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लो क सं घ र्ष !: जल को राष्ट्रीय सम्पदा घोषित करने की साजिश

एक समय में वनों को बचाए रखने के लिए वन सम्पदा को राष्ट्रीय सम्पदा घोषित किया गया । वन सम्पदा को बनाये रखने के लिए विभिन्न तरह के विधियों का निर्माण किया गया । जिसका असर यह हुआ कि सरकार , उद्योगपति विभिन्न योजनाओ के नाम पर जमकर वन सम्पदा को नष्ट करने के अधिकारी हो गए । वन सम्पदा से जनता वंचित हो गयी । वन विभाग ने विभिन्न योजनाओ के तहत कागज पर ही पेड़ लगाये । जनता ने अपनी जमीनों के ऊपर पेड़ लगाकर पर्यावरण से लेकर अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करनी चाही । जिसका हश्र यह हुआ कि पेड़ मालिक को जब अपने उपयोग के लिए अथवा व्यावासिक उपयोग के लिए उनको कटवाने की जरूरत होती है तो नियमो और उपनियमों का सहारा लेकर पुलिस कुल बिक्री मूल्य का 60 प्रतिशत रुपया ले लेती है । 10 प्रतिशत वन विभाग ले लेता है पेड़ मालिक को बिक्री मूल्य का 30 प्रतिशत ही मिलता है उसी तरह से इजारेदार कम्पनियां उद्योगपति जल को राष्ट्रीय सम्पदा घोषित करने के लिए काफी दिनों से प...

स्मृति दीर्घा: संजीव 'सलिल'

स्मृति दीर्घा: संजीव 'सलिल' * स्मृतियों के वातायन से, झाँक रहे हैं लोग... * पाला-पोसा खड़ा कर दिया, बिदा हो गए मौन. मुझमें छिपे हुए हुए है, जैसे भोजन में हो नौन.. चाहा रोक न पाया उनको, खोया है दुर्योग... * ठोंक-ठोंक कर खोट निकली, बना दिया इंसान. शत वन्दन उनको, दी सीख 'न कर मूरख अभिमान'. पत्थर परस करे पारस का, सुखमय है संयोग... * टाँग मार कर कभी गिराया, छुरा पीठ में भोंक. जिनने अपना धर्म निभाया, उन्नति पथ को रोक. उन का आभारी, बचाव के सीखे तभी प्रयोग... * मुझ अपूर्ण को पूर्ण बनाने, आई तज घर-द्वार. कैसे बिसराऊँ मैं उनको, वे मेरी सरकार. मुझसे मुझको ले मुझको दे, मिटा रहीं हर सोग... * बिन शर्तों के नाते जोड़े, दिया प्यार निष्काम. मित्र-सखा मेरे जो उनको सौ-सौ बार सलाम. दुःख ले, सुख दे, सदा मिटाए मम मानस के रोग... * ममता-वात्सल्य के पल, दे नव पीढी ने नित्य. मुझे बताया नव रचना से थका न अभी अनित्य. 'सलिल' अशुभ पर जयी सदा शुभ, दे तू भी निज योग... * स्मृति-दीर्घा में आ-जाकर, गया पीर सब भूल. यात्रा पूर्ण, नयी यात्रा में साथ फूल कुछ...

लो क सं घ र्ष !: पाकिस्तान में सेना और भारत में नौकरशाही सत्ता पलट में माहिर हैं

पकिस्तान में जब सेना को सरकार जब पसंद नहीं आती है तो वह तख्तापलट कर देती है । किन्तु इसके विपरीत हमारे देश में यह कार्य बखूबी नौकरशाही बड़े आराम से करती रहती है । अमेरिकन साम्राज्यवाद को दुनिया में चुनौती देने वाली भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी की सरकार को नौकरशाही ने अपने कारनामो से जनता से सत्ताच्युत करा दिया था । श्रीमती इंदिरा गाँधी ने 20 सूत्रीय कार्यक्रम जनता के हितों के लिए लागू किया था तथा उनके पुत्र संजय गाँधी ने 5 सूत्रीय कार्यक्रम जारी किया था । उस समय की नौकरशाही शक्तिशाली प्रधानमंत्री नहीं चाहता था उसने आपातकाल के नाम पर गाँव से लेकर दिल्ली तक बेगुनाह लोगों को फर्जी मुकदमों में बंद कर दिया था । नसबंदी के नाम पर जबरदस्ती अविवाहित नवजवानों की नसबंदी कर दी गयी थी और प्रेस पर तरह - तरह के आरोप लगा कर उनके भी नकेल डाल दी गयी थी । जिन नवजवानों ने इन सब नौकरशाही के गलत कार्यों का विरोध किया या तो वह मार ...

