस्तुस्थिति से उनको अवश्य रु--रु कराते हैं.....अपने प्रेम को हमने अपनी माँ को इसी तरह समझाकर विवाह का जामा पहनाया था.....अलबत्ता झगडे तो कहाँ नहीं होते.....!!
लेकिन ये सब लिखने का कारण यह है कि ढाई साल से बच्चे से हम आख़िर चाहते क्या हैं....सवेरे इक बेहद ही गहरी और प्यारी नींद में सोये बच्चे को जबरन उठाना(ध्यान रहे कि उसकी उम्र कितनी है....!!!!!)और कभी धक्के मार कर कभी बहलाकर उसे तैयार करना....और रोते हुए ही उसे स्कूल को रवाना कर देना.....बेशक हम अपना अतीत नहीं देखते....हमने शायद सात साल की उम्र में पढ़ना शुरू किया....तो क्या हमारे ज्ञान में कोई कमी रह गई है....या किसी भी इंसान से हम कमतर इंसान हो गए हैं....!!
बच्चा अगर ढाई-तीन की उम्र से स्कूल ना जाकर चार-पाँच साल की उम्र में स्कूल जाए तो इसमें हर्जा क्या है.....??ये शुरू के बरस वो घर और उसके आस-पास खेलता रहकर और घर में ही खेलता-खाता हुआ बिना एग्जाम की जहमत उठाये हुए कुछ सीख-साख ले तो इसमें हर्जा क्या है.....??ढाई साल का इक बच्चा दुनियादारी कुछ सालों बाद ही सीख ले इसमें हर्जा क्या है.....??और अंत में एक बात यह भी कि हम अपने बच्चों से आख़िर चाहते क्या हैं.....????..........अपनी इच्छा से जो महत्वाकांक्षा उन्हें हम सौंपते है......आप मानिए या मानिए....जब वो कुछ बनने के लिए प्रोफेशनल बनाना शुरू करते हैं.....तो शायद उनकी नज़र में हम उनके माँ-बाप तो क्या,इक अजनबी से ज्यादा कुच्छ नहीं रह जाते....बेशक हम तब ता-जिन्दगी उनकी बेदर्दी को लेकर ता-जहाँ कलपते रहे...
जो हम रोपते हैं....वही हम पाते हैं.....हम बच्चे को ढाई साल से ही ख़ुद से दूर करना शुरू कर देते हैं....तो बच्चे से यह तनिक भी उम्मीद ना करे कि आने वाले समय में वो हमारे पास फटक पायेगा....या कि हमसे जुदा हुआ रह पायेगा....दोस्तों....बहुत-सी बातों पर हम विचार ही नहीं करते या सिर्फ़ विचार करके ही रह जाते हैं...उनके परिणामों की बाबत सोचना शायद हमारे बूते के बाहर होता है.....या किसी दबाव में हम जाते हैं.....जैसे अपनी ढाई साल की छोटी-सी बच्ची को डाला है मैंने स्कूल में अपनी घरवाली के दबाव में.....अपनी पिछली बच्ची प्राची की तरह......!!

Comments

  1. राजीव जी अच्छा लिखा है
    आपके लेखन में कुछ बात है !

    ReplyDelete

Post a Comment

आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर

Popular posts from this blog

हाथी धूल क्यो उडाती है?

केहि कारण पान फुलात नही॥? केहि कारण पीपल डोलत पाती॥? केहि कारण गुलर गुप्त फूले ॥? केहि कारण धूल उडावत हाथी॥? मुनि श्राप से पान फुलात नही॥ मुनि वास से पीपल डोलत पाती॥ धन लोभ से गुलर गुप्त फूले ॥ हरी के पग को है ढुधत हाथी..

चेतन आनंद/नेपाल-बवाल

समसामयिक लेख- नेपाल का बवाल भारत के लिए खतरा?                   नेपाल का बवाल भारत के लिए कई स्तरों पर खतरा साबित हो सकता है। यह खतरा केवल सीमा सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि कूटनीतिक, आर्थिक, सामरिक और आंतरिक राजनीति पर भी असर डाल सकता है। भारत और नेपाल की खुली सीमा (लगभग 1,770 किमी) से आतंकवादी, माओवादी या अन्य असामाजिक तत्व आसानी से आवाजाही कर सकते हैं। चीन इस स्थिति का फायदा उठाकर नेपाल के माध्यम से भारत पर दबाव बना सकता है। नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता से चीन को अपनी पकड़ मजबूत करने का अवसर मिलता है। चीन की बेल्ट एेंड रोड इनिशिएटिव और अन्य परियोजनाओं से नेपाल में उसकी रणनीतिक स्थिति भारत के लिए चुनौती बन सकती है। सीमा विवाद जैसे लिपुलेख, कालापानी, लिम्पियाधुरा को भड़काकर नेपाल की राजनीति भारत विरोधी हो सकती है। नेपाल में बढ़ती राष्ट्रवादी राजनीति भारत के खिलाफ माहौल बना सकती है, जिससे दोनों देशों के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आर्थिक रिश्ते प्रभावित होंगे। भारत-नेपाल के बीच व्यापार और ऊर्जा परियोजनाएँ बाधित हो सकती हैं। नेपाल में अस्थिरता का अस...