Skip to main content

आम चुनाव के बाद दो फाड़ हो जायेगी भाजपा ?

राहुल गाँधी की युवा ब्रिगेड( भलेही राजनीती में उनका प्रवेश अनुकम्पा के आधार पर हुआ हो ) से मुकाबला करने वाले कौन हैं ? यह भाजपा से लेकर तमाम दलों के लिए यक्ष प्रश्न बना हुआ है ।लेकिन इस सवाल का जबाब ढूंढने के बजायसभी इधर -उधर की बेकार दलील देकर ताल -मटोल करते नज़र आते हैं । इसी सवाल पर बहस के दौरान दिल्ली यूनिवर्सिटी के एक छात्र नेता ने तर्क देते हुए युवा की जगह अनुभव को तरजीह देने की बात कही । कुछ अन्य युवा नेताओं ने उनकी बात का विरोध किया तो वो मुद्दे से भटक कर विचारधारा और हिंदुत्वा को परिभाषित करने लगे । अपनी आधी -अधूरी जानकारी और थोड़े बहुत महापुरुषों के कथन को तोड़- मरोड़ कर लगे भाषण देने । अभी टीवी में राजनाथ जी की भूलने की गाथा देख रहा था जिसमे वो यूपीए की जगह एनडीए , एनडीए की जगह यूपीए का नाम ले रहे थे । क्या यह घटना इनके खोखले युवापन के दावे को नही झुठलाती ?क्या भाजपा को युवाओं को आगे लाने की बात पर गंभीरता से सोच कर अमल करने की आवश्यकता नही है? क्या नरेन्द्र मोदी को अपनी महत्वाकांक्षा की आड़ में रोक कर युवा ब्रिगेड को पाँच साल पीछे नही कर दिया गया ?संगठन में तो वैसे भी ४० पार होने पर युवा की पदवी दी जाती है । ४६ वर्षीय राजीव प्रताप रुढी ,४० -४२ साल के सहनवाज हुसैन , आदि अधेड़ नेता युवाओं की श्रेणी में गिने जाते हैं । खैर इस लोकसभा की बात जाने दीजिये , अगले लोकसभा तक भी राहुल की फौज को टक्कर देने की कोई उम्मीद नही आती । जिस चीज को भाजपा की विशेषता मन जाता था आज वही बात ख़त्म हो रही है । विचारधारा और सुचिता को लेकर तटस्थ होने का दावा करने वाली बीजेपी आज अपने हीं उठाये गए सवालों से घिर गई है । पार्टी का सत्ता प्रेम उबाल कुछ इस कदर मार रहा है कि अपने कैडरों को भी भूलना जायज हो गया है। कुछ ही समय बीते विधानसभा चुनावों मे पार्टी ने दलबदलुओं को जम कर टिकट बाटने का काम किया । सालो तक पार्टी का झंडा उठाने वाले समर्पित कार्य कर्ताओं कि जगह अन्य दलों से बहलाफुसला कर आयातित नेताओ को तरजीह देने से दिनों-दिन कार्यकर्ताओं मे आक्रोश पैदा होना जायज़ है । आंकड़ों पर गौर करे तो ऐसे बाहरी नेताओं कीसंख्या काफी है।युवा नेतृत्व से जी चुराने की बात पर भाजपा के अन्दर भी काफी उथल-पुथल चल रहा है । कुछ लोग तो यहाँ तक कयास लगा रहे हैं कि लोक सभा चुनाव बाद पार्टी दो भागो में बट जायेगी । पार्टी में युवाओं की कमी तो है ही साथं ही रही रही-सही कसार ऊपर के लोगों द्वारा युवाओं की उपेक्षा से पुरी हो जाती है । पहले आर एस एस की विभिन्न सखाओं और परिषद् से विचारधारा के ठोश और पढ़े लिखे युवाओं की इंट्री युवा मोर्चा और भाजपा में हुआ करती थी । परिषद् हो या आर एस एस उनकी हालत आज खस्ता हाल है । इन सब के बावजूद जो थोड़े बहुत युवा यहाँ अपनी जगह तलाशने आते हैं अथवा यूँ ही कहें कि उनके पास कहीं और जाने का विकल्प नही होता , उनको युवा मोर्चे तक में पूछने वाला कोई नही ! परिषद् का परिचय देने पर बड़ी ही दयनीय भाव से देखता हुआ कोई भी ऐरा -गैर सलाह देने लग जाता है ।यह तो मेरे अनुभव हैं जो मैंने अपने आस पास देखा है । अब , आम चुनावों का नतीजा चाहे जो भी हो , अनुभव की बात कह कह कर कब तक युवा नेतृत्वा से जी चुरायेगी भाजपा ?

Comments

  1. लगता तो नहीं है
    अच्छी पार्टी है

    ReplyDelete
  2. lagta hai aapne puri post nahi padhi hai ...............

    ReplyDelete

Post a Comment

आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर

Popular posts from this blog

हाथी धूल क्यो उडाती है?

केहि कारण पान फुलात नही॥? केहि कारण पीपल डोलत पाती॥? केहि कारण गुलर गुप्त फूले ॥? केहि कारण धूल उडावत हाथी॥? मुनि श्राप से पान फुलात नही॥ मुनि वास से पीपल डोलत पाती॥ धन लोभ से गुलर गुप्त फूले ॥ हरी के पग को है ढुधत हाथी..

चेतन आनंद/नेपाल-बवाल

समसामयिक लेख- नेपाल का बवाल भारत के लिए खतरा?                   नेपाल का बवाल भारत के लिए कई स्तरों पर खतरा साबित हो सकता है। यह खतरा केवल सीमा सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि कूटनीतिक, आर्थिक, सामरिक और आंतरिक राजनीति पर भी असर डाल सकता है। भारत और नेपाल की खुली सीमा (लगभग 1,770 किमी) से आतंकवादी, माओवादी या अन्य असामाजिक तत्व आसानी से आवाजाही कर सकते हैं। चीन इस स्थिति का फायदा उठाकर नेपाल के माध्यम से भारत पर दबाव बना सकता है। नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता से चीन को अपनी पकड़ मजबूत करने का अवसर मिलता है। चीन की बेल्ट एेंड रोड इनिशिएटिव और अन्य परियोजनाओं से नेपाल में उसकी रणनीतिक स्थिति भारत के लिए चुनौती बन सकती है। सीमा विवाद जैसे लिपुलेख, कालापानी, लिम्पियाधुरा को भड़काकर नेपाल की राजनीति भारत विरोधी हो सकती है। नेपाल में बढ़ती राष्ट्रवादी राजनीति भारत के खिलाफ माहौल बना सकती है, जिससे दोनों देशों के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आर्थिक रिश्ते प्रभावित होंगे। भारत-नेपाल के बीच व्यापार और ऊर्जा परियोजनाएँ बाधित हो सकती हैं। नेपाल में अस्थिरता का अस...