दोहा गीतिका 'सलिल'

(अभिनव प्रयोग) दोहा गीतिका 'सलिल' * तुमको मालूम ही नहीं शोलों की तासीर। तुम क्या जानो ख्वाब की कैसे हो ताबीर? बहरे मिलकर सुन रहे गूँगों की तक़रीर। बिलख रही जम्हूरियत, सिसक रही है पीर। दहशतगर्दों की हुई है जबसे तक्सीर वतनपरस्ती हो गयी खतरनाक तक्सीर। फेंक द्रौपदी खुद रही फाड़-फाड़ निज चीर। भीष्म द्रोण कूर कृष्ण संग, घूरें पांडव वीर। हिम्मत मत हारें- करें, सब मिलकर तदबीर। प्यार-मुहब्बत ही रहे मजहब की तफसीर। सपनों को साकार कर, धरकर मन में धीर। हर बाधा-संकट बने, पानी की प्राचीर। हिंद और हिंदी करे दुनिया को तन्वीर। बेहतर से बेहतर बने इन्सां की तस्वीर। हाय! सियासत रह गयी, सिर्फ स्वार्थ-तज़्वीर। खिदमत भूली, कर रही बातों की तब्ज़ीर। तरस रहा मन 'सलिल' दे वक़्त एक तब्शीर। शब्दों के आगे झुके, जालिम की शमशीर। ********************************* तासीर = असर/ प्रभाव, ताबीर = कहना, तक़रीर = बात/भाषण, जम्हूरियत = लोकतंत्र, दहशतगर्दों = आतंकवादियों, तकसीर = बहुतायत, वतनपरस्ती = देशभक्ति, तकसीर = दोष/अपराध, तदबीर = उपाय, तफसीर = व्याख्या, तनवीर = प्रकाशि...

Christmas and New Year Special

Dear Friends,   अब की सेंटा क्लॉज़ गांव में मेरे आना , क्रिसमस डे इस बार हमारे साथ मनाना।   A beautiful poetry by Sh. Kashmir Singh.      Please click to read more   Editor The Saharanpur Dot Com w |  www.thesaharanpur.com E   |   info@thesaharanpur.com M | +91 9837014781      

लो क सं घ र्ष !: अपनी केचुल बदलती भाजपा

लोकसभा चुनाव में चारो खाने कांग्रेस से चित्त होने के पश्चात भाजपा ने अपनी पुरानी केचुल यानी अडवाणी को उतार फेंका है , अब वह पार्टी के लिए कोच की भूमिका निभाएंगे और लोकसभा में अपनी पुरानी प्रतिद्वंदी सोनिया गाँधी से दो - दो हाथ करने सुषमा स्वराज मैदान में उतर रही हैं । साथ ही अडवाणी के चहेते राजनाथ सिंह भी बड़े बे - आबरू होकर अध्यक्ष की कुर्सी से उतारे जा चुके हैं । इस पद पर संघ ने अपनी राईट च्वाइज़ को सुशोभित किया है जिनका बचपन व जवानी दोनों ही संघ के आँगन में बीता है । दरअसल संघ ने खूब सोच समझ कर टू टायर व्यवस्था इस बार की है । पार्टी संघ संचालक चलाये और सदन में सुषमा स्वराज कांग्रेस से नाराज दलों को अपनी लच्छेदार बातों से उसी प्रकार रिझा कर लायें जैसे कि पार्टी के अवकाश प्राप्त लीडर अटल बिहारी बाजपेई उदार वादी एवं धर्म निरपेक्ष मुखौटा चढ़ा कर अन्य दलों को साथ मिला कर किया करते थे । ज्ञातव्य रहे ...

एक और हजार का फर्क

डा. वेदप्रताप वैदिक भारत में गरीब होने का अर्थ जैसा है, वैसा शायद दुनिया में कहीं नही है| भारत में जिसकी आय 20 रू. से कम है, सिर्फ वही गरीब है| बाकी सब ? यदि सरकार और हमारे अर्थशास्त्रियों की मानें तो बाकी सब अमीर हैं| 25 रू. रोज़ से 25 लाख रू. रोज तक कमानेवाले सभी एक श्रेणी में हैं| इससे बड़ा मज़ाक क्या हो सकता है ? ये लोग गरीबी की रेखा के उपर हैं| जो नीचे हैं, उनकी संख्या भी तेंदुलकर-कमेटी के अनुसार 37 करोड़ 20 लाख हैं| ये 37 करोड़ लोग, हम ज़रा सोचें, 20 रू. रोज़ में क्या-क्या कर सकते हैं ? अगर कोई इन्सान इन्सान की तरह नहीं, जानवर की तरह भी रहना चाहे तो उसे कम से कम क्या-क्या चाहिए? रोटी, कपड़ा और मकान तो चाहिए ही चाहिए| बीमार पड़ने पर दवा भी चाहिए| और अगर मिल सके तो अपने बच्चों के लिए शिक्षा भी चाहिए| क्या 20 रू. रोज में आज कोई व्यक्ति अपना पेट भी भर सकता है ? आजकल गाय और भैंस 20 रू. से ज्यादा की घास खा जाती हैं| क्या हमें पता है कि देश के करोड़ों वनवासी ऐसे भी हैं, जिन्हें गेहूं और चावल भी नसीब नहीं होते| इस देश के जानवर शायद भरपेट खाते हों लेकिन इन्सान तो भूखे ही सोते हैं| वे इसलि...