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सलीम अख्तर सिद्दीक़ी एनडीए शासनकाल में अहमदाबाद पुलिस ने इशरतजहां और अन्य तीन लोगों को आतंकवादी बताकर मुठभेड़ में मार गिराया था। उस मुठभेड़ की मजिस्टे्रट जांच में मुठभेड़ को फर्जी और सरकार से तमगे हासिल करने के लिए किया हत्याएं बताया गया है। मजिस्ट्रेट तमांग जांच रिपोर्ट आने के बाद इशरजहां फर्जी मुठभेड़ को लेकर मीडिया की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं। मीडिया पर उठे सवालों के बाद टीवी पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी ने'इशरत हमें माफ कर दो' शीर्षक से एक आलेख दैनिक जागरण के लिए लिखा है। उस आलेख को भड़ास4मीडिया डॉट कॉम पर भी प्रकाशित किया गया है। इस आलेख में वाजपेयी ने अपनी और पूरे मीडिया की बेबसी और लाचारी को जिस तरह से जाहिर किया है, उससे लगता है कि आज का मीडिया कहीं न कहीं या तो पूर्वाग्रह से ग्रस्त हो जाता है या सरकारों के दबाव में सही तथ्यों को नजरअंदाज करके सरकारों द्वारा बताए गए तथ्यों को ही प्रसारित और प्रचाारित करता है। मुठभेड़ वाले दिन पन्द्रह जून दो हजार चार को अहमदाबाद से चैनल के रिपोर्टर ने पुण्य प्रसून वाजपेयी से कहा था कि यह फर्जी एनकाउंटर है। वाजपेय...

लो क सं घ र्ष !: कितना सूना जीवन-पथ है ...

तुम बिन लगता जग ही निरर्थ है। कितना सूना जीवन-पथ है। ये सूनी -सूनी राहें, कितनी कंटकमय लगती। ये काली-काली रातें, काली नागिन सी डंसती॥ विह्वल मन कर रहा अनर्थ है । कितना सूना जीवन पथ है। बात निहार थकी ये आँखें , आशाओं के दीप जलाये। कितने निष्ठुर निर्मम ,निर्दय, सपनो में भी तुम न आए ॥ विरह व्यथित ह्रदय की कथा अकथ है कितना सूना जीवन-पथ है॥ जब भी याद तुम्हारी आई नयनो में आंसू भर आए । अंतर्मन की व्यथा सदा ही हम अन्तर में रहे ॥ असहाय वेदना रोक रही साँसों का रथ है। कितना सूना जीवन-पथ है॥ तुम क्या जानोगे प्रिय ! कैसे पल-पल बरसो सम बीते । मधुर मिलन की आशा में, मरके भी रहे हम जीते॥ आंखों में आ बस जाओ यही मनोरथ है । कितना सूना जीवन-पथ है॥ कितना कठोर है यह विछोह विष, प्रियवर हँस कर पीना । कैसे जियें बताओ अब मुश्किल है जीना ॥ जैसे सम्भव नही , शब्द के बिना अर्थ है। कितना सूना जीवन-पथ है॥ खग कुल का यह कलरव , संध्या की सुमधुर बेला । सुरभि-पवन की मंद चल, मौसम अलबेला॥ सब कुछ तुम बिन लग रहा व्यर्थ है। कितना सूना जीवन -पथ है ॥ रूठोगे न कभी ,कहा था, फिर मुझसे क्यों बिलग हो गए। दुनिया के इस भीड़ में प्रिय! ...

अपना जहाँ ...

अपना जहाँ ख़ुद ही खो दिया अब भटक रहा हूँ कैसे ?खो दिया ये भी पता नही साँसे थम गई आवाज...... वो भी गुम हो गई मेरी मंजिल तो मिली नही दुसरे का ढूढ़ रहा हूँ अपने ही घर में आग लगाया अब पानी खोज रहा हूँ अँधेरी रात को अपनाया और भटक गया अब चाँद से उजाला मांग रहा हूँ अपना जहाँ ख़ुद ही खो दिया अब भटक रहा हूँ

लो क सं घ र्ष !: ठाकुर का क्रिया-करम

"यह तो पाँच ही हैं मालिक ।" "पाँच, नही, दस हैं। घर जाकर गिनना ।" "नही सरकार, पाँच हैं ।" "एक रुपया नजराने का हुआ कि नही ?" "हाँ , सरकार !" "एक तहरीर का ?" "हाँ, सरकार !" "एक कागद का ?" "हाँ,सरकार !" "एक दस्तूरी का !" "हाँ, सरकार!" "एक सूद का!" "हाँ, सरकार!" "पाँच नगद, दस हुए कि नही?" "हाँ,सरकार ! अब यह पांचो भी मेरी ओर से रख लीजिये ।" "कैसा पागल है ?" "नही, सरकार , एक रुपया छोटी ठकुराइन का नजराना है, एक रुपया बड़ी ठकुराइन का । एक रुपया छोटी ठकुराइन के पान खाने का, एक बड़ी ठकुराइन के पान खाने को , बाकी बचा एक, वह आपके क्रिया-करम के लिए ।" प्रेमचंद के गोदान से

लो क सं घ र्ष !: तृष्णा विराट आनंदित

तृष्णा विराट आनंदित , है नील व्योम सी फैली । मादक मोहक चिर संगिनी , ज्यों तामस वृत्ति विषैली ॥ वह जननि पाप पुञ्जों की , फेनिल मणियों की माला । उन्मत भ्रमित औ चंचल , पाकर अंचल की हाला ॥ छवि मधुर करे उन्मादित , सम्हालूँगा कहता जाए । तम के अनंत सागर में , मन डूबा सा उतराए ॥ डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल " राही "

नवगीत: लोकतंत्र के शहंशाह की जय... आचार्य संजीव 'सलिल'

नवगीत: लोकतंत्र के शहंशाह की जय... * राजे-प्यादे कभी हुए थे. निज सुख में नित लीन मुए थे. करवट बदले समय मिटे सब- तनिक नहीं संशय. कोपतंत्र के शहंशाह की जय.... * महाकाल ने करवट बदली. गायब असली, आये नकली. सिक्के खरे नहीं हैं बाकि- खोटे हैं निर्भय. लोभतंत्र के शहंशाह की जय... * जन-मत कुचल माँगते जन-मत. मन-मथ,तन-मथ नाचें मन्मथ. लोभ, हवस, स्वार्थ-सुख हावी करुनाकर निर्दय. शोकतंत्र के शहंशाह की जय.... ******

आरंभ Aarambha: हिन्दी टूल किट : आई एम ई को इंस्टाल करें एवं अपने कम्प्यूटर को हिन्दी सक्षम बनावें

आरंभ Aarambha: हिन्दी टूल किट : आई एम ई को इंस्टाल करें एवं अपने कम्प्यूटर को हिन्दी सक्षम बनावें सारांश यहाँ आगे पढ़ें के आगे यहाँ