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सबको पता था कि हमला होगा

मुंबई में आतंकी हमले की पूर्व आशंका नहीं बल्कि जानकारी थी. हम यहां ऐसे कुछ बयान दे रहे हैं जो हमारे देश के महत्वपूर्ण मंत्रालयों का जिम्मा संभालने वाले मंत्रियों ने समय-समय पर दिये थे. इन बयानों से साफ है कि मुंबई पर बड़े आतंकी हमले की जानकारी सबको थी. इतनी सटीक जानकारी होने के बावजूद हमारे प्रशासन ने कार्यवाही क्यों नहीं की?

आतंकवाद की बलिवेदी पर बकरों की कुर्बानी शुरू हो गयी है. यूपीए की गॉडमदर को पहली भेंट गृहराज्यमंत्री शिवराज पाटिल के राजनीतिक वध से दी गयी. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के भी विकेट उखड़ गये हैं. सुनाई दे रहा है कि गॉडमदर के सामने मनमोहन सिंह, प्रणव मुखर्जी और रक्षामंत्री ए के एंटनी ने भी अपनी कुर्बानी देने का प्रस्ताव रखा था. जो भी हो रहा है उसमें एक सवाल हम लोगों के लिए उभरता है कि इस गलाकाट प्रतियोगिता से हासिल क्या होगा? शिवराज पाटिल की बजाय चिदंबरम गृहमंत्री हो गये तो क्या अब इस देश पर आतंकी हमले नहीं होंगे? क्या हम मान लें कि अब हमारे सुरक्षा तंत्र और खुफिया तंत्र के बीच बेहतर तालमेल हो जाएगा?
सबसे पहले देश के सुरक्षा सलाहकार को ही देखते हैं. इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट आफ स्टेटजिक स्टडीज के चौथे राष्ट्रीय सुरक्षा समिट में 8 दिसंबर 2007 को देश के सुरक्षा सलाहकार एम के नारायणन कहते हैं- "हमारी खुफिया रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान और अफगानिस्तान सीमा पर कुछ आतंकी प्रशिक्षण केन्द्र स्थापित किये गये हैं. इन केन्द्रों में 14-15 देशों के नौजवान हर तरह के वातावरण में फिदायीन हमला करने के लिए तैयार किये जा रहे हैं. आतंकी संगठन कमजोर सुरक्षावाले स्थानों का अध्ययन कर रहे हैं. वे उन स्थानों की भी निशानदेही कर रहे हैं जहां आतंकनिरोधी कार्यवाही का अभाव हो. हमारी जानकारी है कि वे हमले के लिए समुद्री मार्ग का चयन करेंगे."
नारायणन यह भाषण एक अकादमिक कार्यक्रम में दे रहे थे. उनसे पूछा जाना चाहिए कि सबकुछ जानने के बाद भी उन्होंने मुंबई की सुरक्षा के साथ लापरवाही क्यों बरती?
अब जरा देश के रक्षामंत्री ए के एंटनी के बयानों की बानगी देखिए. रक्षामंत्री ए के एण्टनी से 9 मार्च 2007 को लोकसभा एक प्रश्न पूछा गया.
सवाल- "क्या खुफिया एजंसियों ने समुद्र मार्ग से आतंकियों के घुसपैठ की महत्वपूर्ण ठिकानों पर हमले की सूचना दी है?"
ए के एंटनी -"हां, महाशय, इस तरह की खुफिया रपट है कि कुछ तंजीमें हमले की तैयारी कर रही हैं."
सवाल- "क्या समुद्री आतंकवाद, शस्त्र और ड्रग तस्करी, समुद्री डाका भारत की समुद्री सीमा पर सबसे बड़ा खतरा है?"
ए के एंटनी- "हां, महोदय."
सवाल यह है कि अगर देश के रक्षामंत्री को भी इस तरह की खुफिया सूचनाएं थी कि समुद्री रास्तों का आतंकी हमलों के लिए इस्तेमाल हो सकता है तो फिर उन्होंने नेवल कोस्ट गार्ड को सतर्क क्यों नहीं किया? समुद्र से 10 नॉटिकल मील के बाहर समुद्र में सुरक्षा की जिम्मेदारी भारतीय नेवी की है जो प्रतिरक्षा मंत्री के अधीन है. अगर लोकसभा को उन्होंने यह बताया तो फिर उससे निपटने के उपाय क्यों नहीं किये गये? इंटरनेशनल मेरीटाईम सर्च एण्ड रेस्क्यू कार्यक्रम में 11 मार्च 2008 को रक्षामंत्री ए के एंटनी एक बार फिर समुद्री मार्ग से हमले की चेतावन देते हैं.
