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अब वहां चमन नही श्मशान था.


वो भी था एक आम तूफान की तरह,
वो भी तो चमन उजाड़ता चला गया.
कुछ अलग था तो बस इतना ही,
के इस बार मेरे चमन की बारी थी.


भागता रहा मैं बिखरे फुलों के पीछे
समेटता रहा मैं एक एक तिनका
हर कोशिश नाकाम रही क्यूंकि.....
अब वहां चमन नही श्मशान था

Comments

  1. काफी सटीकता से सब्दों को पिरोया है ..बहुत खूब वैसे मैं आपकी काफी रचनाये पड़ी है इसे मैं जान चुकी हूँ की यह गुण आपने खूब है !

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  2. गजब की रचना ..बहुत अच्छे

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  3. बहुत बढिया व सटीक मुक्तक हैं।

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आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर

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