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चड्डी की हड्डी गले नही उतरती

सारांश यहाँ आगे पढ़ें के आगे यहाँ

पब से बहार किया तो तुमने चड्डी उतारी, गर कल पब जाने से रोक देंगे तो चड्डी पहनना .....
पिछले एक सप्ताह से ज्यादा समय से चिट्ठाजगत इस पिंक चड्डी में समां गया लगता है। मुझे ज्यादा तो नही कहना, पर क्या करूं, लिखने को विवस हो गया। पहली बार मुझे लिखते हुए लेखनी और पत्रकारिता को पेशे के रूप में चुनने का अफ़सोस हो रहा है, बेहतर होता मैं अभियांत्रिकी में ही विकल्प तलाशता।पहले तो हमें यह समझना चाहिए की हमारा कोई भी कदम , हमारी स्वयं की सोच, अभिव्यक्ति और स्वतंत्रता का घोतक है ऐसा मानकर हम मनुष्य कहलाने के अपनी निम्नतम निकृष्टता को छू लेते हैं। अआप आज जहाँ भी है, उसके पीछे आपके समाज , परिवार और पूर्वजों का कितना योगदान रहा है इसे नकार नही सकते। अगर koi इस अथ्य को नज़रंदाज़ karta हैं तो आपसे यह उम्मीद करना ग़लत नही होगा कि वो कल अपने बहन से शादी न कर ले। क्यों कि उसके लिए नैतिकता का क्या अर्थ ? उसे तो सिर्फ़ अधिकार और इक्षा कि भाषा समझ में आती है और वो बाजारवादी ,कल यह तर्क आराम से रख सकता है कि "जब अच्छी गुणवता और "ओके टेस्टेड माल " अपने गोदाम में है तो बहार से खर्चीले आत कि क्या ज़रूरत। २ चाहे कोई लाख तर्क और समानता के नारे लगा ले , परन्तु इसे सत्य मानना कि पुरूष और नारी सारे मायने में बराबर है, एक अल्पज्ञान कि कहा जाएगा। शायद वो gyan कह भी दे तो इसे व्यावहारिक ज्ञान कि श्रेणी में कदापि नही रखा जा सकता। स्वं प्रक्रिति जब भिन्नता कर दी, तो उसे नकारने का क्या अर्थ ?३ सामान अधिकार कि बात करना , समान आचरण के द्वारा साबित करना कहाँ तक न्यासंगत है? गर ये बात है तो, पब कल्चर के समर्थक ये बताएं कि क्या कल वे अपने निकटतम महिला सम्बन्धी को दीवाल पे पुरुषों कि तरह पेशाब करते देखना चाहेंगे।? अगर हाँ? तो unheपूरी छुट है , इस pink panty घटना के समर्थन में किसी हद तक जाने की। क्यों कि उन्होंने साबित कर दिया कि वो नए और प्रगतिवादी विचारधारा के हैं। ४ सच तो ये है कि अपने स्वार्थ के लिए महिला हीत कि बात उठाने वाले ये पाश्चात्य संस्कृति कि अंधे अनुयायिओं को भ्रूण हत्या, दहेज़ उत्पीडन के मामले नज़र नही आते। ये वो वर्ग है जो पब, पाश्चात्य संस्कृति के अंधाधुंध चकाचौंध में अपनी दृष्टि गवां बैठा है । नही तो चड्डी पे पैसे बहाने वाले लोग कल बाहर निकल कर क्यों नही आए जब आज भी समाज कि एक बड़ी आबादी कि महिलाएं पुरुषों द्वारे त्यागे धोती को साड़ी कि तरह लपेट कर अपना tan dhakti hai.5. aaj gar mahilaon ne is ghrinit virodh pradarshan ka tareeka apnaya to ye kahana atishyokti nahi hogi ki ye veshyavriti se bhi jyada shrmanak kam hai. क्यों कि वेश्या वृति के पेशे को अपनाने में कहीं गर मजबूरी रही होगी, तो यहाँ तो शौकिया वेश्यावृति कि झलक है। इज्जत को ढकने वालऐ, अन्तः वस्त्र गर बाज़ार के मनसूबे के मोहरे बन जायें तो इससे घृणित नारी चरित्र का दृष्टान्त नारी इतिहास में नही मिलेगा।मुझे नारी कि इस कृत से इतनी घृणा हो रही है कि...अब यह कहना शोभा नही देगा कि, पुत्र कुपुत्र होत है ..माता कुमाता नाही .......

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--- संजय सेन सागर

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