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मुक्तक : दोस्त

संजीव 'सलिल'



दोस्त हैं पर दोस्ती से दूर हैं.
क्या कहें वे आँखें रहते सूर हैं.
'सलिल' दुनिया के लिए वे बोझ हैं-
किंतु अपनी ही नजर में नूर हैं.
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दोस्त हो तो दिल से दिल मिलने भी दो.

निकटता के फूल कुछ खिलने भी दो.
सफलता में साथ होते सब 'सलिल'-
राह में संग एडियाँ छिलने भी दो.
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दोस्त से ही शिकवा-शिकायत क्यों है?
दोस्त को ही हमसे अदावत क्यों है?
थाम लो हाथ तो ये दिल भी मिल ही जायेंगे-
ब ही पूछेंगे 'सलिल' हममें सखावत क्यों है?
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