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मेरी छठी पुस्तक तीन वर्ष की प्रतीक्षा के बाद

मेरी छठी पुस्तक तीन वर्ष की प्रतीक्षा के बाद  प्रकाशक महोदय ने हिन्दी निबन्ध की पुस्तक  "आधुनिक सन्दर्भ में" २५ जून २०१४ को मुझे  प्राप्त  करा दी.  प्रकाशक महोदय-  अतुल गुप्ता,  जाह्नवी  प्रकाशन,   ए-७१, विवेक विहार, फ़ेस-२,  दिल्ली-  ११००९५   को  बहुत-बहुत धन्यवाद.

chhand salila: kamand chhand -sanjiv

ॐ छंद सलिला:   ​​​ कमंद छंद ​ संजीव * छंद-लक्षण: जाति लाक्षणिक, प्रति चरण मात्रा ३२ मात्रा, यति १५-१७, पदांत गुरु गुरु लक्षण छंद:   रखें यति पंद्रह-सत्रह पर, अमरकण्टकी लहर लहराती    छंद कमंद पदांत गुरु-गुरु, रसगंगा ज्यों फहर फहराती  उदाहरण: १. प्रभु को भजते संत सुजान, भुलाकर अहंकार-मद सारा     जिसने की दीन की सेवा, उसने जन्म का पाप उतारा     संग न गया कभी कहीं कुछ, कुछ संग बोलो किसके आया      किसे सगा कहें हम अपना, किसको बोलो बोलें पराया  २. हम सब भारत माँ के लाल, चरण में सदा समर्पित होंगे     उच्च रखेंगे माँ का भाल, तन-मन के सुमन अर्पित होंगे     गर्व है हमको मैया पर, गर्व हम पर मैया को होगा     सर कटा होंगे शहीद जो, वे ही सुपूजित चर्चित होंगे     ३. विदेशी भाषा में शिक्षा, मिले- उचित है भला यह कैसे?     विरासत की सतत उपेक्षा, करी- शुभ ध्येय भला यह कैसे?     स्वमूल्य का अवमूल्यन कर, परमूल्यों को बे...

geet: mausam badal raha hai -sanjiv

गीत: मौसम बदल रहा है… संजीव * मौसम बदल रहा है टेर रही अमराई परिवर्तन की आहट पनघट से भी आई... * जन आकांक्षा नभ को छूती नहीं अचंभा छाँव न दे जनप्रतिनिधि ज्यों बिजली का खंभा आश्वासन की गर्मी सूरज पीटे डंका शासन भरमाता है जनगण मन में शंका अपचारी ने निष्ठा  बरगद पर लटकाई  सीता-द्रुपदसुता अब  घर में भी घबराई... * मौनी बाबा गायब दूजा बड़बोला है रंग भंग में मिलकर बाकी ने घोला है  पत्नी रुग्णा लेकिन रास रचाये बुढ़ापा सुत से छोटी बीबी मिले शौक है व्यापा घोटालों में पीछे ना सुत, नहीं जमाई संसद तकती भौंचक जनता है भरमाई... * अच्छे दिन आये हैं रखो साल भर रोजा घाटा घटा सकें वे यही रास्ता खोजा हिंदी की बिंदी भी रुचे न माँ मस्तक पर धड़क रहा दिल जन का सुन द्वारे पर दस्तक क्यों विरोध की खातिर हो विरोध नित भाई रथ्या हुई सियासत निष्कासित सिय माई... ***

hindi ki shabd sampada:

सामयिकी: हिंदी की शब्द सलिला  संजीव  * आजकल हिंदी विरोध और हिनदी समर्थन की राजनैतिक नूराकुश्ती जमकर हो  रही है। दोनों पक्षों का वास्तविक उद्देश्य अपना राजनैतिक स्वार्थ  साधना है। दोनों पक्षों को हिंदी या अन्य किसी भाषा से कुछ लेना-देना नहीं है। सत्तर के दशक में प्रश्न को उछालकर राजनैतिक रोटियाँ सेंकी जा चुकी हैं । अब फिर तैयारी है किंतु तब  आदमी तबाह हुआ और अब भी होगा । भाषाएँ और बोलियाँ एक दूसरे की पूरक हैं, प्रतिस्पर्धी नहीं । खुसरो से लेकर हजारीप्रसाद द्विवेदी और कबीर से लेकर तुलसी तक हिंदी ने कितने शब्द संस्कृत. पाली, प्राकृत, अपभ्रंश, बुंदेली, भोजपुरी, बृज, अवधी, अंगिका, बज्जिका, मालवी निमाड़ी, सधुक्कड़ी, लश्करी, मराठी, गुजराती, बांग्ला और अन्य देशज भाषाओँ-बोलियों से लिये-दिये और कितने अंग्रेजी, तुर्की, अरबी, फ़ारसी, पुर्तगाली आदि से इसका कोई लेख-जोखा संभव नहीं है.  इसके बाद भी हिंदी पर संकीर्णता, अल्प शब्द सामर्थ्य, अभिव्यक्ति में अक्षम और अनुपयुक्त होने का आरोप लगाया जाना कितना सही है?...

Kavi Chetan Anand ....Agar Chirag Hai to Jal tu Andhiyon Ke Samne

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chhand salila: marhatha chhand, sanjiv

छंद सलिला: मरहठा छंद   संजीव * छंद लक्षण:  जाति महायौगिक, प्रति पद २९  मात्रा,  यति १०-८-११, पदांत गुरु लघु  ।  लक्षण छंद:     मरहठा छंद रच, असत न- कह सच, पिंगल की है आन       दस-आठ-सुग्यारह, यति-गति रख बह, काव्य सलिल रस-खान       गुरु-लघु रख आखर, हर पद आखिर, पा शारद-वरदान      लें नमन नाग प्रभु, सदय रहें विभु, छंद बने गुणवान   उदाहरण: १. ले बिदा निशा से, संग उषा के, दिनकर करता रास        वसुधा पर डोरे, डाले अनथक, धरा न डाले घास      थक भरी दुपहरी, श्रांत-क्लांत सं/ध्या को चाहे फाँस      कर सके रास- खुल, गई पोल जा, छिपा निशा के पास        २. कलकलकल बहती, सुख-दुःख सहती, नेह नर्मदा मौन         चंचल जल लहरें, तनिक न ठहरें, क्यों बतलाये कौन?     माया की भँवरें, मोह चक्र में, घुमा रहीं दिन-रात    ...

pita ko dohanjali: sanjiv

पितृ दिवस पर-  पिता सूर्य सम प्रकाशक : संजीव  *  पिता सूर्य सम प्रकाशक, जगा कहें कर कर्म  कर्म-धर्म से महत्तम, अन्य न कोई मर्म   * गृहस्वामी मार्तण्ड हैं, पिता जानिए सत्य  सुखकर्ता भर्ता पिता, रवि श्रीमान अनित्य  * भास्कर-शशि माता-पिता, तारे हैं संतान  भू अम्बर गृह मेघ सम, दिक् दीवार समान  * आपद-विपदा तम हरें, पिता चक्षु दें खोल  हाथ थाम कंधे बिठा, दिखा रहे भूगोल  * विवस्वान सम जनक भी, हैं प्रकाश का रूप  हैं विदेह मन-प्राण का, सम्बल देव अनूप  * छाया थे पितु ताप में, और शीत में ताप छाता बारिश में रहे, हारकर हर संताप  * बीज नाम कुल तन दिया, तुमने मुझको तात अन्धकार की कोख से, लाकर दिया प्रभात  * गोदी आँचल लोरियाँ, उँगली कंधा बाँह  माँ-पापा जब तक रहे, रही शीश पर छाँह  * शुभाशीष से भरा था, जब तक जीवन पात्र  जान न पाया रिक्तता, अब हूँ याचक मात्र * पितृ-चरण स्पर्श बिन, कैसे हो त्यौहार  चित्र देख मन विकल हो, करता हाहाका...