आज से दो साल पीछे चलिए. नवंबर 2006. पुलिस महानिदेशकों और महानिरीक्षकों के सम्मेलन में शिवराज पाटिल कहते हैं- "हम समझ सकते हैं कि वे (आतंकवादी) भारतीय तट के निकट तेलशोधक संयंत्रों और भण्डारण केन्द्रों की जानकारी जमा कर रहे हैं. लश्कर-ए-तोएबा के कुछ आतंकवादियों को तेल रिफाईनरियों पर हमले के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है. कुछ निर्जन द्वीपों को काबिज कर आतंकी भारतीय तट पर हमले की लंबी योजना बना रहे हैं."
फिर भी इसके बाद गृहमंत्री ने क्या किया? 26 नवंबर 2008 की रात को जब मझगांव डाक पर विस्फोट हुआ तो वहां से मात्र दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित तेल भण्डारण संयंत्र के पास कोई सुरक्षा नहीं थी. जहां बम फटा है वहां से तेल भण्डारण केन्द्र तक का रास्ता निर्जन और सुरक्षाविहीन है. अगर आतंकी वहां तक पहुंच गये होते तो मुंबई का एक पूरा हिस्सा तबाह हो जाता और इस आग पर काबू पाने में कोई दो महीने लग जाते.
शिवराज पाटिल से 9 मई 2007 को राज्यसभा में एक सवाल पूछा गया था.
सवाल- क्या यह सच है कि देश पर समुद्री मार्ग से हमला किये जाने की सूचना है?
गृहमंत्री- उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान में मौजूद कुछ आतंकी गुट विशेषकर लश्करे तोयबा समुद्री मार्ग से आतंकी हमले की योजना बना रहा है."
अगर हमारे तत्कालीन गृहमंत्री को इतनी सटीक जानकारी थी कि लश्करे-तोयबा समुद्र मार्ग से हमले की योजना बना रहा है तो फिर हमारे प्रधानमंत्री या विदेशमंत्री ने समय रहते पाकिस्तान को इस बारे में आगाह क्यों नहीं किया?
22 नवंबर 2008 को दिल्ली में पुलिस महानिदेशकों और महानिरीक्षकों के सम्मेलन में शिवराज पाटिल ने कहा था- "हमें देश की सुरक्षा के लिए समुद्री मार्ग से होनेवाली घुसपैठ पर नजर रखनी होगी. नेवी, कोस्टगार्ड और तटरक्षक पुलिस को सतर्क रहना होगा. राज्यों की सीआईडी होटलों और लाजों पर निगरानी रखकर किसी भी शहर में आतंकी 'स्लीपर सेल' न गठित होने देने को सुनिश्चित करे."
ठीक चार दिन बाद मुंबई में वह आतंकवादी हमला हो गया और सैकड़ों लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा जिसके बारे में पिछले दो साल से हमारे प्रशासक हमें बताते आ रहे थे. क्या हमारे देश के इंटेलिजेंस की रपटों का उपयोग सिर्फ लोकसभा और राज्यसभा में प्रश्नों के उत्तर देने या अकादमिक भाषण के लिए उपयोग करने का कोई शासनादेश जारी हुआ है?
और लोगों की बात छोड़ भी दें तो हमारे प्रधानमंत्री ऐसी आशंकाओं से अछूते नहीं थे. अभी पिछले पखवाड़े मुंबई में आयोजित एक सुरक्षा सम्मेलन में मनमोहन सिंह कहते हैं- आतंकवाद और समुद्री मार्ग से हमलों का खतरा देश की संप्रभुता के लिए चुनौती बनता जा रहा है."
आखिर सारी जानकारी होने के बाद कार्रवाई क्यों नहीं हुई? क्या कांग्रेस में सत्ता के इतर कोई सत्ताधीश है जो गाडमदर से फैसले करवाता है? क्या ऐसे ही लोगों ने समय रहते कोई कार्यवाही नहीं होने दी? समुद्री डाक पर लगे ट्रालर और बार्ज किसके हैं? दाऊद का समुद्र के किनारे फैले व्यापार से क्या लेना-देना है? इसकी तह में हम जायेंगे.मुंबई पर हुए आतंकी हमलों की पड़ताल जारी रहेगी.

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