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चाभी............आरती "आस्था"


जैसे तालों को खोलने के  लिए

होती हैं  चाभियाँ

काश वैसे  ही होती  चाभियाँ

परत-दर-परत  चेहरों  को खोलने के लिए भी

 तब सहज होती

अपने- पराये की पहचान

तब न कदम-कदम पर

छले जाते हम

और न दोष  देते किस्मत  को .............|

Comments

  1. अति सुन्दर क्षणिका -बधाई
    -विजय

    ReplyDelete
  2. आस्था जी बेहद सुन्दर
    आपकी जितनी भी रचनाएँ पडी सबने मुझे प्रभावित किया !
    बहुत अच्छा !

    ReplyDelete
  3. आरती जी अच्छी नज्म
    मजा आ गया

    ReplyDelete
  4. आरती जी,

    आपने चन्द पंक्तियों में गागर में सागर सी बात कह दी| सही कहा आपने |

    वाकई इस ज़माने में किसी को केवल चेहरे से पहचान लेना बहुत मुश्किल है और जब तक इन्सान पहचान लेता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है|

    काश ! ऐसी चाबी होती |

    सलीम खान
    संरक्षक, स्वच्छ सन्देश: हिन्दोस्तान की आवाज़
    लखनऊ व पीलीभीत, उत्तर प्रदेश

    ReplyDelete
  5. bahut gahre bhav...........haqeeqat bayan karti rachna..........kash aisa ho pata.

    ReplyDelete

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आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर

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